अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं, उन्होंने 14 फरवरी को म्युनिख सुरक्षा सम्मेलन में जो बहुप्रतीक्षित भाषण दिया उससे शायद ज्यादातर यूरोपीय श्रोताओं ने राहत की सांस ली होगी। लेकिन ग्लोबल साउथ के उत्तर-औपनिवेशिक और विकासशील देशों के लिए यह गंभीर चिंता का कारण होना चाहिए। उनके वक्तव्य में विजय, शोषण, बर्बरता और यहां तक कि जातीय सफाये के इतिहास का महिमामंडन झलक रहा था, जो एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में पश्चिमी साम्राज्यवाद और औपनिवेशिक साम्राज्य-निर्माण के इतिहास को बताता है।
वह इसे गौरव और प्रेरणा का स्रोत बनाना चाहते हैं न कि ऐसी चीज जिसे ‘पिछली पीढ़ियों के कथित पापों के रूप में प्रायश्चित’ किया जाए। गौर करने की बात यह है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के विश्व-इतिहास, जिसे अक्सर अमेरिकी युग कहा जाता है, को वास्तव में पश्चिमी पतन का काल माना गया। ‘1945 में, कोलंबस के युग के बाद पहली बार, यह (पश्चिम) सिकुड़ रहा था।
महान पश्चिमी साम्राज्य अपने पतन की ओर बढ़ चुके थे, जिसे नास्तिक साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेश-विरोधी विद्रोहों ने और तेज कर दिया। ये विद्रोह दुनिया को बदलने वाले थे और आने वाले वर्षों में मानचित्र के विशाल हिस्सों पर हंसिया और हथौड़े का परचम लहराने वाले थे।
उपनिवेश-विरोधी विद्रोह, जिनमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ हमारा संघर्ष भी शामिल है, को स्वतंत्रता और मानव गरिमा के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि पश्चिमी शासन-इच्छा के त्याग के प्रमाण के रूप में देखा जा रहा। यह अजीब है कि यह सब उस देश के प्रतिनिधि की ओर से आ रहा है जो स्वयं ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपनी सफल स्वतंत्रता संग्राम की 250वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की उस इच्छा की प्रतिध्वनि है जिसमें वे अमेरिका को फिर क्षेत्रीय विस्तार के मार्ग पर ले जाना चाहते हैं।
संभवतः इसमें ग्रीनलैंड भी शामिल होगा, यद्यपि रुबियो ने इसका उल्लेख नहीं किया। डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने पुष्टि की है कि आर्कटिक द्वीप पर अमेरिकी अधिग्रहण का खतरा बना हुआ है। रुबियो ने क्यूबा के स्पेनिश विजेताओं अपनी उत्पत्ति को महिमामंडित करते हुए कहा, ‘जिस व्यक्ति ने मेरे जन्मस्थान के राष्ट्र को बसाया और बनाया, वह हमारे तटों पर अपने पूर्वजों के ईसाई विश्वास की स्मृतियां और परंपराएं एक पवित्र धरोहर के रूप में लेकर आया था, जो पुराने और नए विश्व के बीच एक असह्य कड़ी थी।’
उन्होंने क्यूबा की मूल जनसंख्या के अंधाधुंध नरसंहार का उल्लेख नहीं किया, जबकि ऐसा पूरे अमेरिका में हुआ था। उन्होंने अमेरिका में यूरोपीय प्रवासियों की मेहनत और उन्नत भावना की प्रशंसा की। उन्होंने दक्षिण अमेरिका में कपास के खेतों पर काम करने के लिए लाए गए अश्वेत दासों के पसीने और श्रम को लेकर एक शब्द भी नहीं कहा।
उनके वंशज और अफ्रीकी-अमेरिकी आबादी, जो अब अमेरिका की जनसंख्या का 14 फीसदी से अधिक हिस्सा हैं, स्पष्ट रूप से उस यूरोपीय विरासत का हिस्सा नहीं हैं जिसका महिमामंडन रुबियो करते हैं। उन्होंने अभूतपूर्व प्रवासन की लहर की निंदा करते हुए कहा कि ‘ये हमारे समाजों की एकता, हमारी संस्कृति की निरंतरता और हमारे लोगों के भविष्य को खतरे में डालती है।’
संभवतः इसमें उनके जैसे यूरोपीय मूल के श्वेत प्रवासियों को शामिल नहीं किया गया है। संक्षेप में, रुबियो के वक्तव्य एक बेशर्म श्वेत, नस्लवादी घोषणापत्र हैं जिन्हें यूरोप और विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के लोगों द्वारा उजागर और आलोचना की जानी चाहिए। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह औपनिवेशिक उद्यम के साथ चलने वाली हिंसा की एक अप्रत्यक्ष वैधता भी है। इसका प्रतिबिंब हमें पश्चिम द्वारा इजरायल के गाज़ा में नरसंहार और वेस्ट बैंक में जातीय सफाये को बर्दाश्त करने में दिखाई देता है।
