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समझदारी भरा कदम

Last Updated- December 11, 2022 | 9:01 PM IST

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उस प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया जो यूक्रेन पर रूस के हमले के खिलाफ लाया गया। भारत के अलावा चीन और संयुक्त अरब अमीरात ने भी मतदान से दूरी बनाई। भारत का यह कदम समझदारी भरा है क्योंकि सीमित कूटनीतिक विकल्प के बीच यह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए लिया जा सकने वाला सही निर्णय था। मतदान न करने को यूक्रेन में रूस के कदमों का समर्थन नहीं माना जा सकता लेकिन इस कदम ने भारत को यह अवसर प्रदान किया कि वह रूस एवं सोवियत संघ के साथ सात दशक पुराने अपने रिश्तों को कोई क्षति पहुंचाए बिना क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर अपने दीर्घकालिक कूटनीतिक रुख को बरकरार रख सके। हमारे सशस्त्र बलों के अधिकांश हथियार रूस में बने हैं इसलिए हम उनके रखरखाव, कलपुर्जों और नियमित तकनीक स्थानांतरण के लिए रूस पर निर्भर हैं। ऐसे में कड़ा आकलन करना जरूरी था। रूस भारत के चाय निर्यात का भी सबसे विश्वसनीय और बड़ा बाजार है। अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बढ़ी जटिलताओं के बीच इस बात का महत्त्व और बढ़ गया है। भारत, पाकिस्तान के साथ कश्मीर विवाद के मामले में सुरक्षा परिषद में समर्थन के लिए भी रूस पर निर्भर है और उसने 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूसी हमले के बीच हुई रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मुलाकात को जरूर चिंता की दृष्टि से देखा होगा। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में भारत के वक्तव्य में कहा गया है, ‘यह दुख की बात है कि कूटनीति के रास्ते को त्याग दिया गया’, यह भाषा बताती है कि भारत रूस के कदम की कूटनीतिक आलोचना में काफी आगे बढ़ गया।
भारत द्वारा मतदान से अनुपस्थित रहने को पश्चिमी साझेदारों की जटिल प्रतिक्रिया के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। रूस के सबसे बड़े बैंक और रूसी कुलीनों तथा उनके परिवारों पर सोसाइटी फॉर वल्र्डवाइड फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन (स्विफ्ट) भुगतान प्रणाली में पूर्ण प्रतिबंध, 13 अहम रूसी वित्तीय संस्थानों पर नए ऋण तथा इक्विटी प्रतिबंध तथा अमेरिकी सैन्य वस्तुओं (उन समेत जिन्हें विदेशी कंपनियां बनाती हैं और जो अमेरिकी सॉफ्टवेयर का प्रयोग करती हैं) की खरीद को सीमित करना जैसे कदम निश्चित रूप से मुश्किल हालात पैदा करेंगे। इसके साथ ही रिश्तों की पारस्परिक निर्भरता को दर्शाते हुए रूस से यूरोप को होने वाली गैस आपूर्ति को बाधित नहीं किया गया है, यूक्रेन के रास्ते होने वाली आपूर्ति जरूर बाधित हो सकती है क्योंकि रविवार को पाइपलाइन तथा अन्य संबद्ध केंद्रों पर हमले किए गए। इसके अलावा जर्मनी ने रूस और जर्मनी के बीच की नॉर्ड 2 पाइपलाइन का प्रमाणन रोक दिया है जबकि यह यूरोप को गैस आपूर्ति के दौरान यूक्रेन को किनारे करने की रूस की नीति के लिए अहम है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि इस परियोजना को त्याग दिया गया है। पाइपलाइन गत वर्ष पूरी हुई थी और उसे शुरू करने के पहले प्रमाणन की आवश्यकता थी। यानी अगर रूस और पश्चिमी देश किसी मान्य कूटनीतिक हल पर पहुंचते हैं तो इसे दोबारा शुरू किया जा सकता है। यूक्रेन संकट को लेकर भारत की यह प्रतिक्रिया अल्पकालिक संतुलनकारी कृत्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। व्यापक भूराजनीतिक क्षेत्र में उसका सामना अमेरिका और चीन से है। हालिया दशकों में भारत की सामरिक सोच अमेरिका के साथ अपना रक्षा गठजोड़ मजबूत करने का रही। यह कदम अमेरिका के हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के दबदबे को संतुलित करने के विचार के अनुरूप है। यूरोप का संकट निकट भविष्य में समाप्त होता नहीं दिखता। इसका नतीजा अमेरिका के संसाधनों और उसके ध्यान में भटकाव के रूप में दिख सकता है। चीन हमारी उत्तरी सीमा पर बल प्रयोग कर रहा है, ऐसे में हमें इस संकट को लेकर भी तैयारी रखनी होगी।

First Published - February 27, 2022 | 11:15 PM IST

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Last Updated- December 11, 2022 | 9:01 PM IST

भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उस प्रस्ताव पर मतदान से परहेज किया जो यूक्रेन पर रूस के हमले के खिलाफ लाया गया। भारत के अलावा चीन और संयुक्त अरब अमीरात ने भी मतदान से दूरी बनाई। भारत का यह कदम समझदारी भरा है क्योंकि सीमित कूटनीतिक विकल्प के बीच यह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए लिया जा सकने वाला सही निर्णय था। मतदान न करने को यूक्रेन में रूस के कदमों का समर्थन नहीं माना जा सकता लेकिन इस कदम ने भारत को यह अवसर प्रदान किया कि वह रूस एवं सोवियत संघ के साथ सात दशक पुराने अपने रिश्तों को कोई क्षति पहुंचाए बिना क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर अपने दीर्घकालिक कूटनीतिक रुख को बरकरार रख सके। हमारे सशस्त्र बलों के अधिकांश हथियार रूस में बने हैं इसलिए हम उनके रखरखाव, कलपुर्जों और नियमित तकनीक स्थानांतरण के लिए रूस पर निर्भर हैं। ऐसे में कड़ा आकलन करना जरूरी था। रूस भारत के चाय निर्यात का भी सबसे विश्वसनीय और बड़ा बाजार है। अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद बढ़ी जटिलताओं के बीच इस बात का महत्त्व और बढ़ गया है। भारत, पाकिस्तान के साथ कश्मीर विवाद के मामले में सुरक्षा परिषद में समर्थन के लिए भी रूस पर निर्भर है और उसने 24 फरवरी को यूक्रेन पर रूसी हमले के बीच हुई रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मुलाकात को जरूर चिंता की दृष्टि से देखा होगा। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र में भारत के वक्तव्य में कहा गया है, ‘यह दुख की बात है कि कूटनीति के रास्ते को त्याग दिया गया’, यह भाषा बताती है कि भारत रूस के कदम की कूटनीतिक आलोचना में काफी आगे बढ़ गया।
भारत द्वारा मतदान से अनुपस्थित रहने को पश्चिमी साझेदारों की जटिल प्रतिक्रिया के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। रूस के सबसे बड़े बैंक और रूसी कुलीनों तथा उनके परिवारों पर सोसाइटी फॉर वल्र्डवाइड फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन (स्विफ्ट) भुगतान प्रणाली में पूर्ण प्रतिबंध, 13 अहम रूसी वित्तीय संस्थानों पर नए ऋण तथा इक्विटी प्रतिबंध तथा अमेरिकी सैन्य वस्तुओं (उन समेत जिन्हें विदेशी कंपनियां बनाती हैं और जो अमेरिकी सॉफ्टवेयर का प्रयोग करती हैं) की खरीद को सीमित करना जैसे कदम निश्चित रूप से मुश्किल हालात पैदा करेंगे। इसके साथ ही रिश्तों की पारस्परिक निर्भरता को दर्शाते हुए रूस से यूरोप को होने वाली गैस आपूर्ति को बाधित नहीं किया गया है, यूक्रेन के रास्ते होने वाली आपूर्ति जरूर बाधित हो सकती है क्योंकि रविवार को पाइपलाइन तथा अन्य संबद्ध केंद्रों पर हमले किए गए। इसके अलावा जर्मनी ने रूस और जर्मनी के बीच की नॉर्ड 2 पाइपलाइन का प्रमाणन रोक दिया है जबकि यह यूरोप को गैस आपूर्ति के दौरान यूक्रेन को किनारे करने की रूस की नीति के लिए अहम है। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि इस परियोजना को त्याग दिया गया है। पाइपलाइन गत वर्ष पूरी हुई थी और उसे शुरू करने के पहले प्रमाणन की आवश्यकता थी। यानी अगर रूस और पश्चिमी देश किसी मान्य कूटनीतिक हल पर पहुंचते हैं तो इसे दोबारा शुरू किया जा सकता है। यूक्रेन संकट को लेकर भारत की यह प्रतिक्रिया अल्पकालिक संतुलनकारी कृत्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। व्यापक भूराजनीतिक क्षेत्र में उसका सामना अमेरिका और चीन से है। हालिया दशकों में भारत की सामरिक सोच अमेरिका के साथ अपना रक्षा गठजोड़ मजबूत करने का रही। यह कदम अमेरिका के हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के दबदबे को संतुलित करने के विचार के अनुरूप है। यूरोप का संकट निकट भविष्य में समाप्त होता नहीं दिखता। इसका नतीजा अमेरिका के संसाधनों और उसके ध्यान में भटकाव के रूप में दिख सकता है। चीन हमारी उत्तरी सीमा पर बल प्रयोग कर रहा है, ऐसे में हमें इस संकट को लेकर भी तैयारी रखनी होगी।

First Published - February 27, 2022 | 11:15 PM IST

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