facebookmetapixel
Advertisement
Anti Paper Leak Law: अमेरिका, चीन, जापान समेत दुनिया के देशों में परीक्षा में नकल पर क्या है सजा? जानिए नियमदिल्ली लक्ष्मी योजना के लिए कैसे करें आवेदन? महिलाओं के खातें में हर महीने आएंगे ₹2,500Ambuja Cements Share: कमजोर Q1 नतीजों के बावजूद ब्रोकरेज बुलिश, BUY रेटिंग बरकरार; ₹568 तक टारगेटक्या UPI, NEFT या RTGS से पैसे भेजने पर भी आ सकता है Income Tax का नोटिस?Anti Paper Leak Bill 2026: लोकसभा से पास एंटी पेपर लीक बिल, दोषियों को 10 साल की जेल और ₹50 लाख जुर्मानाCWG 2026: भारत को अब तक 2 स्वर्ण, 7 रजत पदक मिले; पदक तालिका में 9वें स्थान परITR e-Verification: रिटर्न फाइल करने के 30 दिनों के भीतर जरूर कर लें वेरिफिकेशन, जानें 5 आसान तरीकेFD Rates: सीनियर सिटीजन को मिल रहा 8.5% तक ब्याज, जानिए किस बैंक में मिल रहा सबसे ज्यादा रिटर्नविजय केडिया, मधुसूदन केला या आशीष धवन… जुलाई में किसके पोर्टफोलियो ने दिया सबसे ज्यादा रिटर्न?Indo-MIM IPO Listing: 72 गुना सब्सक्रिप्शन, अब लिस्टिंग पर कितनी होगी कमाई? GMP ने दिया बड़ा संकेत

नियमन पर नजर

Advertisement
Last Updated- March 30, 2023 | 12:07 AM IST
Indian Economy, indian GDP forecast

भारत के वै​श्विक आ​र्थिक मंदी से बेहतर ढंग से निपटने की संभावनाओं को लेकर एक वजह यह बताई जा रही है कि बीते कुछ वर्षों के दौरान हमारे बैंकों की बैलेंस शीट में काफी सुधार हुआ है। यह इसलिए संभव हुआ कि नियामकीय निगरानी अपेक्षाकृत सख्त रही और बैकों ने भी अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने के लिए काफी मेहनत की तथा पूंजी जुटाई।

बहरहाल, बैंकों के लिए जहां यह प्रक्रिया कारगर साबित हुई, वहीं ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रक्रिया के दौरान शायद कुछ कर्जदारों के साथ उचित व्यवहार नहीं हुआ। यह बात इस सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय के एक पीठ के महत्त्वपूर्ण निर्णय में भी सामने आई। इस पीठ में देश के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली शामिल थीं। न्यायालय ने कहा कि बैंकों द्वारा किसी खाते को धोखाधाड़ी वाला घो​षित करने के पहले कर्जदार को सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाना चाहिए। न्यायालय भारतीय स्टेट बैंक तथा अन्य की अपील की सुनवाई कर रहा था।

भारतीय रिजर्व बैंक ने 2016 में वा​णि​ज्यिक बैंकों और चुनिंदा वित्तीय संस्थानों के लिए जो मास्टर डाइरेक्शंस ऑन फ्रॉड्स-क्लासिफिकेशंस ऐंड रिपोर्टिंग जारी की थी उसमें बैंकों से उम्मीद की गई है कि वे धोखाधड़ी के बारे में समयबद्ध ढंग से जानकारी देंगे। इस परिपत्र को वि​भिन्न उच्च न्यायालयों में इस आधार पर चुनौती दी गई कि खातों को धोखाधड़ी वाले खातों के रूप में वर्गीकृत करने के पहले कर्जदारों को अपनी ​स्थिति साफ करने का मौका नहीं दिया गया।

इस संदर्भ में तेलंगाना उच्च न्यायालय ने कहा था कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत को रिजर्व बैंक के परिपत्र के प्रावधानों में पढ़ा जाना चाहिए। अब सर्वोच्च न्यायालय ने भी उसे बरकरार रखा है। उसने कहा कि प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत जो कहता है कि किसी व्य​क्ति को बिना सुनवाई के दोषी नहीं ठहराया जा सकता है, उसे रिजर्व बैंक द्वारा खातों को धोखाधड़ी वाले खातों के रूप में वर्गीकृत करने के मामलों में भी लागू किया जाना चाहिए।

उसने यह भी कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का तकाजा है कि कर्जदार को एक नोटिस मिलना चाहिए और उसे यह मौका दिया जाना चाहिए कि वह अपनी बात सामने रखे।

दिलचस्प बात यह है कि बैंकों की ओर से सुनवाई के लिए पेश हो रहे वकीलों ने दलील दी है कि कर्जदाताओं ने धोखाधड़ी को चिह्नित करने और जांचने के लिए एक व्यवस्था बनाई है। वे प्रवर्तन एजेंसियों के साथ ​शिकायत करते हैं जो जांच को पूरा करते हैं।

धोखाधड़ी को लेकर अंतिम निर्णय एक सक्षम न्यायालय द्वारा घो​षित किया जाता है। ऐसे में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत आपरा​धिक वि​धि की प्रक्रिया आरंभ करते समय लागू नहीं होते। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय मानता है कि मास्टर डाइरेक्शंस कर्जदारों के लिए बहुत गंभीर परिणाम लाने वाले साबित होते हैं। बैंक उन्हें भरोसेमंद नहीं मानते। इसके अलावा भी कई असर होते हैं।

इस फैसले ने कर्जदारों को बहुप्रती​क्षित राहत प्रदान की है और एक हद तक कर्जदारों और कर्जदाताओं के रिश्तों को संतुलित किया है। बीते दशक में जब फंसे हुए कर्ज में इजाफा होने लगा और इसके व्यापक वृहद आ​र्थिक और राजनीतिक परिणाम सामने आने लगे तो यह दबाव बढ़ने लगा कि बैंकिंग व्यवस्था को यथाशीघ्र ठीक किया जाए।

रिजर्व बैंक ने फंसे हुए कर्ज का समय पर पता लगाने के लिए कई नियमन तैयार किए। यह ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता के आगमन के पहले किया गया। इस बात में कोई विवाद नहीं है कि बैंकों को ऋण वसूलने का पूरा अ​धिकार है, वहीं उन्हें व्यापक असर वाले दंडात्मक कदम उठाने के पहले कर्जदारों को एक और मौका ​देना चाहिए।

यह संभव है कि बैंक शायद कई मामलों में अपने निर्णय न बदले लेकिन प्रभावित कर्जदारों के पास मौका होगा कि वे अपनी ​​स्थिति स्पष्ट कर सकें। बैंकों के लिए धोखाधड़ी वाले खातों से बचने का सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि ऋण के मानकों में सुधार किया जाए। उन्हें हकीकत से कोसों दूर अनुमान वाली परियोजनाओं और बड़ी संख्या में अव्यवहार्य कंपनियों को कर्ज देने से बचना चाहिए।

Advertisement
First Published - March 30, 2023 | 12:07 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement