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बैंकों के लिए नई चुनौती: म्युचुअल फंड्स और डिजिटल पेमेंट्स से घटती जमा, कासा पर बढ़ता दबाव

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बैंकरों को वृद्धि से ज्यादा, जमाओं की संरचना की चिंता है। दरअसल, कम लागत वाले चालू और बचत खातों (कासा) में जमाएं कम होती जा रही हैं। इससे बैंकों के लिए जमा की लागत बढ़ जाती है

Last Updated- November 13, 2025 | 10:50 PM IST
Banks

पिछले कुछ महीने से भारतीय बैंकों की बैलेंसशीट के जमा और ऋण दोनों पक्षों के बीच खींचतान मची है। एक ओर बैंक की परिसंपत्तियों में ऋण और निवेश शामिल हैं जबकि दूसरी ओर देनदारियों में जमा और पूंजी शामिल हैं। इस वित्त वर्ष के अधिकांश पखवाड़ों में ऋण वृद्धि असल में जमा वृद्धि से अधिक रही है। 17 अक्टूबर तक, सालाना जमा वृद्धि 9.5 फीसदी थी जबकि एक साल पहले यह 11.7 फीसदी थी। वहीं ऋण वृद्धि 11.5 फीसदी थी, जो इससे पिछले 12 महीनों के दौरान भी लगभग इतनी ही थी।

चालू वित्त वर्ष में अब तक, जमा वृद्धि 5.8 फीसदी रही है जबकि पिछले साल यह 6.5 फीसदी थी और ऋण वृद्धि 5.3 फीसदी रही जबकि पिछले साल यह 4.9 फीसदी थी। हालांकि बैंकरों को वृद्धि से ज्यादा, जमाओं की संरचना की चिंता है। दरअसल, कम लागत वाले चालू और बचत खातों (कासा) में जमाएं कम होती जा रही हैं। इससे बैंकों के लिए जमा की लागत बढ़ जाती है और उनके शुद्ध ब्याज मार्जिन (एनआईएम) पर असर पड़ता है जो मोटे तौर पर वह अंतर है जो एक बैंक अपने जमाकर्ताओं को चुकाता है और जिसकी भरपाई ऋणों की कमाई से करता है। बैंक के लाभ में ऋण परिसंपत्तियों की गुणवत्ता और एनआईएम, दोनों का अहम योगदान है।

कासा में कमी आने के पीछे क्या कारण है? एक कारक यह है कि बचत वाली पूंजी अब बैंक जमाओं से म्युचुअल फंड और शेयरों में जा रही है। कोविड-19 महामारी के बाद यह रुझान काफी तेज हुआ है। पिछले एक दशक में म्युचुअल फंड उद्योग की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियां (एयूएम) बैंक जमाओं की तुलना में काफी तेजी से बढ़ी हैं।

बैंक जमाओं के मुकाबले म्युचुअल फंड एयूएम का अनुपात लगभग 12 फीसदी से बढ़कर लगभग 32 फीसदी हो गया है। एयूएम में वृद्धि, मुख्य रूप से सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (सिप) की बढ़ती लोकप्रियता के कारण हो रही है जो बैंकों के कासा (कासा) से पैसा खींच रहे हैं। संयोग से, कुछ बड़े म्युचुअल फंडों का प्रबंधन भी बैंक ही करते हैं।

पिछले पांच वर्षों में, म्युचुअल फंड एयूएम तीन गुना से अधिक हो गया है जबकि बैंक जमाओं में करीब 70 फीसदी की ही वृद्धि हुई है। बेशक, इसमें केवल ताजा पूंजी का प्रवाह ही नहीं है बल्कि इक्विटी के मूल्य में वृद्धि ने भी इसमें योगदान दिया है। इक्विटी पर रिटर्न, बैंक जमा की तुलना में कहीं अधिक है। कम लागत वाले कासा की जगह, बैंकों के लिए अधिक लागत वाली थोक जमाओं और जमा प्रमाणपत्रों (सीडी) पर निर्भरता बढ़ रही है।

वहीं दूसरी ओर कॉरपोरेट जगत भी नकदी अधिक होने, कम जोखिम और बैंक खातों की तुलना में बेहतर रिटर्न के कारण अतिरिक्त नकदी को लिक्विड फंडों में रख रहा है। हालांकि पैसा आखिरकार बैंकों में वापस आता है लेकिन यह सीडी, थोक जमा और वाणिज्यिक पत्रों के रूप में आता है जिसके लिए बैंकों को उच्च ब्याज दरें चुकानी पड़ती हैं।

फरवरी से, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीतिगत दर में पूरे एक प्रतिशत अंक की कटौती करके 5.5 फीसदी कर दिया है जिससे ऋण दरों में गिरावट आई है लेकिन अधिकांश बैंकों के लिए जमा लागत अधिक बनी हुई है।

अक्टूबर में, बैंकिंग प्रणाली का ऋण-जमा अनुपात छह महीनों में पहली बार 80 फीसदी को पार कर गया। इससे जमाओं के लिए प्रतिस्पर्द्धा तेज हो जाती है क्योंकि बैंकों को उधार देने के लिए पैसे की जरूरत होती है। पूंजी के सबसे सस्ते स्रोत कासा में कमी के लिए ग्राहकों का व्यवहार, सरकारी नीतियां और तकनीक में बदलाव जिम्मेदार है।

