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लेखक : टी एन नाइनन

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: नए-पुराने की ओर वापसी

भारत में सन 1991 और उसके बाद हुए आर्थिक सुधार दरअसल घरेलू तथा वैश्विक स्तर पर मुक्त बाजार में किए गए निवेश ही थे। ये सुधार रोनाल्ड रीगन और मार्गरेट थैचर के युग के उन विचारों से प्रभावित थे कि अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका कम होनी चाहिए। इसके लिए घरेलू तौर पर एक शब्द […]

आज का अखबार, लेख

साप्ताहिक मंथन: चीन की गतिहीनता

चीन की अर्थव्यवस्था (China economy) ऊर्जाहीनता की अजीब तस्वीर पेश कर रही है। दुनिया का बड़ा हिस्सा जहां मुद्रास्फीति से जूझ रहा है, वहीं चीन अपस्फीति (deflation) का ​शिकार है। वहां उत्पादक मूल्य में अपस्फीति है और उपभोक्ता कीमतों पर आधारित महंगाई कम है। दुनिया के अन्य हिस्सों के केंद्रीय बैंक जहां ब्याज दरें बढ़ा […]

आज का अखबार, ताजा खबरें, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: स्टार्टअप के लिए स्वआकलन का वक्त

एडटेक कारोबार बैजूस एक समय तेजी से विकसित होने वाले भारतीय स्टार्टअप जगत का एक खराब विज्ञापन बनकर सामने आया है। देश में 80,000 से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप हैं जिनमें से कम से कम 70 फीसदी अंतत: नाकाम हो जाएंगी जबकि दूसरी ओर करीब 100 स्टार्टअप ने यूनिकॉर्न का दर्जा हासिल किया है और उनका […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: टिकाऊ वृद्धि दर

पिछले चार दशकों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना में नाटकीय बदलाव आए हैं। वर्ष 1980-81 में भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 38 प्रतिशत से कम होकर 21 प्रतिशत रह गई थी, जबकि सेवा क्षेत्र का हिस्सा 37 प्रतिशत से बढ़कर 53 प्रतिशत तक पहुंच गया। उद्योग जगत (निर्माण सहित) की हिस्सेदारी […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: आईना देखना जरूरी

देश में प्रेस स्वतंत्रता, मानवा​धिकार, भ्रष्टाचार, अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार आदि को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो टीका-टिप्पणी हो रही है उस पर सरकार की नाराजगी भरी प्रतिक्रिया बताती है कि वह इनमें से अ​धिकांश मुद्दों पर बिगड़ते हालात को स्वीकार ही नहीं करना चाहती है। कोई भी स्वतंत्र पर्यवेक्षक देख सकता है कि मोदी […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: PLI अगर फेल हुई तो क्या….!

बाजार के प्रति सकारात्मक रुझान रखने वाले टीकाकारों की ओर से मोदी सरकार को लेकर जो आलोचना की जाती है उनमें से दो मानक आलोचनाएं यह हैं कि क्षेत्रीय मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) से दूरी रखी जा रही है और सरकार की उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को गति देने […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन: जनांकिकीय लाभ की असली कहानी

अ​धिकांश प्रकाशनों ने संयुक्त राष्ट्र के एक संगठन की इस बात को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया है कि भारत इस महीने दुनिया का सर्वा​धिक आबादी वाला देश बन गया है। आकलन के मुताबिक भारत की 142.9 करोड़ की आबादी चीन की जनसंख्या से मामूली अ​धिक है। आधुनिक जनगणना शुरू होने के बाद […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन- जलवायु परिवर्तन और जीडीपी

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की आधुनिक अवधारणा करीब नौ दशक पुरानी है। इसे सन 1944 में ​ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में औपचारिक रूप से प्रा​थमिक आर्थिक उपाय के रूप में अपनाया गया जिसका परिणाम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की स्थापना के रूप में सामने आया। आलोचक तब से अब तक इसे मिली प्राथमिकता […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन : पूंजी पर कर

सरकार ने डेट इंस्ट्रुमेंटों पर दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ पर से कर लाभ को समाप्त करके अचानक गुगली डाल दी है। उसने संसद द्वारा बगैर चर्चा के पारित वित्त विधेयक में अंतिम समय में यह बदलाव शामिल किया। पूंजीगत लाभ के लिए भारत की कर दरें कुछ इस प्रकार की रही हैं कि ज्यादा आय […]

आज का अखबार, लेख, संपादकीय

साप्ताहिक मंथन : संक्रमण का आकलन

वित्तीय संकट अमेरिकी कवि ऑग्डेन नैश की उस व्याख्या से एकदम मेल खाता है जिसमें उन्होंने केचप के बोतल से बाहर निकलने के बारे में कहा था, ‘पहले थोड़ा सा, फिर ज्यादा’। वर्ष 2008 के वित्तीय संकट को याद कीजिए। वास्तव में गड़बड़ी की शुरुआत करीब दो वर्ष पहले हुई थी जब अमेरिका में आवास […]

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