वाहन क्षेत्र के लिए सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना में एथर एनर्जी शामिल होने को इच्छुक है। कंपनी के सह संस्थापक और मुख्य कार्याधिकारी तरुण मेहता ने कहा कि कंपनी को इस योजना का लाभ मिलने से भारत के इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन के निर्यात का बड़ा अवसर खुल सकता है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सख्त पात्रता नियम के कारण केवल इलेक्ट्रिक स्टार्टअप के रूप में काम कर रही कंपनियों को पॉलिसी से बाहर कर दिया है, जबकि इलेक्ट्रिफिकेशन को गति देने के लिए लिए यह पॉलिसी लाई गई थी।
मेहता ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के वार्षिक कार्यक्रम मंथन 2026 में कहा, ‘अगर पीएलआई अपने वादे को पूरा करती है तो भारत से इलेक्ट्रिक दोपहिया का निर्यात व्यापक पैमाने पर शुरू हो सकता है। भारत इस समय बड़े निर्यात बाजार के द्वार पर खड़ा है।’
उन्होंने कहा, ‘इसका 100 अरब डॉलर का वैश्विक बाजार है। लेकिन पीएलआई में सुधार की जरूरत है। अगर आप स्टार्टअप थे तो इस योजना में आवेदन नहीं कर सकते। आवेदन का एकमात्र तरीका यह है कि आपके पास राजस्व न हो। यह साफतौर पर एक गलती है। अगर किसी स्टार्टअप के पास 100 रुपये राजस्व है तो क्या होगा? आप आवेदन नहीं कर सकेंगे। इसे ठीक करने की जरूरत है।’
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 15 सितंबर, 2021 को वाहन और उनके कल पुर्जे के लिए पीएलआई योजना को मंजूरी दी थी। इस मद में 5 साल के लिए 25,938 करोड़ रुपये आवंटित किए गए। इसका मकसद उन्नत ऑटोमोटिव तकनीकों के साथ घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना है, जिसके तहत बढ़ी बिक्री पर प्रोत्साहन देने की पेशकश की गई थी। इस योजना के तहत 115 कंपनियों ने आवेदन किया, जिसमें से 82 को मंजूदी मिली। इसमें ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (ओईएम), वाहन निर्माता और कल पुर्जा बनाने वाली फर्में शामिल हैं।
योजना के नियमों के मुताबिक ओईएम को प्रोत्साहन योजना की पात्रता हासिल करने के लिएपहले साल में कम से कम 125 करोड़ रुपये के वाहनों की बिक्री करनी होगी और लाभ जारी रखने के लिए साल में 10 प्रतिशत बिक्री बढ़ानी होगी। मेहता ने कहा कि यह योजना अच्छी नीयत से बनाई गई है, लेकन सिर्फ इलेक्ट्रिक वाली स्टार्टअप की राह में अनपेक्षित बाधाएं हैं। भारत पहले से ही जाने माने निर्माताओं के माध्यम से पेट्रोल से चलने वाले दोपहिया वाहनों का निर्यात करता है, लेकिन इस क्षेत्र के वैश्विक राजस्व में भारत की हिस्सेदारी मामूली है। उन्होंने कहा, ‘राजस्व का बड़ा हिस्सा हमारे पास नहीं आता बल्कि यह चीन व जापान की कंपनियों के पास जाता है, जिन्होंने पेट्रोल से चलने वाले बेहतरीन दोपहिया वाहनों के ब्रान्ड बनाए हैं।’