पटना-आईआईटी के दूसरे दीक्षांत समारोह को आज यहां संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि यह दुख की बात है कि वर्ष 1930 में भौतिकी में सीवी रमण के नोबेल पुरस्कार पाने के बाद किसी भी उच्च संस्थान का कोई भी भारतीय विद्वान इस पुरस्कार को पाने में सफल नहीं हुआ। लेकिन हमें यह गौरव प्राप्त है कि हरगोविंद खुराना, चंद्रशेखर और अमत्र्य सेन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान इस पुरस्कार को पाने में सफल रहे, जो कि देश के किसी संस्थान से जुडे हुए नहीं थे।
उन्होंने इस बात पर भी अफसोस जताया कि किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय या संस्थान को वर्तमान में विश्व के दो सौ उच्च संस्थानों में स्थान प्राप्त नहीं हो सका है।
प्राचीन काल में शिक्षा का गढ माने जाने वाले भारत के लिए इसे दुखद बताते हुए मुखर्जी ने कहा कि हम अपने उस गौरव को क्यों नहीं प्राप्त कर सकते।
उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय बिहार में स्थित थे और यह प्रदेश उस समय विश्व के लिए शिक्षा का गढ था।
राष्ट्रपति ने इसके लिए तीन सुझाव देते हुए कहा कि देश में उच्च शिक्षण संस्थानों में करीब 30 से 40 प्रतिशत रिक्त पद हैं जिनकी भरपाई नवीन तकनीक के अधिक इस्तेमाल से की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में ई-क्लास, ई-मेडिसिन और स्मार्ट बोर्ड के जरिए विद्यार्थी विश्व के किसी भाग में स्थित संस्थानों के किसी भी क्षेत्र की नवीनतम जानकारी हासिल कर सकते हैं।
जारी भाषा अनवर