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आईपीएल का दशक : बेमिसाल टूर्नामेंट के 10 साल

ध्रुव मुंजाल /  04 04, 2017

रोमांच की पिच

क्रिकेट जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने वाले इंडियन प्रीमियर लीग के 10वें साल में कई बदलावों की दरकार महसूस होती है

पिछले साल इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) शुरू होने से पहले ट्वेंटी-20 क्रिकेट के इस टूर्नामेंट को बेहद सख्त इम्तिहान माना जा रहा था। ऐसा मानना गलत भी नहीं था क्योंकि मार्च के आखिरी दिनों में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ था, उस समय भारत के खिलाडिय़ों को एक के बाद एक दिग्गज अंतरराष्टï्रीय टीमों के खिलाफ बीस-बीस ओवरों के मुकाबले खेलते हुए तीन महीने हो चुके थे। उन तीन महीनों में भारत ने ऑस्ट्रेलिया और श्रीलंका को टी-20 मुकाबलों में धूल चटाई और बांग्लादेश में टी-20 एशिया कप में खिताबी जीत भी दर्ज की। उसके बाद भी उन्हें आराम नहीं मिला और टी-20 विश्व कप में सभी से दो-दो हाथ करते हुए टीम सेमीफाइनल तक पहुंचने में कामयाब रही। उसके बावजूद आईपीएल बेहद मनोरंजक एवं रोमांचक रहा।

उस आईपीएल की खास बात यह थी कि उच्चतम न्यायालय की तरफ से नियुक्त न्यायमूर्ति आर एम लोढ़ा समिति की सिफारिशें आने के बाद वह पहला आईपीएल टूर्नामेंट था। खास बात यह भी थी कि उस टूर्नामेंट से ठीक पहले चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स की दिग्गज टीमों को टूर्नामेंट से बाहर कर दिया गया था। उनकी जगह दो नई टीमों राइजिंग पुणे सुपरजाइंट्स और गुजरात लॉयंस को शामिल किया गया था। ऐसी सूरत में 2016 के टूर्नामेंट की कामयाबी को लेकर चिंताएं होना लाजिमी था। चिंता उस समय बढ़ भी गई, जब उसे शुरुआत में टेलीविजन पर उतने दर्शक नहीं मिले, जितने उससे पिछले सालों में मिलते आए थे।

लेकिन दो हफ्ते के भीतर ही इस टी-20 लीग का खुमार एक बार फिर पूरे मुल्क पर चढ़ गया और टीवी रेटिंग एक बार फिर चढऩे लगीं। टूर्नामेंट खत्म होने पर पता चला कि लीग के दर्शकों की संख्या साल भर पहले के आंकड़े से तकरीबन 88 फीसदी बढ़कर 36.12 करोड़ तक पहुंच गई थी। टूर्नामेंट के पहले साल यानी 2008 के संस्करण में दर्शकों की संख्या से तुलना करें तो 2016 में तकरीबन ढाई गुना दर्शक आईपीएल को हासिल हुए थे। दर्शकों के साथ ही विज्ञापन से होने वाली कमाई के मामले में भी प्रदर्शन बहुत शानदार रहा। पिछले साल आईपीएल को प्रायोजकों के विज्ञापनों ने तकरीबन 1,100 करोड़ रुपये की आय हासिल हुई थी। इन आकंड़ों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आईपीएल अपने रास्ते में आने वाली तमाम बाधाओं से पार पाने में कामयाब रहा है।

बतौर ब्रांड आईपीएल का साल दर साल आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय फर्म डफ ऐंड फेल्प्स इंडिया के प्रबंध निदेशक वरुण गुप्ता कहते हैं, 'करीब 100 करोड़ जुनूनी प्रशंसकों की मौजूदगी और दुनिया भर के आलातरीन क्रिकेटरों की भागीदारी तो आईपीएल को कामयाब बनाती ही है, मैदान पर रोमांचक खेल और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की शानदार मार्केटिंग ने भी उसकी कामयाबी में चार चांद लगाए हैं।'

