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BS Manthan में बोले एक्सपर्ट्स: निर्यात प्रतिबंध-नीतिगत अनिश्चितता से कृषि को चोट, स्थिरता की जरूरत

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निर्यात प्रतिबंधों और अस्थिर शुल्क नीतियों से भारतीय कृषि बाजार और निवेश प्रभावित हो रहे हैं। विशेषज्ञों ने बेहतर भविष्य के लिए कम सरकारी हस्तक्षेप और डिजिटलीकरण पर जोर दिया

Last Updated- February 25, 2026 | 11:20 PM IST
BS Manthan

कृषि-तकनीक और कृषि-फाइनैंस के आला अधिकारियों ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के कार्यक्रम मंथन 2026 में बुधवार को कहा कि बार-बार लगने वाले निर्यात प्रतिबंध, अचानक शुल्क में बदलाव और नीतिगत अनिश्चितता से भारत के कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहा हैं। ऐसे में बाजार के संकेत भी विकृत हो गए हैं।

बिज़नेस स्टैंडर्ड के संजीव मुखर्जी के साथ हुई बातचीत में उन्होंने दीर्घकालिक निवेश और विकास को सक्षम करने के लिए नीति निर्माण में अधिक स्थिरता का आह्वान किया। आर्या.एजी के सह-संस्थापक व कार्यकारी निदेशक आनंद चंद्रा ने चावल और गेहूं के निर्यात पर अचानक लगाए गए प्रतिबंधों, दालों के आयात पर शून्य-शुल्क और स्टॉक सीमा लगाने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, ‘हर कोई बाजार-आधारित होने की बात करता है। हालांकि जिस क्षण आप बाजार को नियंत्रित करते हैं, आप बाजार-आधारित नहीं रह जाते हैं।’ उन्होंने तर्क दिया कि ऐसे कदम मूल्य संकेतों को बाधित करते हैं और दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करते हैं।

कृषि-स्टार्टअप के आला अधिकारियों ने कहा कि नीतिगत अप्रत्याशितता सबसे पहले चावल और दाल मिलरों जैसे प्रोसेसर को प्रभावित करती है, लेकिन इसका प्रभाव अंततः कम कीमतों और बदले हुए बुआई निर्णयों के माध्यम से किसानों तक पहुंचता है। एग्रीबाजार के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमित अग्रवाल ने कहा, ‘जिस क्षण सरकार कहती है कि वह शून्य शुल्क पर दालों का आयात करेगी, स्थानीय मिलर की लाभप्रदता चौपट हो जाती है। ऐसे में वह किसान को सही कीमत देने में सक्षम नहीं होता है।’ उन्होंने कहा कि तब किसान ठगा हुआ महसूस करता है। वह अगले साल कुछ और उत्पादन करने का फैसला करता है। विशेषज्ञों ने चर्चा के दौरान कहा कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) को बेहतर नीति निर्माण से जोड़ने की बात कही।

चंद्रा ने कहा, ‘नीति स्तर पर सभी हितधारकों को उचित निर्णय लेने के लिए एआई की जरूरत है। इस क्षेत्र को जो चीज परेशान कर रही है, वह है अनिश्चितता और अनियमितता जिस पर निर्णय लिए जाते हैं।’ 

उन्होंने आगे कहा कि किसानों को मुहैया कराने से पहले हम जैसे बाजार प्रतिभागी एआई का इस्तेमाल करें। कारण यह है कि इसकी अदायगी किसान नहीं करेंगे और हमें उनकी मदद के लिए एआई के इस्तेमाल के तरीके का पता लगाने की जरूरत है।  बहरहाल, विशेषज्ञों की ज्यादातर चर्चा नीतिगत अस्थिरता पर केंद्रित थी। चंद्रा ने राज्यों से आह्वान किया कि वे कृषि में कम हस्तक्षेप करें। उन्होंने कहा, ‘अभी भारत को कम हस्तक्षेप की आवश्यकता है। हमने किसान स्तर पर अत्यधिक हस्तक्षेप किया है।’

किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को अलग-अलग जगह जोत के संभावित समाधान के रूप में उद्धृत किया गया, लेकिन निष्पादन कमजोर बना हुआ है। देहात के सह-संस्थापक आदर्श श्रीवास्तव ने कहा, ‘यह (एफपीओ) भूमि विखंडन का हल है या आप छोटे व सीमांत किसानों के लिए समाधान कह सकते हैं। यह नीति किसानों को सशक्त बनाती है। सवाल निष्पादन, कार्यान्वयन के बारे में है। यही चीज गायब है।’

श्रीवास्तव ने मांग-आधारित उत्पादन योजना और पूर्ण वैल्यू चेन डिजिटलीकरण का आह्वान करते हुए कहा, ‘हरित क्रांति उत्पादन बढ़ाने के बारे में थी। अब समय बदल गया है। बाजार का पुनरुद्धार होना बहुत अहम है।’

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First Published - February 25, 2026 | 11:19 PM IST

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