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जोखिम बरकरार

Last Updated- December 12, 2022 | 3:36 AM IST

हाल के दिनों में देश के वृहद आर्थिक परिदृश्य को लेकर कुछ अच्छी खबरें सामने आई हैं। इससे संकेत मिलता है कि आर्थिक उत्पादन और गतिविधियों पर महामारी की दूसरी लहर का असर उतना अधिक नहीं रहा जितना होने की आशंका आरंभ में जताई जा रही थी। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में व्यक्तिगत आय कर और कॉर्पोरेशन कर के अग्रिम संग्रह के आंकड़े इसका उदाहरण हैं। पिछले वर्ष की समान तिमाही (उस वक्त देशव्यापी लॉकडाउन का असर दिखने लगा था) से तुलना करें तो केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक अग्रिम कर संग्रह 150 फीसदी बढ़ा है। मई में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह 1.02 लाख करोड़ रुपये रहा जो पिछले महीनों से कम है। जून में ई-वे बिल के अब तक आए आंकड़े बताते हैं कि इसमें भी तेजी आ सकती है। कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि कर संबंधी आंकड़े इस बात का समर्थन करते हैं कि दूसरी लहर के बावजूद पहली तिमाही में सालाना आधार पर होने वाली वृद्धि दो अंकों में रही, हालांकि आधार काफी कम था।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने जुलाई के बुलेटिन में कुछ अन्य कारकों को रेखांकित किया जिनके चलते अर्थव्यवस्था में आशावाद की सतर्क तरीके से वापसी हो रही है। केंद्रीय बैंक का आकलन है कि दूसरी लहर के दौरान छोटे और स्थानीय लॉकडाउन ने दरअसल मांग को नुकसान पहुंचाया, आपूर्ति को नहीं। बुलेटिन में जोर देकर कहा गया कि कृषि समेत समग्र आपूर्ति की स्थिति के कई पहलू बरकरार हैं। अब तक मॉनसून भी सामान्य से 31 फीसदी अधिक रहा है। इससे यही संकेत निकलता है कि ये अच्छी परिस्थितियां बरकरार रह सकती हैं। आरबीआई का यह संकेत भी है कि उसे लगता है कि औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में तेजी आई है। ऐसा तब हुआ है जब दूसरी लहर के  कारण आरबीआई ने पूरे वर्ष की जीडीपी वृद्धि का अनुमान 10.5 फीसदी से घटाकर 9.5 फीसदी कर दिया है।
परंतु देश में टिकाऊ आर्थिक सुधार को अभी भी कई जोखिम हैं। टीकाकरण के स्तर और गति को देखते हुए निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि भारत महामारी की एक और लहर से पूरी तरह सुरक्षित ही रहेगा। मुद्रास्फीति का सवाल भी हमारे सामने है। मई माह में उपभोक्ताा मूल्य महंगाई 6.3 फीसदी रही जो अनुमान से काफी अधिक है। थोक मूल्य महंगाई भी नए रिकॉर्ड तय कर रही है और कई लोगों का अनुमान है कि मूल मुद्रास्फीति भी काफी ऊंचे स्तर पर है। आरबीआई का जोर इस बात पर है कि दूसरी लहर में समग्र मांग को क्षति पहुंची है और ऐसे में जब कभी मांग में सुधार होगा तो पहले से बने महंगाई के हालात और अधिक कठिन हो सकते हैं। ईंधन क्षेत्र में सालाना आधार पर मुद्रास्फीति 11.6 फीसदी है। यह दर्शाता है कि बाह्य कारकों की अपनी भूमिका होगी। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने जहां चालू वित्त वर्ष के लिए 5 फीसदी मुद्रास्फीति की दर का अनुमान रखा है, वहीं आगे चलकर उसे इस पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। ऐसा लगता नहीं है कि उक्त दर आरबीआई के बुलेटिन में प्रस्तुत वृहद आर्थिक तस्वीर से पूरी तरह मेल खाती है।
ऐसे में किसी भी तरह का आशावाद दिखाना अपरिपक्वता होगी। महामारी अभी समाप्त नहीं हुई है और वृद्धि और मूल्य स्थिरता के समक्ष अभी कई जोखिम मौजूद हैं। सबसे बेहतर नीतिगत प्रतिक्रिया यही होगी कि टीकाकरण बढ़ाकर और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत बनाकर तीसरी लहर के खतरे को समाप्त किया जाए। ऐसा करने से महामारी का असर कम होगा। भारत को अभी पूर्ण आर्थिक सुधार के मामले में लंबा सफर तय करना है।

First Published - June 17, 2021 | 9:02 PM IST

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