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Editorial: पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान जरूरी

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ध्यान रहे कि आमतौर पर ठंड का मौसम शुरू होने पर पराली हवा में प्रदूषण की एक अहम वजह होता आया है

Last Updated- October 21, 2025 | 9:48 PM IST
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दीवाली के बाद होने वाले घातक प्रदूषण से जूझ रहा है और इस बीच यह बात याद रखने लायक है कि इस वर्ष फसल अवशेषों यानी कि पराली को जलाने का वायु प्रदूषण में उतना अधिक योगदान नहीं रहा है। ध्यान रहे कि आमतौर पर ठंड का मौसम शुरू होने पर पराली हवा में प्रदूषण की एक अहम वजह होता आया है।

15 सितंबर से 15 अक्टूबर की अवधि में पराली जलाए जाने के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2024 की तुलना में इस वर्ष इस अवधि में धान की पराली का जलाया जाना काफी कम हुआ है। पंजाब और हरियाणा आमतौर पर इसके मुख्य दोषी माने जाते हैं लेकिन इन दोनों राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं क्रमश: 64 फीसदी और 96 फीसदी कम हुई हैं।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में 19 से 45 फीसदी की कमी आई। यही वजह है कि इस अवधि में एनसीआर की हवा की गुणवत्ता ‘मध्यम’ से ‘संतोषप्रद’ रही है। राज्य प्रशासन इसका श्रेय ले रहे हैं और उनका कहना है कि उन्होंने विभिन्न प्रकार के प्रोत्साहन, जुर्माने के भय और बुनियादी ढांचा संबंधी प्रावधानों का इस्तेमाल करके पराली जलाने को हतोत्साहित किया है। परंतु मॉनसून की देरी से वापसी के कारण फसल में देरी हुई है और कई किसानों के खेतों में धान की पराली शायद अक्टूबर के अंत तथा नवंबर में निकले। ऐसे में राज्यों ने पराली की समस्या से निपटने के लिए जो उपाय अपनाए हैं उनकी परीक्षा बाद में होगी।

पराली जलाने की समस्या से निपटने के सैद्धांतिक रूप से दो तरीके हैं। पहला, फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) जहां पराली का उपचार धान के खेतों में ही किया जाता है और रसायनों की मदद से उसे विघटित किया जाता है। हैप्पी सीडर्स जैसी मशीनों की मदद से किसान पिछली फसल के अवशेष के ऊपर आसानी से अगली फसल की सीधे बोआई कर सकते हैं। राज्य सरकारें सीआरएम मशीनों की खरीद पर 50 से 80 फीसदी तक सब्सिडी देती हैं। दूसरे तरीके में पराली को खेतों से दूर प्रसंस्करण केंद्र ले जाना होता है जहां उसे पालतु पशुओं के चारे या बिजली संयंत्रों के ईंधन में बदला जाता है।

परंतु दोनों ही तरीकों में अपनी-अपनी कमियां हैं। पंजाब और हरियाणा के बारे में कहा जाता है कि वहां पर्याप्त संख्या में सीआरएम मशीनें उपलब्ध हैं जो धान के तमाम खेतों में काम आ सकती हैं। परंतु पंजाब में केवल एक तिहाई किसान ही इनका इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनकी इस अनिच्छा की वजह यह धारणा है कि सीआरएम मशीनें उत्पादकता को प्रभावित करती हैं और इनके चलते कीटों के हमलों की आशंका बढ़ जाती है।

इस समस्या को किसानों को शिक्षित करके दूर किया जा सकता है। जहां तक दूसरे उपाय की बात है तो किसानों को अपने फसल अवशेष को अपने खर्च पर प्रसंस्करण संयंत्र तक ले जाना होता है। इस वर्ष दोनों राज्य सरकारों ने किसानों को भारी प्रोत्साहन देकर तथा इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के साथ तालमेल करके उसके पानीपत में मौजूद एथनॉल संयंत्र तक आपूर्ति तय करके इस दिक्कत को दूर करने की कोशिश की है।

अब इसमें संदेह है कि ये उपाय कितने लंबे समय तक टिक पाएंगे। वित्तीय मुश्किल से जूझ रहे इन राज्यों के लिए इतनी उदार सब्सिडी को लंबे समय तक बनाए रखना संभव नहीं हो सकता। पराली जलाने पर दंड का प्रावधान है, लेकिन उन्हें लागू करना कठिन होता है क्योंकि किसान संगठन इसका तीव्र विरोध करते हैं।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि किसानों को सीधे नकद हस्तांतरण किया जाए ताकि वे सीआरएम मशीनें खरीद सकें, जिन्हें वर्तमान में सब्सिडी के कारण अत्यधिक मूल्य पर बेचा जा रहा है। लेकिन वास्तव में टिकाऊ समाधान यह है कि किसानों को धान जैसी जल-गहन फसलों की खेती बंद करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए और उन्हें ऐसी फसलों की ओर मोड़ा जाए जो कम पानी की आवश्यकता वाली हों और जिनकी खेती की अवधि छोटी हो, जिससे पराली जलाने की आवश्यकता ही न पड़े।

उत्तर भारत के राज्यों ने फसल विविधीकरण के लिए एकमुश्त अनुदान देना शुरू कर दिया है, लेकिन यह तभी सफल हो सकता है जब किसानों को जीवंत और सक्रिय बाजार उपलब्ध हों। समस्या यह है कि इसके लिए कृषि बाजारों में गहन सुधार की आवश्यकता है, जिसे राजनीतिक रूप से प्रभावशाली किसान और बिचौलियों की लॉबी अब तक रोकने में कामयाब रही है।

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First Published - October 21, 2025 | 9:33 PM IST

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