डेल्ही डेयरडेविल्स के मुख्य कार्याधिकारी हेमंत दुआ को आईपीएल सदाबहार लगता है। वह कहते हैं कि आईपीएल बेशक अपने दसवेें साल में कदम रख चुका है, लेकिन लोग अब भी खेल और मनोरंजन के मेलजोल को बहुत पसंद करते हैं। दुआ कहते हैं, 'लीग के प्रबंधन और फ्रैंचाइजी टीमों के बीच ऐसे रिश्ते हैं कि एक के बगैर दूसरे का काम चल ही नहीं सकता। इन रिश्तों ने भी लीग को बुलंदी पर पहुंचाने में खासी मदद की है।'

अधिक संख्या में दर्शकों को अपने साथ जोडऩे के लिए आईपीएल की प्रशासनिक परिषद ने पिछले साल प्रशंसकों के लिए 'फैन पार्क' शुरू किया था। देश भर के 34 शहरों में खुले मैदानों में बनाए गए इन फैन पार्क में विशालकाय टीवी स्क्रीन पर आईपीएल मैचों के सीधे प्रसारण की व्यवस्था की गई थी। इसके पीछे सोच यही थी कि जिन शहरों में आईपीएल के मैच नहीं खेले जा रहे हैं, वहां के प्रशंसकों को भी स्टेडियम में बैठकर मैच देखने का लुत्फ दिलाया जा सके। फैन पार्क यूं भी एकदम अनूठे किस्म के होते हैं क्योंकि वहां मैच देखने के लिए प्रशंसकों को टिकट भी नहीं खरीदने होते हैं। शनिवार और रविवार को होने वाले आईपीएल मैचों को देखने के लिए इन फैन पार्कों में पिछले साल अच्छी खासी भीड़ जुटी। गुप्ता बताते हैं कि छोटे शहरों में तो फैन पार्क को आईपीएल के प्रशंसकों ने हाथोहाथ लिया था।

हालांकि आईपीएल इस तरह का टूर्नामेंट है कि उसके कर्ताधर्ताओं के लिए न तो राजस्व जुटाने में किसी तरह की मुश्किल आई है और न ही टेलीविजन दर्शक जुटाना उनके लिए किसी तरह की चुनौती रहा है। ऐसे में उनके और सबके लिए चिंता का असली सबब तो खुद क्रिकेट बन गया है - वही क्रिकेट, जिसकी बुनियाद पर आईपीएल की चमचमाती इमारत खड़ी की गई है।

चिंता किस तरह की है, यह आपको दो उदाहरणों से पता चल जाएगा। इंगलैंड के सीमित ओवरों के कप्तान इऑइन मॉर्गन को भारत के हाथों करारी शिकस्त मिली थी। उसके बाद जनवरी महीने में वह बिग बैश लीग खेलने पहुंचे और वहां अपने जोरदार स्ट्रोकों से उन्होंने दर्शकों को खूब रोमांचित किया। मेलबर्न स्टार्स के खिलाफ खेले गए एक मुकाबले में मॉर्गन की टीम को आखिरी गेंद पर जीत के लिए पांच रन की दरकार थी। बेहद तनाव और दबाव के बीच मॉर्गन ने अपने हाथ खोलते हुए बेन हिल्फेनहॉस की गेंद पर ऐसा करारा शॉट लगाया कि गेंद सीधे साइट स्क्रीन के ऊपर लगी।

मॉर्गन की टीम को जीत हासिल हो गई और हजारों दर्शकों ने पूरे स्टेडियम में इतना शोर किया कि आसमान ही सिर पर उठा लिया। लेकिन इसके केवल दो हफ्ते बाद ऑस्ट्रेलिया के आतिशी ओपनर डेविड वॉर्नर ने जब अपने बल्ले का जलवा दिखाया तो ऐसा कुछ नहीं हुआ। धुआंधार पारी खेलते हुए उन्होंने अकेले दम पर पाकिस्तान को पस्त कर दिया। लेकिन उनकी पीठ ठोकने के लिए स्टेडियम में गिने-चुने लोग ही थे। बाकी सब तो उसी वक्त खेले जा रहे बिग बैश लीग को देखने के लिए पहुंच गए थे।

