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PPP मॉडल का पुनर्जीवन: भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को गति देने के लिए रीसेट जरूरी

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वर्ष 2000 के दशक के बुनियादी ढांचा में उछाल के दौरान विशेषकर राष्ट्रीय राजमार्गों, बिजली, बंदरगाहों और हवाईअड्डों के क्षेत्र में पीपीपी परियोजनाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई

Last Updated- February 24, 2026 | 10:05 PM IST
PPP Model

भारत का सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल एक स्पष्ट सबक देता है। जब इन परियोजनाओं की डिजाइन संतुलित होती है और इनका क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से किया जाता है तब वे बुनियादी ढांचा के विकास को नई गति दे सकती हैं लेकिन यदि इनकी संरचना त्रुटिपूर्ण हो तो वही परियोजनाएं वर्षों तक वृद्धि की रफ्तार को बढ़ने नहीं देतीं।

वर्ष 2000 के दशक के बुनियादी ढांचा में उछाल के दौरान विशेषकर राष्ट्रीय राजमार्गों, बिजली, बंदरगाहों और हवाईअड्डों के क्षेत्र में पीपीपी परियोजनाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 2007-12) के दौरान बुनियादी ढांचा व्यय का लगभग 37 फीसदी हिस्सा निजी निवेश से आया। वर्ष 2009 से 2013 के बीच, नए राष्ट्रीय राजमार्गों का लगभग 60 फीसदी यानी 6,300 किलोमीटर से अधिक सड़कें, टोल आधारित ‘बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर’ (बीओटी) मॉडल के तहत पीपीपी के माध्यम से तैयार की गईं।

हालांकि यह रफ्तार अधिक समय तक कायम नहीं रह सकी। 2010 के दशक के मध्य तक अनेक पीपीपी परियोजनाएं धीमी पड़ गईं, वित्तीय संकट में फंस गईं या भुगतान चूक वाली स्थिति में पहुंच गईं। इसके अलावा डेवलपर को भूमि अधिग्रहण और मंजूरी मिलने में देरी, यातायात वृद्धि में कमी, अत्यधिक ऋण भार और बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कई कंपनियों ने बहुत कम टोल दरों का अनुमान लगाकर आक्रामक बोली लगाई। इससे वे परियोजनाएं तो जीत गईं लेकिन बाद में कम आमदनी के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई और उनकी बैलेंसशीट पर बुरा असर पड़ा।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि इसमें जोखिम का बंटवारा संतुलित नहीं था। अत्यधिक जोखिम वाले पहलू निजी क्षेत्र पर डाल दिए गए और अनुबंधों को लगभग अपरिवर्तनीय माना गया। औपचारिक तौर पर दोबारा विचार या दोबारा समझौते की व्यवस्था न होने के कारण मूल रूप से व्यवहारिक परियोजनाएं भी अटक गईं। जैसा कि केलकर समिति (2015) ने भी चेतावनी दी थी, ‘जोखिम का अक्षम और असमान वितरण पीपीपी परियोजनाओं की विफलता का एक प्रमुख कारण बन सकता है।’

इस वर्ष के केंद्रीय बजट में एक बार फिर अ‍वसंरचना को विकास का प्रमुख इंजन बताते हुए परिवहन, शहरी विकास, आवास, लॉजिस्टिक्स और वित्तीय फंडिंग के क्षेत्रों में अनेक पहल की घोषणा की गई है। लेकिन इसमें भारत के बुनियादी ढांचा रणनीति के सामने खड़े सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न को नजरअंदाज किया गया है कि देश पीपीपी को बुनियादी ढांचा विकास के केंद्रीय स्तंभ के रूप में कैसे फिर से बहाल करेगा? यह चूक वैचारिक नहीं बल्कि संरचनात्मक है। सार्वजनिक वित्त की अपनी सीमाएं हैं। राज्य सरकारें और शहर पहले से ही वित्तीय दबाव में हैं।

शहरी परिवहन, जल आपूर्ति, स्वच्छता, बिजली और लॉजिस्टिक्स जैसी बुनियादी ढांचा आवश्यकताएं बजटीय क्षमता से कहीं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे हालात में पीपीपी कोई विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। फिर भी हाल के वर्षों में निजी भागीदारी अपने पूर्व उच्च स्तर से घटकर लगभग 20-22 फीसदी पर आ गई है (आर्थिक सर्वेक्षण 2024)।

अगर इस रुझान को नहीं बदला गया तब भारत की बुनियादी ढांचा महत्त्वाकांक्षा केवल आकांक्षा बनकर रह सकती है। सरकार ने हाल ही में तीन वर्षों के लिए 852 परियोजनाओं की पीपीपी पाइपलाइन की घोषणा की है जिनका कुल मूल्य लगभग 17 लाख करोड़ रुपये है। इनमें से 232 केंद्रीय परियोजनाएं लगभग 13.15 लाख करोड़ रुपये की हैं जबकि शेष 620 परियोजनाएं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से संबंधित हैं।

राष्ट्रीय राजमार्गों का इसमें सबसे बड़ा हिस्सा है और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय अकेले लगभग 8.77 लाख करोड़ रुपये की 108 परियोजनाओं की योजना बना रहा है। इसके अतिरिक्त बिजली, जल, बंदरगाह, हवाई अड्डों, रेलवे और शहरी बुनियादी ढांचा के क्षेत्रों में भी बड़े पैमाने पर परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने भी सैकड़ों परियोजनाएं सूचीबद्ध की हैं।
एक विश्वसनीय पीपीपी व्यवस्था की पुनर्बहाली के लिए स्पष्ट सुधार एजेंडा आवश्यक है। नौ महत्त्वपूर्ण सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है।

