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कामगारों की उपलब्धता से अधिक अहम होगी गुणवत्ता

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Last Updated- December 19, 2022 | 10:35 PM IST
जिंदगीनामा: श्रमिकों की भर्ती का ठेकेदार नहीं बने सरकार, Government should not become the contractor for recruitment of workers

हम श्रमिकों की आपूर्ति और बचत को लेकर एशिया की वृद्ध होती आबादी के प्रभाव का आकलन करने की परियोजना पर काम कर रहे हैं। इस परियोजना के पहले निष्कर्ष की चर्चा हमने पिछले महीने की थी। इसका सार यही था कि एशिया की दस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं (ए-10: चीन, भारत, इंडोनेशिया, जापान, फिलिपींस, वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया, मलेशिया और ताइवान ) में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की गति आर्थिक संक्रमण से कहीं तेज है। यहां हम शोध के दूसरे निष्कर्ष की चर्चा करेंगे, जो कार्यबल की क्षमताओं से जुड़ा है। इसका सार यही निकलता है कि कार्यबल की क्षमताएं और काबिलियत उसकी संख्या या उपलब्धता पर भारी पड़ने वाली हैं।

कम से कम अगले एक दशक तो यही रुझान दिखने के आसार हैं।  ए-10 देश, जो विनिर्मित वस्तुओं के वैश्विक व्यापार में वर्चस्व रखते हैं, उनकी संख्या 2010 तक वृद्धिशील वैश्विक कामगारों की आधी थी, लेकिन जल्द ही उनकी कामकाजी आबादी बूढ़ी होती दिखेगी। वहीं वैश्विक आबादी तो अभी भी निरंतर बढ़ने पर है, लेकिन जिन देशों में युवाओं की आबादी बढ़ रही है, उनमें राजनीतिक रूप से स्थिरता कम होने के साथ ही आर्थिक मोर्चे पर उनका जुड़ाव भी नहीं है।

इन देशों के रुझान भी विविधता लिए हुए हैं। जहां भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस में कामगारों की संख्या में सालाना 0.9 से 1.6 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा सकती है, लेकिन चीन, जापान, थाईलैंड और दक्षिण कोरिया में यह सालाना 0.2 से एक प्रतिशत के संकुचन का शिकार हो सकती है। इसके अतिरिक्त, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में श्रम बल भागीदारी अनुपात तो ऊंचा रहा है, लेकिन वह भी अब अवसान की ओर है, जिसमें निकट भविष्य में और गिरावट के आसार हैं।

इस गिरावट का एक बड़ा पहलू यही है कि लोग शिक्षा प्राप्त करने में अधिक वर्ष लगा रहे हैं, लेकिन यह कामगार उपलब्धता को घटा देता है। इसके अतिरिक्त, हमारे ट्रेडमार्क-मालिकाना सर्वे के निष्कर्ष भी इस परिकल्पना को पुष्ट करते हैं कि उत्तर एशियाई देशों में जैसे-जैसे आय बढ़ती है, वैसे-वैसे औद्योगिक नौकरियों में काम करने की युवाओं की इच्छा भी घटती जाती है। अर्थव्यवस्थाओं के अधिक समृद्ध होने के कारण सेवाओं की बढ़ती मांग भी औद्योगिक कामगारों की उपलब्धता को प्रभावित करती है।

हालांकि, इससे पहले कि हम इन देशों में औद्योगिक कामगारों की किल्लत को लेकर चिंतित हों, यह ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि ए-10 देशों की 28 प्रतिशत कामकाजी आबादी अभी भी कृषि में लगी हुई है। कृषि कामगारों को औद्योगिक काम के लिए कौशल प्रदान करना यकीनन चुनौतीपूर्ण है, फिर भी औद्योगिक कामकाज की ओर सुस्त संक्रमण के बावजूद, कृषि में लगे लोग बढ़ती उम्र के कारण उससे बाहर हो रहे हैं और नई पीढ़ी कृषि के बजाय औद्योगिक या सेवा क्षेत्र की ओर उन्मुख हो रही है, जिनकी तादाद काफी बड़ी है। कृषि में श्रम उत्पादकता पांच प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ रही है, जो कामगारों में गिरावट की भरपाई कर रही है।