ऑस्ट्रेलिया की घरेलू टी-20 लीग बिग बैश के लिए 2016-17 का सत्र काफी सफल रहा है। इस लीग का प्रसारण करने वाले नेटवर्क टेन का कहना है कि हरेक मैच को औसतन 10 लाख से अधिक दर्शक मिले। लीग के कुल 35 में से 20 मैचों के टिकट तो पूरी तरह बिक गए थे। शायद इसी का नतीजा है कि मॉर्गन समेत कुछ क्रिकेटरों ने बिग बैश को दुनिया की सबसे अच्छी लीग करार दिया। यह जो तमगा बिग बैश को मिला है, यह क्रिकेट लीग में सबसे आगे माने जाने वाले आईपीएल के लिए एक कड़ी चुनौती पेश करता है। 

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कोच जॉन बुकानन का कहना है कि ये दोनों ही टूर्नामेंट काफी स्तरीय हैं। इसका मतलब है कि मनोरंजन के साथ ही गुणवत्ता के स्तर पर भी आईपीएल को बिग बैश की ओर से चुनौती का सामना करना होगा। 2016 में आईपीएल के जो मुकाबले हुए थे, उनमें से कई मुकाबले काफी हद तक एकतरफा रहे थे। ऐसी सूरत में दर्शकों के लिए तीन घंटे तक टीवी के सामने बैठ पाना काफी मुश्किल रहा था। गुणवत्ता की यही कमी है, जो खतरे की घंटी बजा रही है और इसी कमी के कारण पिछले साल आईपीएल के लीग चरण के आखिरी दौर तक पता नहीं चल पाया था कि चोटी पर कौन-कौन सी टीमें रहने वाली हैं।

असल में आईपीएल अपने पहले साल से ही ऐसे मुकाबलों के लिए मशहूर है, जहां आखिरी ओवर और कई बार तो आखिरी गेंद तक यह पता ही नहीं चल पाता कि जीत किसके हाथ लगेगी। इस तरह के दम निकालने वाले मुकाबलों को देखने के आदी दर्शकों को पिछले साल के टूर्नामेंट में कांटे की टक्कर देखने को ही नहीं मिली। इस वजह से रोमांच में जो कमी आई, उसका असर साफ दिखा। लोग अपनी शाम नीरस मैच देखने में लगाने के बजाय बाहर या परिवार के साथ बिताने लगे।

आईपीएल में खेल चुके एक खिलाड़ी ने कहा, 'मुझे लगता है कि आयोजकों को क्रिकेट से जुड़े एक बेहद बुनियादी मुद्दे पर ध्यान देने की जरूरत है। यह लीग जिस तरह से चल रही है, उसमें चिंता की बात यह है कि गेंद ओर बल्ले के मुकाबले में संतुलन नजर ही नहीं आता है। पिछले साल भी कमोबेश यही स्थिति देखने को मिली थी। सीधा सा सिद्घांत नजर आया, जिस पर कमोबेश सभी टीमें चलीं। सबसे पहले टॉस जीतिए, दूसरी टीम को बल्लेबाजी करने दीजिए और अपने बल्लेबाजों के बूते भारी-भरकम स्कोर का भी पीछा करते हुए मैच जीत लीजिए। अब दर्शकों के सामने हमें कुछ अलग परोसना होगा।'

हालांकि दुआ यह भी मानते हैं कि नौ साल गुजरने के बावजूद दर्शक आईपीएल से ऊबे नहीं हैं। लेकिन इतना जरूर है कि बहुत अधिक क्रिकेट मैच होने के कारण इस टूर्नामेंट का आकर्षण कुछ कम हो गया है। वह कहते हैं, 'अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद, बीसीसीआई और दूसरे देशों के क्रिकेट बोर्डों को भी एक साथ बैठना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि जरूरत से ज्यादा मैच तो नहीं खेले जा रहे हैं। दुनिया भर में जो भी शृंखलाएं हो रही हैं, उनके बीच में अंतराल कुछ बढ़ाया जा सकता है। आखिरकार खिलाड़ी इंसान होते हैं और उन्हें भी आराम की जरूरत होती है।'

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया के बड़े मैदानों और गेंद एवं बल्ले में से किसी एक के पक्ष में काम नहीं करने वाली पिचों के कारण बिग बैश टूर्नामेंट में कहीं अधिक प्रतिस्‍पर्धी मुकाबले देखने को मिले हैं। यह एक ऐसा पहलू है जिसमें आईपीएल हमेशा से आलोचना के घेरे में रहा है। कोलकाता नाइटराइडर्स के कोच रह चुके बुकानन कहते हैं, 'कोई भी दर्शक नजदीकी मुकाबले देखना पसंद करता है। टी-20 क्रिकेट में हमें यह ध्यान देना पड़ेगा कि खेल बल्लेबाजों के पक्ष में अधिक झुका हुआ न हो जाए।'

