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लेखक : टी एन नाइनन

आज का अखबार, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: समस्याओं का हल नहीं

सन 1996 के आरंभ में वित्त मंत्रालय में मेरी मुलाकात तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह से हुई। जब उनसे कहा गया कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी आर्थिक सुधारों की बात नहीं करेगी तो डॉ. सिंह ने कहा था, ‘उसके सिवा बात करने को है क्या?’ उसके बाद से हुए हर चुनाव में इस […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

भारतीय कॉर्पोरेट जगत: छोटे कारोबारों की दस्तक

भारत में क्या घटित हो रहा है यह समझना कभी भी आसान नहीं रहा है क्योंकि यहां हमेशा विरोधाभासी कथानक मौजूद रहते हैं। एक कहानी यह है कि भारतीय कारोबार तेजी से ऐसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जहां कुछ प्रभावशाली कारोबारी अधिकांश क्षेत्रों पर दबदबा कायम कर रहे हैं और एक तरह का आर्थिक […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: भारत के लिए ओलिंपिक 2036 की मेजबानी का वक्त!

नवागतों के लिए कमिंग आउट पार्टी (स्वागत पार्टी) काफी समय से चलन से बाहर है। परंतु विभिन्न देश जब आय और विकास के एक खास स्तर पर पहुंचते हैं और जब उन्हें लगता है कि उन्हें दुनिया को कुछ बताना चाहिए तो वे आज भी ऐसा करते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रति व्यक्ति […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: आशावादी तस्वीर

भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर उपभोक्ताओं और कारोबारों के विचारों के जो सर्वेक्षण करता है वे अक्सर वृद्धि, मुद्रास्फीति तथा शेष वृहद-आर्थिक आंकड़ों की तुलना में कहीं अधिक जानकारीपरक होते हैं। उसके ताजा सर्वेक्षणों के निष्कर्षों में कारोबारी और वित्तीय विचार व्यापक तौर पर आर्थिक विस्तार को लेकर आशावाद दिखाते हैं जिसके पीछे अच्छे स्थिरता […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों पर लगाम

प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों (मेटा, एमेजॉन, माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट और ऐपल यानी एमएएमएए) के विरुद्ध संघर्ष नया नहीं है। परंतु अब यह निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। इस माह के आरंभ में अमेरिका में अल्फाबेट (गूगल) और एमेजॉन के खिलाफ दो संभावित रूप से बहुत बड़े मुकदमे शुरू हुए। सन 1998 में माइक्रोसॉफ्ट के […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: जनोन्मुखी होने की कवायद

भारत में केंद्र और राज्यों की सरकारें दुनिया की सबसे अधिक व्यय करने वाली सरकारें नहीं हैं। कई क्षेत्रों में सरकारें अपने देश के जीडीपी के लिहाज से अधिक व्यय कर रही हैं। इनमें विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाएं तो हैं ही, साथ ही लैटिन अमेरिका, मध्य और पूर्वी यूरोप के देश तथा मध्य तथा पश्चिमी […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: सांस्कृतिक जड़ों की तलाश

प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के अंत में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उन्हें इस बात का पछतावा है कि वह लुटियंस दिल्ली को नहीं जीत सके। लुटियंस दिल्ली का प्रयोग आमतौर पर अंग्रेजी भाषी कुलीनों या सत्ता प्रतिष्ठान के भारतीय संस्करण के लिए किया जाता है। अब जबकि उनका दूसरा कार्यकाल […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: विपक्ष की परीक्षा

विपक्ष की परीक्षा के लिए एक प्रश्न: नए विपक्षी गठबंधन में शामिल विभिन्न दलों के विरोध के बावजूद संसद में कितने विधेयक पारित हुए, अगर 2024 के आम चुनाव के बाद ये दल सत्ता में आते हैं तो क्या ये इन कानूनों को वापस लेंगे? उदाहरण के लिए क्या वे निर्वाचन आयुक्तों का चयन करने […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: बुरे विचारों का मौसम

यह बुरे विचारों का मौसम प्रतीत होता है। इनमें ताजा है सरकार का वह निर्णय जिसके तहत पर्सनल कंप्यूटर, लैपटॉप और नोटबुक्स के आयात को लाइसेंसशुदा कर दिया है। तीन दशक पहले आयात लाइसेंस की व्यवस्था लगभग समाप्त कर दिए जाने के बाद यह उन चुनिंदा अवसरों में से एक है जब आयात पर इस […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: रेखांकित हों वास्तविक सफलताएं

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वै​श्विक अर्थव्यवस्था के लिए भारत के बढ़ते महत्त्व को लेकर जो बातें हो रही हैं उनमें गलत मुद्दों को रेखांकित किया जा रहा है जबकि भारत के आ​र्थिक प्रबंधन में जो रेखांकन योग्य बदलाव आए हैं उनकी अनदेखी की जा रही है। भारत अब सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं रह गया […]

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