यही मानसिकता ईरान के परमाणु स्थलों पर बमबारी और वेनेजुएला जैसे एक संप्रभु देश के राष्ट्राध्यक्ष के अपहरण जैसी खुली आक्रामकता के पीछे भी है। यह नव-औपनिवेशिक महत्त्वाकांक्षा का घोषणापत्र है, जिसका 21वीं सदी की हमारी दुनिया में कोई स्थान नहीं है। इसे म्यूनिख में एकत्रित तथाकथित उदारवादी पश्चिमी लोकतंत्रों द्वारा अस्वीकार किया जाना चाहिए था और इसकी भर्त्सना होनी चाहिए थी।
इसके विपरीत कई लोगों ने रुबियो के वक्तव्यों की सराहना की और उन्हें ‘आश्वस्त करने वाला’ पाया। इनमें से कई देश, अमेरिका की तरह, बहुलतावादी लोकतंत्र हैं जिनकी बड़ी बहुजातीय जनसंख्या है। उनके यहां कुछ गैर यूरोपीय नागरिक सरकार में वरिष्ठ पदों पर आसीन हैं और विभिन्न क्षेत्रों में पेशेवर के रूप में काम कर रहे हैं। यह सोचने लायक है कि रुबियो के वक्तव्यों और, उससे भी अधिक चिंताजनक, उन्हें मिली तालियों को वे कितना आश्वस्तकारी मानते होंगे।
आश्चर्यजनक यह है कि अब तक ग्लोबल साउथ देशों की प्रतिक्रिया बहुत ही सुस्त रही है, जबकि उसके कई प्रतिनिधि म्यूनिख में उपस्थित थे। रुबियो के लिए विकासशील विश्व केवल एक बाजार है, जिसमें अमेरिका और यूरोप को ‘बाजार हिस्सेदारी’ हासिल करनी है, न कि शांति और विकास की दिशा में कोई साझेदार बनना है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उस अत्यंत बदनाम युग में ऐसे नव-औपनिवेशिक और नस्लवादी दृष्टिकोणों की सार्वभौमिक निंदा होती।
भारत जैसे देश इस भाषा की निंदा करने और इसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जनमत जुटाने में अग्रणी भूमिका निभाते। यहां तक कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी, जो सम्मेलन में मौजूद थे, ने भी रुबियो के वक्तव्यों को नजरअंदाज किया। केवल दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील से कुछ संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियां सामने आई हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि आज की दुनिया में विदेश नीति किस हद तक लेन-देन आधारित हो गई है। हम उस खतरनाक दिशा की अनदेखी कर रहे हैं जिसमें एक श्रेष्ठतावादी विचारधारा हमें ले जा रही है।
अशांति का एक और कारण है संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षवाद को अस्वीकार करना। यह एक अराजक और अव्यवस्थित दुनिया की ओर संकेत करता है, जहां हिंसा और हिंसा की धमकी, पसंदीदा साधन बन जाते हैं। जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटने के बहुपक्षीय प्रयास को ‘क्लाइमेट कल्ट’ को तुष्ट करने के रूप में खारिज कर दिया गया है। यदि किसी प्रमाण की आवश्यकता थी कि हम ‘विघटन’ के युग में जी रहे हैं, जैसा कि हाल ही में दावोस मंच पर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने वर्णित किया था, तो इस भाषण से हर शंका दूर हो जानी चाहिए।
भारत इस वर्ष के अंत में ब्रिक्स प्लस शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। इस समूह में कुछ प्रमुख शक्तियां शामिल हैं जिनके पास महत्त्वपूर्ण स्वतंत्र सत्ता है और यह निश्चित रूप से केवल पश्चिमी देशों के बीच बांटने के लिए कोई साधारण बाजार नहीं है। इन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि उभरते वैश्विक व्यवस्था का स्वरूप कैसा होना चाहिए। इन्हें नव-औपनिवेशिक दावों और नस्लवादी पूर्वग्रहों को अस्वीकार करना चाहिए और बहुपक्षवाद तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों और प्रावधानों में अपने विश्वास की पुनः पुष्टि करनी चाहिए।
आशा है कि, जैसा अतीत में हुआ है, भारत एक प्रतिगामी और पुरानी विश्व दृष्टि के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय जनमत जुटाने में अग्रणी भूमिका निभाएगा, जिसकी रूपरेखा गाजा में नजर आ रही है और जो जल्द ही दुनिया के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)