1. वास्तविक जोखिम वितरण: जोखिम उन्हीं पर होने चाहिए जो उन्हें सबसे बेहतर तरीके से इसका प्रबंधन कर सकते हैं। सरकारों पर भूमि, स्वीकृति और नीतिगत जोखिम की जिम्मेदारी रहनी चाहिए जबकि निजी भागीदारों को निर्माण और संचालन के जोखिम को तय सीमाओं के भीतर संभालना चाहिए।

2. पूर्वनिर्धारित पुनर्विचार ढांचे: अनुबंधों में संरचनात्मक पुनर्विचार की अनुमति होनी चाहिए जिसमें पूर्वनिर्धारित परिस्थितियां हों और पारदर्शिता एवं स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित की जाए।

3. मजबूत पीपीपी संस्थाएं: क्षमता निर्माण और मॉडल विकास के लिए नए सिरे से बहाल संस्थागत ढांचा जरूरी है, जैसे कि इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनैंस सेक्रेटेरियट को मजबूत किया जाए या फिर 3पी इंडिया को नए सिरे से खड़ा किया जाए।

4. सरल और तेज परियोजना मूल्यांकन: परियोजनाओं की जांच और मंजूरी तेज, पारदर्शी और भरोसेमंद होनी चाहिए और इनका पीएम गतिश​क्ति के साथ एकीकरण होना चाहिए जिससे निवेशक आसानी से निवेश कर सकें।

5. वित्तीय समर्थन एवं ऋण सुधार: व्यावहारिक लागत अंतर फंडिंग, प्रस्तावित बुनियादी ढांचा जोखिम गारंटी फंड और नैशनल बैंक फॉर इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट द्वारा ऋण की सुरक्षा बढ़ाना ऋण की लागत को काफी कम कर सकता है।

6. नियामकीय निश्चितता और विवाद निवारण: स्थिर शुल्क, स्वतंत्र नियामक और तेज विवाद समाधान प्रणाली अपरिहार्य हैं।

7. राज्यों और शहरों को सशक्त बनाना: राज्य पीपीपी सेल, परियोजना-तैयारी सुविधाएं और सुधार से जुड़े प्रोत्साहन मजबूत किए जाने चाहिए। लंबी अवधि के सब्सिडी वाले राज्य ऋण को सीधे पीपीपी सुधारों से जोड़ना लाभकारी होगा।

8. निवेशक सहभागिता में सक्रियता: भरोसा बहाल करने के लिए सफलता की कहानियों को प्रचारित करना, निवेशकों से सक्रिय रूप से संवाद करना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

9. नए क्षेत्रों में पीपीपी का विस्तार: विभिन्न क्षेत्रों जैसे शहरी परिवहन, जल, अपशिष्ट, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और ऊर्जा संक्रमण के लिए विशेष पीपीपी मॉडल तैयार करना जरूरी है।

जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात बजट या योजनाओं में गायब है, वह यह मान्यता है कि पीपीपी ही वह मूल सिद्धांत होनी चाहिए जो सार्वजनिक निवेश, निजी वित्त, जोखिम वितरण और दीर्घकालीन सेवा प्रदान करने को एक साथ जोड़े। उदाहरण के लिए, अर्बन चैलेंज फंड पर विचार करें जो परियोजना लागत के 25 फीसदी तक की फंडिंग करेगा जबकि शेष राशि बॉन्ड, बैंक ऋण और पीपीपी के माध्यम से जुटाई जाएगी। या फिर ‘सिटी इकनॉमिक रीजन’ जिनमें से प्रत्येक को अगले पांच वर्षों में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का समर्थन मिलेगा।

नगर निगम बॉन्डों के लिए बजट की पहल स्वागत योग्य है। 1,000 करोड़ रुपये से अधिक के एकल निर्गम पर लगभग 100 करोड़ का प्रोत्साहन और 200 करोड़ तक के निर्गम पर एएमआरयूटी से जुड़ा समर्थन यह संकेत देता है कि शहरी पूंजी बाजार को गहरा किया जाना है। भारत की अवसंरचना चुनौती अब केवल संपत्ति निर्माण तक सीमित नहीं है। यह जोखिम प्रबंधन, जीवनचक्र दक्षता, संचालन और रखरखाव, और सेवा गुणवत्ता से जुड़ी है। भारत में पहले हुए पीपीपी असफलताओं की वजह डिजाइन और प्रशासन में कमजोरी थी न कि सिद्धांत में। समाधान यह नहीं कि पीपीपी से पीछे हट जाएं बल्कि इसमें निर्णायक रूप से सुधार लाना है।

विकसित भारत की दिशा में बढ़ते हुए, भारत को यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी कि केवल सार्वजनिक निवेश पर्याप्त नहीं होगा। पीपीपी की नए सिरे से बहाली निजीकरण नहीं बल्कि साझेदारी है। देश की अवसंरचना यात्रा का अगला चरण केवल कंक्रीट और इस्पात से नहीं बल्कि भरोसेमंद अनुबंधों, संतुलित जोखिम वितरण और संस्थागत विश्वास के साथ बनाया जाना चाहिए। यही वह बदलाव है जिसमें देश अब और विलंब नहीं कर सकता।


(लेखक बुनियादी ढांचा क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। वह ‘द इन्फ्राविजन फाउंडेशन’ के संस्थापक और प्रबंध न्यासी भी हैं। इस लेख से जुड़े शोध में मुतुम चौबिसाना का भी सहयोग है)

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First Published - February 24, 2026 | 10:02 PM IST

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