असल में दो कारक खासे महत्त्वपूर्ण हैं। एक कामगारों की गुणवत्ता और दूसरा कार्यस्थल की गुणवत्ता। जिन अभिभावकों के कम बच्चे होते हैं, उनके पास बच्चों के विकास में निवेश करने के लिए अधिक समय और संसाधन होते हैं। इससे न केवल उनकी शिक्षा का औसत स्तर, बल्कि उनका शारीरिक विकास भी प्रभावित होता है। एशिया के सभी देशों में कम वजन वाले बच्चों की संख्या सार्थक रूप से कम हुई है। बेहतर बाल पोषण भले ही सरकारी हस्तक्षेपों पर निर्भर करता है, लेकिन इसमें अभिभावकों द्वारा ध्यान रखा जाना भी मायने रखता है।

भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस जैसी अर्थव्यवस्थाओं में जहां कुपोषण के मामले अभी भी ऊंचे स्तर पर हैं, वहां यह एक अहम नीतिगत चुनौती है। वर्ष 1966 में जन्मे और 1990 में जन्मे बच्चों की लंबाई में सुधार 1990 में कायम टोटल फर्टिलिटी रेट या टीएफआर के साथ विपरीत रूप से सहसंबद्ध है और यह दोनों लैंगिक स्तर पर है। इस अवधि में दक्षिण कोरिया और चीन में वयस्कों की औसत लंबाई में तीन सेंटीमीटर से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

सभी क्षेत्रों में स्कूल की पढ़ाई की अवधि के औसत वर्ष बढ़े हैं, जिनमें तीन से पांच वर्षों की बढ़ोतरी हुई है और इस मोर्चे पर इंडोनेशिया और वियतनाम में सबसे अधिक सुधार हुआ है। एक बार पुनः यह सरकारी प्रयासों के साथ-साथ अभिभावकों की क्षमता और दृढ़ता से संभव होता दिखता है, क्योंकि उनके बच्चे कम हैं, जिनकी शिक्षा पर वे अधिक निवेश को तत्पर हैं।

वर्ष 2018 में चीन के आंकड़ों से इसे समझा जा सकता है, जहां 25 से 30 वर्ष की आयु के 27 प्रतिशत लोग स्नातक थे, जबकि 45 से 54 वर्ष आयु वर्ग में स्नातकों का आंकड़ा  7 प्रतिशत ही था। बेहतर शिक्षा कामगारों को अधिक प्रभावी मशीनों के उपयोग में सक्षम बनाती है, जिससे श्रम उत्पादकता में वृद्धि होती है। हाल में एक शोध पत्र में इसका उल्लेख भी हुआ है, जिसमें अमेरिका में पिछले पांच दशकों के दौरान मशीन से जुड़े कामगारों की शैक्षणिक अर्हताओं का अध्ययन किया गया है।

अधिक शिक्षित लोगों का कामकाजी जीवन भी लंबा चलता है, क्योंकि शारीरिक क्षमताओं की तुलना में मानसिक क्षमताएं कहीं ज्यादा टिकाऊ होती हैं। हालांकि, औद्योगिक श्रम की उपलब्धता के दृष्टिकोण से एक अहम पहलू यह भी है कि अधिक शिक्षित लोग फैक्टरियों में काम करने के कम इच्छुक होते हैं। अमेरिका में कृषि, उत्पादन और निर्माण कार्य में स्नातकों की सक्रियता 10 प्रतिशत से कम है, जबकि कुल कामकाजी आबादी में उनकी भागीदारी 37 प्रतिशत और सेवा कार्यबल में 43 प्रतिशत है।