चालू खातों पर कोई ब्याज नहीं मिलता है और बचत खाते सावधि जमा की तुलना में बहुत कम कमाई करते हैं। सितंबर तिमाही में अधिकांश बैंकों ने कासा में कमी दर्ज की। पांच निजी और तीन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अब भी कासा 40 फीसदी या उससे अधिक है लेकिन कुल मिलाकर सस्ती जमाओं का प्रतिशत हर तिमाही में कम होता जा रहा है।

समग्र बैंकिंग प्रणाली के लिए कासा अनुपात, महामारी के दौरान के लगभग 43 फीसदी से कम होकर जून 2025 में लगभग 36 फीसदी हो गया। आमतौर पर,चालू खाते कासा का लगभग 12 फीसदी हिस्सा होते हैं। संग्रह खाते के क्षेत्र में मजबूत बैंकों में चालू खाते का उच्च स्तर होता है। व्यापारियों, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) तथा क्रेडिट कार्ड से भुगतान इन खातों में जमा किए जाते हैं, जो कासा के लिए लंबी अवधि तक बने रहना सुनिश्चित करते हैं।

डिजिटल लेनदेन में वृद्धि के कारण बैंक खातों में पैसे के रहने का औसत समय कम हो गया है। पहले के टी+1 चेक क्लियरेंस प्रणाली से बैंकों को ग्राहकों के फंड को कुछ दिनों तक रखने की अनुमति थी लेकिन उसे अब तुरंत यूपीआई ट्रांसफर ने बदल दिया है। डिजिटल भुगतान की तादाद, अब कुल लेनदेन में कम से कम 99 तक हो चुकी है।

नतीजतन, बचत खाते अब पैसा रखने की जगह के बजाय फंड को एक जगह से दूसरी जगह भेजने का केंद्रबिंदु बन गए हैं। ई-कुबेर, सरकार और बैंकों के बीच लेनदेन के प्रबंधन के लिए एक केंद्रीकृत, इलेक्ट्रॉनिक मंच है, जिसने बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से सरकारी फंडों की आवाजाही को मौलिक रूप से बदल दिया है।

आगे, सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (सीबीडीसी) भी जमा जुटाने के लिए खतरा पैदा करेगी। भारत के ई-रुपये का चलन 10 गुना बढ़ गया है और यह दिसंबर 2023 के 103 करोड़ रुपये से बढ़कर सितंबर 2025 में 1,016 करोड़ रुपये मूल्य के बराबर हो गया है। हालांकि इसकी स्वीकार्यता अभी भी सीमित है।

जैसे-जैसे सीबीडीसी का बुनियादी ढांचा विकसित होगा और उपभोक्ता इसे अधिक स्वीकार करेंगे, कासा का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा सीधे आरबीआई के पास रखे ई-रुपये में बदल सकता है, जिससे बैंकों के कम लागत वाले फंडिंग स्रोत और कम हो जाएंगे। अब वक्त आ चुका है कि बैंक कासा से आगे बढ़कर ये समझें कि कम लागत वाले फंड जुटाने का भविष्य, अलग-अलग तरह की बैंकिंग योजनाओं में है।

कॉल सेंटर का सही इस्तेमाल कर, अधिक वैल्यू वाले कासा खातों से सीधे जुड़कर फंड की गति पर नजर रखी जा सकती है और जमाओं को दूसरी जगह जाने से रोका जा सकता है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और डेटा विश्लेषण से बैंकों को उन खातों को पहचानने में मदद मिल सकती है जो दूसरे बैंकों में जा सकते हैं। कुल मिलाकर, इस वक्त मजबूत डिजिटल भुगतान तंत्र में निवेश करना अहम होगा।

बैंकों के लिए अभी जो देनदारी से जुड़ी चुनौतियां हैं, वो सिर्फ ब्याज दरों में बदलाव से जुड़ी नहीं हैं। डिजिटल भुगतान का बढ़ना, लोगों के बचत करने के तरीकों में बदलाव, सरकार की पूंजी प्रबंधन की नीति में बदलाव और सीबीडीसी जैसी नई तकनीकों ने जमाओं के तौर-तरीकों में एक ऐसा बदलाव ला दिया है जिसे अब बदला नहीं जा सकता।

हमने बैलेंसशीट के एक हिस्से ऋण में पहले ही बदलाव देख लिया है। ज्यादातर बैंक कॉरपोरेट ऋण से हटकर रिटेल ऋण के पीछे भाग रहे हैं। अब उन्हें बैलेंसशीट की दूसरी तरफ (जमाओं) के लिए रणनीति बनानी होगी। ब्याज दरें सिर्फ एक कारक हैं। जो बैंक ग्राहकों से बेहतर जुड़ेंगे और अच्छी सेवाएं देंगे वही आगे विजेता बनेंगे।


(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ सलाहकार हैं)

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First Published - November 13, 2025 | 10:36 PM IST

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