बहरहाल आईपीएल की कहानी उसके एक खास पहलू का जिक्र किए बगैर पूरी नहीं हो सकती और वह है नए खिलाड़ी। नए खिलाडिय़ों को अपनी प्रतिभा दिखाने का जितना शानदार मौका और जितना ऊंचा मंच आईपीएल ने मुहैया कराया है, उसकी जितनी भी तारीफ की जाए, कम है। आईपीएल जैसे लोकप्रिय टूर्नामेंट में शानदार प्रदर्शन करने वाले कई खिलाड़ी बहुत तेजी से राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने में सफल रहे हैं।

हालांकि कुछ विशेषज्ञ इससे नाइत्तफाकी जताते हैं और उनका कहना है कि खिलाडिय़ों के साथ हमेशा ऐसा नहीं होता। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलूर के मेंटॉर रह चुके चारु शर्मा कहते हैं, 'नामचीन और मुकाम हासिल कर चुके राष्ट्रीय तथा विदेशी खिलाडिय़ों की मौजूदगी में युवा खिलाडिय़ों को अपनी प्रतिभा दिखाने के मौके कम ही मिल पाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसा कर पाने में जरूर सफल रहे हैं।'

यह बात भी सच है कि आईपीएल से रोशनी में आकर भारतीय टीम तक पहुंचने वाले खिलाडिय़ों में से चुनिंदा लोग ही खास असर छोड़ पाए हैं। मौजूदा खिलाडिय़ों की बात करें तो मनीष पांडेय, हार्दिक पांड्या, युजवेंद्र चाहल और जसप्रीत बुमरा को ही आईपीएल की असली खोज कहा जा सकता है। हालांकि मनीष और हार्दिक अभी तक थोड़ी-बहुत कामयाबी ही हासिल कर पाए हैं, लेकिन चाहल और बुमरा घरेलू क्रिकेट में अपनी चमक बिखेरने के बाद राष्टï्रीय टीम में भी अच्छे खासे सफल रहे हैं। मगर कुछ वक्त पहले सुर्खियों में आए मनप्रीत गोनी, राहुल शर्मा, परविंदर अवाना और कर्ण शर्मा धूमकेतु की तरह आए, चमक बिखेरी और अचानक गायब हो गए।

भारतीय टीम में विकेटकीपिंग कर चुके एक पूर्व खिलाड़ी का कहना है कि आईपीएल के कुछेक मैचों के आधार पर ही किसी खिलाड़ी की काबिलियत का अंदाजा लगा पाना किसी भी सूरत में आसान नहीं हो सकता। वह कहते हैं, 'इसकी बहुत सीधी सी वजह है। आईपीएल में किसी खिलाड़ी का प्रदर्शन भारतीय टीम में चयन के लिए सही पैमाना हो ही नहीं सकता। यही वजह है कि आईपीएल में प्रदर्शन के आधार पर जो भी खिलाड़ी राष्टï्रीय टीम में चुने गए हैं, उनका काम मिला-जुला ही रहा है।' 

भारत के लिए अधिक परेशानी वाली बात यह है कि आईपीएल को वजूद में आए तकरीबन एक दशक गुजर गया है, लेकिन उसे अभी तक विश्व स्तर का कोई तेज गेंदबाज हासिल नहीं हो पाया है। अभी तक का प्रदर्शन देखें तो बुमरा को जरूर इस मामले में अपवाद माना जा सकता है। इसी तरह निचले क्रम में आकर लंबे शॉट लगाने और मैच का रुख पलटने की क्षमता रखने वाला खिलाड़ी भी भारत अभी तक तैयार नहीं कर पाया है। यूसुफ पठान को किसी वक्त ऐसी ही कुव्वत वाला खिलाड़ी माना जा रहा था, लेकिन उनकी कहानी अब गुजरे वक्त की दास्तान बन चुकी है।