कार्यस्थलों की गुणवत्ता में सुधार के लिए भी भारी संभावनाएं विद्यमान हैं। जापान, कोरिया और ताइवान को अपवाद छोड़कर ए-10 अर्थव्यवस्थाओं के कार्यबल में भारी अनौपचारिकता है। अनौपचारिक कामगारों की उत्पादकता सीमित होती है। इसका कारण उनमें कौशल की कमी के साथ-साथ उन उपक्रमों का आकार (अनौपचारिक उपक्रमों का आकार अमूमन छोटा होता है) भी होता है, जिनमें वे काम करते हैं, क्योंकि वे कौशल-निर्माण में निवेश और व्यापक आर्थिक दायरे से जुड़ी संभावनाओं को भुनाने में कम सक्षम होते हैं। डिजिटलीकरण और सुधारों ने इन अर्थव्यवस्थाओं में राज्य की क्षमताओं को जैसे-जैसे बढ़ाया है, वैसे-वैसे उपक्रमों के आकार में वृद्धि के साथ ही औपचारीकरण भी तेज हुआ है, जिससे श्रम उत्पादकता में भी सुधार होना चाहिए।

कुल मिलाकर मानव पूंजी में सुधार जनसांख्यिकीय स्तर पर कुछ नुकसान की भरपाई कर सकता है। औसतन लोग कम बच्चे पैदा करेंगे, लेकिन अधिक संभावना है कि वे सशक्त एवं अधिक सक्षम कामगार के रूप में ढलेंगे। वहीं, बुढ़ाते हुए समाजों में रोबोटीकरण का तेज रुझान भी दिख रहा है। इन सभी कारकों के चलते ए-10 अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक उत्पादन सालाना 3 से 4 प्रतिशत की वृद्धि कर रहा है और इस गति ने पिछले एक दशक के दौरान सार्थक रूप से तेजी पकड़ी है।

इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबलिंग, परिधान और खिलौना निर्माण जैसे कुछ उद्योगों में ऑटोमेशन यानी स्वचालन अभी भी खासा मुश्किल है। इसके प्रबल आसार दिखते हैं कि ये उद्योग बुढ़ाती अर्थव्यवस्थाओं से युवा अर्थव्यवस्थाओं की ओर उन्मुख होंगे, यह देखते हुए कि वे इस बदलाव को भुनाने के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रंखला से स्वयं को एकीकृत करेंगे।

हमने वृद्धि के सर्वसम्मत अनुमान और वस्तुओं एवं सेवाओं में अंतर करते हुए कुछ तार्किक आकलनों के आधार पर अगले पांच वर्षों के लिए वस्तुओं की मांग-आपूर्ति का एक प्रतिरूप प्रस्तुत किया है। हमने पाया कि भारत, इंडोनेशिया और फिलिपींस जैसी युवा अर्थव्यवस्थाओं में औद्योगिक श्रम आपूर्ति अधिशेष स्थिति में बनी रहेगी, जो अपनी आबादी को सफलतापूर्वक काम में लगाएंगे और चीन की उत्पादकता वृद्धि में भी बहुत ज्यादा कमी नहीं आने वाली। ऐसे में जोखिम उस खंडित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए अधिक है, जहां न केवल उत्पादकता वृद्धि मंद पड़ी है, बल्कि कामगारों की उपलब्धता भी कम है।

भारत जैसे युवा देशों के लिए दीर्घकालिक परिप्रेक्ष्य में यही मुख्य सबक होगा कि वे मानव पूंजी में सुधार, बच्चों में आरंभिक स्तर पर पोषण सुनिश्चित करने, शैक्षणिक स्तर सुधारने और आर्थिक औपचारीकरण की प्रक्रिया को गति देने पर ध्यान केंद्रित करें। चूंकि जन्म दर तेजी से घट रही है, तो जो बच्चे आज पैदा हो रहे हैं, वे तब वयस्क कामगार के रूप में तैयार होंगे, जब कामकाजी आबादी संकुचित हो रही होगी। ऐसे में उन्हें उन अवसरों को बेहतर तरीके से भुनाने में सक्षम बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

                                                                                                                                                                                         (लेखक क्रेडिट सुइस में एपैक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख हैं)

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First Published - December 19, 2022 | 10:31 PM IST

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