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अपने प्रधानमंत्री को 'नहीं' कहने का साहस

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  January 09, 2022

पंजाब में बठिंडा और फिरोजपुर के बीच के राजमार्ग पर प्रधानमंत्री के काफिले के साथ जो हुआ उसके बारे में आपकी समझ इस बात पर निर्भर करती है कि आपकी राजनीतिक विचार क्या है। इस मामले में तथ्य हैं, तस्वीरें हैं, वीडियो हैं तथा हत्या की योजना के साथ ही कम भीड़ के कारण रैली में नहीं आने के प्रत्यारोप भी हैं। इसके बाद षडयंत्र सिद्धांत तो हैं ही। यहां कुछ ऐसे तथ्यों पर बात करते हैं जो हम जानते हैं या जिनके बारे में हमें लगता है कि हम जानते हैं। पहली बात, सुरक्षा में भारी चूक हुई जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता। बात केवल यह नहीं है कि दशकों से चला आ रहा सुरक्षा प्रोटोकॉल तोड़ा गया है बल्कि प्रधानमंत्री का वाहन फ्लाईओवर पर फंस जाने के बाद जो कुछ हुआ वह विचारणीय है। 

 
उनका वाहन कई मिनट तक पुल के एक किनारे खड़ा रहा और उस दिशा में पुल के नीचे, किसी वाहन में या किसी पेड़ पर बैठा कोई व्यक्ति उसके लिए खतरा हो सकता था। आमतौर पर उसे सड़क के बीचोबीच होना चाहिए था, और उसके चारों ओर एसपीजी के वाहनों का घेरा होना चाहिए था। ऐसा करने पर प्रधानमंत्री का कोई चालान नहीं कटने वाला था। हमने यह भी देखा कि एसपीजी के जवान अगल-बगल खड़े थे। सामने से पर्याप्त बचाव उपलब्ध नहीं था।  प्रोटोकॉल का पहला उल्लंघन तो यही था कि राजमार्ग को 'सैनिटाइज' या जोखिम से मुक्त नहीं किया गया था जबकि दशकों से यह प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसके तहत थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पुलिस के जवान खड़े किए जाते हैं। यह राज्य पुलिस का काम है। क्या पंजाब पुलिस को पता नहीं था कि प्रधानमंत्री इस मार्ग से जाने वाले हैं? यदि पता था और इसके बाद भी उन्होंने ऐसा नहीं किया तो यहीं अक्षमता की शुरुआत हुई। अगर उन्हें यह तक पता नहीं था कि प्रधानमंत्री हुसैनीवाला के लिए उड़ान भरने के बजाय सड़क मार्ग से जा रहे हैं तो यह केवल अक्षमता नहीं है। यह तो काम के समय सोने जैसा हुआ। अब हमें पता है कि उस क्षेत्र में जांबाज पंजाब पुलिस के नाम से पुकारे जाने वाले इस बल को दोपहर मे आराम करना पसंद है लेकिन उस दिन प्रधानमंत्री का काफिला तो दोपहर से बहुत पहले गुजर रहा था। अंत में यदि उन्हें काफिले के बारे में पहले से पता था लेकिन प्रदर्शनकारी भी पहले ही एकत्रित हो गए थे तो पता लगाना चाहिए कि क्या यह बात तत्काल एसपीजी को बताई गई थी? इसका जवाब ही हमें बताएगा कि किस षडयंत्र सिद्धांत का दावा अधिक ठोस है: पहला दावा भाजपा का है जिसके मुताबिक राज्य की कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर प्रधानमंत्री को खतरे में डाला। दूसरा दावा कांग्रेस का है कि कुछ मिनट पहले प्रधानमंत्री को बताया गया कि वह जिस रैली के लिए जा रहे हैं वहां लोग नहीं हैं (यह सच है) इसलिए उन्हें जाने में शर्म आई और उन्होंने यह नाटक रचा।
 
तथ्यों के आधार पर हम यह भी कह सकते हैं कि यह राष्ट्रीय शर्म का विषय था। कोई आधुनिक राष्ट्र, और कम से कम भारत जहां राजनीतिक हत्याओं का इतिहास रहा है, अपने राज्य प्रमुख को यूं जोखिम में नहीं छोड़ सकता। यह भी सच है कि ऐसी कोई योजना नहीं थी। यदि कोई योजना होती भी तो ठीक उसी समय, उसी जगह होने के लिए तमाम खुशकिस्मती की जरूरत होती। निष्कर्ष वही पुराना: विशुद्ध अक्षमता के मामले में षडयंत्र तलाशने में वक्त मत बरबाद कीजिए। इस मामले में राज्य पुलिस और एसपीजी दोनों अक्षम रहे। 
 
राजनेता, खासतौर पर सत्ताधारी राजनेता सर्वाधिक जोखिम में रहते हैं। खासतौर पर भारत जैसे देश में जहां राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला है। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या करके हमारे गणतंत्र को शुरुआत में ही झटका दे दिया था। सन 1965 में पंजाब के मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह कैरों को अपना पद छोडऩे के कुछ ही महीनों के भीतर सोनीपत (अब हरियाणा में) के निकट ग्रांट ट्रंक रोड पर जान से मार दिया गया था। पंजाब के दो मुख्यमंत्रियों पदासीन या भूतपूर्व की हत्या की गई। दूसरे थे बेअंत सिंह जिनकी 1995 में पद पर रहते हत्या की गई। सन 1975 में तत्कालीन केंद्रीय रेल मंत्री ललित नारायण मिश्रा की जान बिहार के समस्तीपुर में हुए बम विस्फोट में गई। सन 1980 और 1990 के दशकों में कई सार्वजनिक नेता आतंकवाद की भेंट चढ़ गए। इनमें सन 1984 में इंदिरा गांधी और 1991 में राजीव गांधी की हत्या शामिल हैं।
 
