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UCC: समान नागरिक संहिता क्या है ? उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने UCC के मसौदे को दी मंजूरी

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देश में एक शहर ऐसा भी है जहां आज या कल से नहीं बल्कि लगभग 150 साल पहले UCC लाया गया था।

Last Updated- February 06, 2024 | 2:51 PM IST
uniform civil code

यूनिफॉर्म सिविल कोड (Uniform civil code) या समान नागरिक संहिता (UCC) में देश में सभी धर्मों, समुदायों के लिए एक सामान, एक बराबर कानून बनाने की वकालत की गई है। आसान भाषा में बताया जाए तो इस कानून का मतलब है कि देश में सभी धर्मों, समुदाओं के लिए कानून एक समान होगा।

यह संहिता संविधान के अनुच्छेद 44 के तहत आती है। इसमें कहा गया है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे।

उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने UCC के मसौदे को दी मंजूरी

उत्तराखंड मंत्रिमंडल ने 4 फरवरी 2024 को समान नागरिक संहिता (UCC) के मसौदे को मंजूरी दे दी। उत्तराखंड मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने से राज्य विधानसभा में इसे पेश करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इसी के साथ उत्तराखंड ने समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने वाला देश का पहला राज्य बनने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह निर्णय लिया गया।

यह मुद्दा एक सदी से भी ज्यादा समय से राजनीतिक नरेटिव और बहस के केंद्र बना हुआ है और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए प्राथमिकता का एजेंडा रहा है। भाजपा 2014 में सरकार बनने से ही UCC को संसद में कानून बनाने पर जोर दे रही है। 2024 चुनाव आने से पहले इस मुद्दे ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है।

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भाजपा सत्ता में आने पर UCC को लागू करने का वादा करने वाली पहली पार्टी थी और यह मुद्दा उसके 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र का हिस्सा था।

100 साल भी ज्यादा पुराना है UCC का इतिहास

UCC का इतिहास 100 साल से भी ज्यादा पुराना है। यूसीसी का इतिहास 19वीं शताब्दी में खोजा जा सकता है जब शासकों ने अपराधों, सबूतों और अनुबंधों से संबंधित भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता की आवश्यकता पर बल दिया था।

हालांकि, तब विशेष रूप से सिफारिश की गई थी कि हिंदुओं और मुसलमानों के व्यक्तिगत कानूनों को इस तरह के कानून से बाहर रखा जाना चाहिए।

ब्रिटिश क्योंकि एकेश्वरवादी ईसाई थे, इसलिए उनके लिए भारत में चल रही जटिल प्रथाओं को समझना मुश्किल था। साथ ही अंग्रेजो का मुख्य उद्देश्यी से भारत से पैसा लूटना था, इसलिए वे किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते थे।

आजादी के बाद भी UCC पर हुई थी चर्चा

भारत की स्वतंत्रता के बाद UCC पर अलग-अलग विचार थे। कुछ सदस्यों का मानना ​​था कि UCC भारत जैसे अलग-अलग धर्मों और संप्रदायों वाले देश में लागू करना ठीक या बेहतर नहीं होगा, जबकि अन्य का मानना ​​था कि UCC देश में अलग-अलग समुदायों के बीच एक देश-एक कानून की तर्ज पर सद्भाव लाएगा।

UCC को लेकर बाबा साहब आंबेडकर और पंडित जवाहर लाल नेहरू की अलग-अलग राय

डॉ. बी.आर. अम्बेडकर का इस मुद्दे पर मानना ​​था कि UCC कोई थोपा हुआ नहीं बल्कि केवल एक प्रस्ताव था। वहीं, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का कहना था, “मुझे नहीं लगता कि वर्तमान समय में भारत में मेरे लिए इसे आगे बढ़ाने का प्रयास करने का समय आ गया है।”

यूसीसी पर क्या है सुप्रीम कोर्ट का रुख ?

सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक निर्णयों में सरकार से UCC को लागू करने का आह्वान किया है और समय-समय पर न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है।

मोहम्मद अहमद ख़ास बनाम शाह बानो बेगम के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला दिया और समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों की बजाय भारत के कानून CrPC को प्राथमिकता दी थी।

इस फैसले में अदालत ने यह भी कहा था कि संविधान का अनुच्छेद 44 एक बेकार पड़ा हुआ आर्टिकल बनकर रह गया है।

भारत में केवल GOA में लागू है UCC

हालांकि, देश में एक शहर ऐसा भी है जहां आज या कल से नहीं बल्कि लगभग 150 साल पहले UCC लाया गया था। वर्तमान में, गोवा भारत का एकमात्र राज्य है जहां समान नागरिक संहिता है।

इस संहिता की जड़ें 1867 के पुर्तगाली नागरिक संहिता में मिलती हैं, जिसे पुर्तगालियों द्वारा लागू किया गया था और बाद में इसे वर्ष 1966 में नए संस्करण के साथ बदल दिया। गोवा में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक, विरासत आदि के संबंध में समान कानून हैं।

यह भी पढ़े-Uttarakhand UCC: उत्तराखंड विधानसभा में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर बिल पेश, जल्द बनेगा कानून

पीएम मोदी ने हाल में UCC की पुरजोर वकालत की

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समान नागरिक संहिता की पुरजोर वकालत करते हुए विरोधियों से सवाल किया कि दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चलेगा? उन्होंने साथ ही कहा कि संविधान में भी सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार का उल्लेख है।

पीएम मोदी ने हाल ही में एक चुनावी रैली के दौरान कहा था कि भाजपा ने तय किया है कि वह तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के बजाय ‘संतुष्टिकरण’ के रास्ते पर चलेगी।

उन्होंने कहा था विपक्ष समान नागरिक संहिता के मुद्दे का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को गुमराह करने और भड़काने के लिए कर रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को यह समझना होगा कि कौन से राजनीतिक दल उन्हें भड़काकर उनका फायदा लेने के लिए उनको बरबाद कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा था, “हम देख रहे हैं समान नागरिक संहिता के नाम पर लोगों को भड़काने का काम हो रहा है। एक घर में परिवार के एक सदस्य के लिए एक कानून हो, दूसरे के लिए दूसरा, तो क्या वह परिवार चल पाएगा। फिर ऐसी दोहरी व्यवस्था से देश कैसे चल पाएगा? हमें याद रखना है कि भारत के संविधान में भी नागरिकों के समान अधिकार की बात कही गई है।”

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First Published - July 11, 2023 | 4:54 PM IST

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