खबरों के मुताबिक सरकार ने चार मझोले और छोटे बैंकों का चयन किया है जिनमें से दो का अगले वित्त वर्ष में निजीकरण किया जाएगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट में इस आशय की घोषणा की थी। सरकारी बैंकों का निजीकरण करने और एक नई सरकारी उपक्रम नीति बनाने संबंधी जो घोषणाएं हाल में की गई हैं, वे अतीत में की गई ऐसी ही घोषणाओं से एकदम अलग हैं। इससे समग्र आर्थिक सुधार प्रक्रिया को बल मिलेगा। खबर यह भी है कि सरकार सरकारी उपक्रमों के निजीकरण की प्रक्रिया के निपटारे के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञ समूह की नियुक्ति पर भी विचार कर रही है। यह कदम भी सही दिशा में होगा क्योंकि विनिवेश के मामले में सरकार का प्रदर्शन कोई खास नहीं रहा है।
यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि इतने बड़े पैमाने पर निजीकरण करना आसान नहीं होगा। खासतौर पर सरकारी बैंकों के मामले में। इस क्षेत्र में न केवल राजनीतिक विरोध होगा बल्कि कानूनी मसले भी उठेंगे। ऐसे में सरकार को स्पष्ट खाका पेश करना होगा। कई लोगों ने यह हिमायत की है कि सरकार को पहले बड़े सरकारी बैंकों का निजीकरण करना चाहिए ताकि प्रभाव अधिक हो और निजीकरण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता सामने आए। परंतु ऐसा करने का उलटा असर हो सकता है क्योंकि श्रम संगठन और राजनीतिक दलों से इसका तीव्र विरोध होगा। ऐसे में अपेक्षाकृत छोटे बैंकों से शुरुआत अच्छा विचार है क्योंकि इससे हालात का जायजा लेने में मदद मिलेगी। सरकार को अगले वित्त वर्ष में शीघ्र शुरुआत करनी चाहिए क्योंकि पूरी प्रक्रिया में काफी समय लगेगा। इसके अलावा उसे परिचालन के कई मुद्दों से भी निपटना होगा। उदाहरण के लिए क्या सरकार चयनित सरकारी बैंक में अपनी पूरी हिस्सेदारी बेचेगी या अल्पांश हिस्सेदारी अपने पास रखकर प्रबंधन खरीदार को सौंप देगी? यह अहम है क्योंकि सरकार के पास कुछ सरकारी बैंकों में 90 प्रतिशत तक हिस्सेदारी है। परंतु निजी क्षेत्र में अंशधारिता की सीमा है। सरकार का अल्पांश हिस्सेदारी अपने पास रखना भी दिक्कतदेह हो सकता है क्योंकि हस्तक्षेप की आशंका कई संभावित खरीदारों को हतोत्साहित करेगी।
भारतीय रिजर्व बैंक के आंतरिक कार्य समूह की हालिया रिपोर्ट में अनुशंसा की गई है कि समय के साथ प्रवर्तकों की हिस्सेदारी को 15 फीसदी से बढ़ाकर 26 फीसदी तक किया जाए। इससे संभावित बोलीकर्ता आकर्षित हो सकते हैं। सरकार को रिजर्व बैंक के साथ मशविरा करके यह तय करना होगा कि वह किस तरह के संभावित खरीदारों पर विचार करे। आरबीआई के कार्य समूह ने यह अनुशंसा भी दी है कि बड़े कॉर्पोरेट और औद्योगिक घरानों को भी बैंक प्रवर्तक बनने की इजाजत दी जानी चाहिए। इस विचार के खिलाफ काफी मत हैं क्योंकि इससे न केवल जोखिम बढ़ेगा बल्कि ताकत का केंद्रीकरण भी होगा।
सबसे अहम पहलू यह होगा कि सरकार कर्मचारियों के मसले से कैसे निपटती है। सरकारी बैंकों में बड़ी तादाद में कर्मचारी हैं और निजी क्षेत्र के मालिक शायद सबको न रख पाएं। ऐसे में इस विषय पर विस्तृत खाका तैयार करना आवश्यक है। लब्बोलुआब यह कि कुछ सरकारी बैंकों का निजीकरण अपरिहार्य है क्योंकि सरकार के पास पुनर्पूंजीकरण की राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। इसके अलावा अतीत में ऐसे प्रयास कारगर भी नहीं रहे हैं। हकीकत यह है कि सरकारी स्वामित्व अपने आप में सरकारी बैंकों की गतिविधियां सीमित करता है और उनके प्रदर्शन को प्रभावित करता है। परंतु यह भी सही है कि सफल निजीकरण काफी हद तक इस बात पर निर्भर होगा कि सरकार परिचालन के मसलों से कितने प्रभावी ढंग से निपटती है।