कुछ साल पहले ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट लेखक गिडॉन हेग ने कहा था कि आईपीएल में हमेशा लोगों को एक नएपन की तलाश रहती है। लेकिन अभी तक के सफर पर नजर डालें तो चीयरलीडर्स और स्ट्रैटेजिक टाइमआउट जैसी कुछ नई और अनूठी पहलों के अलावा इसमें कुछ अलग तो नजर नहीं आता है। आप चाहें तो टाइमआउट को भी इसमें गिन सकते हैं, लेकिन असल में वह विज्ञापनों के जरिये अधिक कमाई करने के जरिये के तौर पर ही देखा जाता है। 

बुकानन कुछ तरीके सुझाते हैं, जिनके इस्तेमाल से आईपीएल अधिक रोमांचक हो सकता है। उनके मुताबिक टी-20 लीग में गुलाबी गेंद का इस्तेमाल हो सकता है, स्थानापन्न खिलाडिय़ों को गेंदबाजी या बल्लेबाजी करने की इजाजत दी जा सकती है, मैदान के बाहर बैठे सपोर्ट स्टाफ से बातचीत करने और सलाह-मशविरा करने की अनुमति भी कप्तान को दी जा सकतीी है तथा बल्ले का आकार कम करने के लिए भी कहा जा सकता है। इनसे कुछ नयापन आएगा। फिलहाल ब्रिसबेन में क्रिकेट कोचिंग संस्थान चला रहे बुकानन कहते हैं, 'क्रिकेट प्रशासकों को यह समझना होगा कि नए लोगों को टी-20 के जरिये ही इस खेल के प्रति आकर्षित किया जा सकता है। दरअसल लीग में शामिल मनोरंजन का पहलू नए दर्शकों को इस खेल से जोडऩे में सफल होता है।'

ऐसा नहीं है कि आईपीएल को रोचक बनाने के लिए नए तरीके आजमाने की गुंजाइश केवल क्रिकेट मैदान तक ही है। क्रिकेट लेखक देश गौरव चोपड़ा सेखरी का कहना है कि फ्रैंचाइजी टीमों के लिए खिलाडिय़ों की नीलामी के बजाय एनबीए शैली वाली ड्राफ्ट प्रणाली अपनाई जा सकती है।

इससे निश्चित रूप से मामला और भी दिलचस्प हो जाएगा। वह कहते हैं, 'ड्राफ्ट होने से विभिन्न टीमों के बीच अधिक संतुलन बन सकता है। लेकिन ड्राफ्ट प्रणाली लागू होने से वह नाटकीयता वाला तत्व गायब हो जाएगा जो नीलामी में देखने को मिलता है। हालांकि इतना जरूर कह सकते हैं कि आईपीएल में नीलामी की प्रक्रिया अब पहले से अधिक परिपक्व हो चुकी है। इस सीजन के लिए इशांत शर्मा जैसे खिलाड़ी की बोली नहीं लगने को इसकी एक बानगी के रूप में देखा जा सकता है।'

आईपीएल में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक हित जुड़े होने के कारण विवादों और घोटालों से भी इसका चोली-दामन का साथ रहा है। स्पॉट फिक्सिंग, अवैध सट्टेबाजी, मैचों के बाद देर रात तक होने वाली आलीशान दावतें, कुछ फ्रैंचाइजी टीमों के दिवालिया होने और आईपीएल के संस्थापक आयुक्त ललित मोदी के देश छोड़कर भाग जाने जैसे मामलों ने पिछले कुछ सालों में इस लीग को लगातार विवादों में रखा है। ऐसे में इस लीग की प्रतिष्ठा को बहाल करना बहुत बड़ी चुनौती है।

हालांकि अतीत में जब इसके दामन पर लग रहे थे तो इसने अपना घर साफ करने में अधिक रुचि नहीं दिखाई थी। वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्य प्रायोजक पेप्सी ने जब करार के दो साल बाकी रहते हुए भी लीग से अलग होने का ऐलान किया तो इस टूर्नामेंट के बारे में हो रहे नकारात्मक प्रचार को सबसे बड़ी वजह बताया था। आज हालत यह है कि अधिकांश कारोबारी दिग्गज आईपीएल से दूर ही रहना पसंद करते हैं और यही वजह है कि अब विवो और ओप्पो जैसी छोटी कंपनियां इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही हैं।
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