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद पर रहते तीन बार हमले हुए थे। 14 मई, 1985 को वॉशिंगटन में, जून 1986 में लीसेस्टर में और उसी वर्ष गांधी जयंती के दिन राजघाट पर बापू की समाधि पर प्रार्थना के बाद एक हास्यास्पद प्रयास। तब पुलिस ने करमजीत सिंह नामक एक व्यक्ति को एक पेड़ पर पकड़ा जिसने एक घरेलू कट्टे से तीन बार गोली दागी। हालांकि इस हथियार से किसी को निशाना बनाना बहुत मुश्किल था। इसके बाद उन पर जो हमला हुआ उसे हास्यास्पद नहीं कह सकते। 30 जुलाई, 1987 को जे आर जयवद्र्धने और वेल्लुपिल्लई प्रभाकरण दोनों को 'राजी' करने के बाद राजीव गांधी कोलंबो में गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण कर रहे थे तभी परेड में शामिल विजेमुनी विजिता रोहन डीसिल्वा ने अपनी राइफल घुमाकर उनको मारने की कोशिश की। इस घटना ने 1981 में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या की याद दिला दी। 
 
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद एसपीजी का गठन किया गया जो अमेरिकी खुफिया सेवा के समान है। एसपीजी ने सबसे पहले राजीव गांधी की सुरक्षा का दायित्व संभाला। उन पर हुए हर हमले के बाद उसने अपने प्रोटोकॉल में सुधार किया।  इस तरह वीवीआईपी सुरक्षा का एक जबरदस्त दस्ता तैयार हुआ। यही वजह है कि गांधी परिवार मानता है कि वीपी सिंह और चंद्रशेखर की सरकार ने उनकी एसपीजी सुरक्षा जारी न रखकर गलती की।  लेकिन क्या केवल एसपीजी की मौजूदगी राजीव गांधी को उस मुस्कुराती हुई युवती से बचा लेती जिसने अपनी कमर में विस्फोटक बांधे थे? श्रीपेरुंबुदूर में हुए बम विस्फोट से एक दिन पहले इंडिया टुडे (मेरा तत्कालीन संस्थान) के संपादक अरुण पुरी और मैं वाराणसी में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी से मिले थे। हम उन्हें भीड़ से मिलते देखकर भौंच्चके रह गए। देर रात जब वह एक रैली में मंच पर जा रहे थे तो कई लोग उन पर फूलों की माला और फूल फेंक रहे थे। वह उनसे बचने के बजाय खुशी-खुशी उन्हें वापस उछाल रहे थे।
 
हमने उन्हें वाराणसी और बिहार के बक्सर जिले के बीच एक ढाबे पर भी पकड़ा था। अरुण पुरी ने उनसे सुरक्षा को लेकर प्रश्न किए। राजीव गांधी ने कहा था कि उन्हें जनता से कटा हुआ माना जा रहा है, इसलिए वे चेतावनियों के बावजूद जनता के बीच जा रहे हैं। जाहिर है चुनावी मौसम में नेताओं की खास इच्छा रहती है कि वे जनता के साथ दिखें। क्या श्रीपेरुंबुदूर में एसपीजी की मौजूदगी उन्हें लोगों के बीच जाने से रोक सकती थी? इसका जवाब यही है कि ऐसा तभी हो सकता था जब प्रभारी अधिकारी एकदम पेशेवर होता और उनके रुतबे को दरकिनार करके बात मनवाता। 
 
दूसरी ओर हत्या के प्रयास के नाम पर राजनीतिक नौटंकी भी बहुत हुई है। हमारे इतिहास में ऐसी सबसे बड़ी घटना भुला दी गई है। 15 मार्च, 1977 को चुनाव के एक दिन पहले (इन चुनावों में कांग्रेस पहली बार हारी थी) एक खबर आई कि अमेठी के पास किसी ने संजय गांधी की कार पर तीन गोलियां दागीं। इस मामले में न कोई शिकायत हुई, न कोई पकड़ा गया। यह हास्यास्पद चाल नाकाम रही। प्रधानमंत्री मोदी वाली घटना में सुरक्षा की नाकामी स्वीकार करनी होगी और इसमें सुधार करना होगा। किसी भी प्रधानमंत्री की सुरक्षा राजनीतिक ध्रुवीकरण का विषय बन सकती है। अब तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर मैं यही कहना चाहूंगा कि इस घटना में भारतीय वायु सेना ने सच्चा पेशेवर रुख दिखाया और प्रधानमंत्री को बताया कि मौसम उड़ान के अनुकूल नहीं होने से वह उड़ान नहीं भर सकती। अपने प्रधानमंत्री को 'नहीं' कहने के लिए जबरदस्त पेशेवर अंदाज और नैतिक साहस चाहिए। ऐसा करके ही उन्हें सुरक्षित रखा जा सकता है। 
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