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पारंपरिक भारतीय कंपनियों का प्रदर्शन रहेगा बेहतर

Last Updated- December 15, 2022 | 4:53 AM IST

एक परिष्कृत अर्थव्यवस्था वह होती है जिसमें कारोबारी रिश्ते औपचारिक विधिक अनुबंधों के माध्यम से परिभाषित होते हैं। जब कोविड-19 जैसी भीषण प्रभाव वाली परिस्थितियां उत्पन्न होती हैं तब अर्थव्यवस्था में भी उथलपुथल होती है। भारत में अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पारिवारिक रिश्तों या मित्रताओं तथा बेहतर व्यवहार से तय होता है। अधूरे अनुबंध की बाकी स्थिति से निपटने के लिए समझदारी भरे मोलतोल का सहारा लिया जाता है। ऐसे माहौल में अतिरंजित घटनाओं से भी बेहतर तरीके से निपटा जाता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था के उस हिस्से को कोविड-19 के झटके से निपटने में मदद मिलेगी जो पूरी तरह आधुनिकीकृत नहीं है।

एक मकान मालिक और किरायेदार के रिश्ते पर विचार कीजिए। विकसित देशों में मकान मालिक एक कंपनी है। हर महीने निश्चित समय पर किराया दिए जाने की अपेक्षा होती है। यदि किराया देने में देरी होती है तो कंपनी के कनिष्ठ अधिकारी को यह चिंता होती है कि उसका बोनस प्रभावित होगा। कनिष्ठ अधिकारी मकान खाली करने का नोटिस भेज सकता है और अदालत में भी मकान मालिक के अधिकारों की रक्षा की जाती है।

सामान्य दिनों में यह व्यवस्था सही रहती है। परंतु महामारी के दौर में जब अमेरिका के किरायेदारों में से एक तिहाई को किराया चुकाने में कठिनाई आ रही है तो अगर कई लोगों को घर से निकाल दिया गया तो यह सही नहीं होगा। इसके बावजूद जिस तरह व्यवस्था चल रही है इस नतीजे से बच पाना मुश्किल है।

भारत में हम पारंपरिक रूप से यह विलाप सुनते आए हैं कि मकान मालिकों को अपनी संपत्ति के अधिकार पर किस कदर कम संरक्षण हासिल है। एक किरायेदार से घर खाली कराने में दो वर्ष का समय लगता है और वकीलों को काफी पैसा देना पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी कोई संभावना नहीं रहती कि ऐसी विशेषताओं की बदौलत अर्थव्यवस्था की क्षमता और उसकी उत्पादकता प्रभावित होगी।

परंतु अगर कोई ऐसी आपदा आती है जो एक सदी में एक बार ही आती हो तो उस स्थिति में भारत जैसे अनौपचारिक इंतजाम के अपने लाभ हैं। यहां मकान मालिक ही प्रमुख होता है, कोई एजेंट नहीं। इससे मकान मालिक समझदारी भरे निर्णय ले सकते हैं। वे अच्छे किरायेदारों की कदर करते हैं और कोविड-19 जैसे हालात में मोलतोल की गुंजाइश बनी रहती है। कारोबारी जगत में अनुबंधों के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। हर बड़ी फर्म एक ऐसे पर्यावास का केंद्र होती है जिसके इर्दगिर्द कलपुर्जा उत्पादक, वितरक, खुदरा कारोबारी आदि रहते हैं। कोविड-19 ऐसी हलचल है जिसके बारे में विधिक अनुबंध में कोई प्रावधान नहीं होगा। ऐसे में तमाम अनुबंध भंग हो रहे हैं। कलपुर्जा बनाने वाले उत्पादक समय पर उनकी आपूर्ति नहीं कर पाए क्योंकि लॉकडाउन लगा था। भुगतान में भी विलंब देखने को मिला। विधिक अनुबंध की दुनिया में सभी फर्म कानूनी दांवपेच में उलझी नजर आतीं।

हमारे देश में अक्सर इस बात का रोना रोया जाता है कि अदालतें अनुबंध प्रवर्तन कराने में कितनी कमजोर हैं। परंतु यह समस्या हमारे यहां लंबे समय से है और इसने कारोबारों की प्रकृति को भी प्रभावित किया है। चूंकि अनुबंध प्रवर्तन कमजोर रहता है इसलिए कारोबार इन पर निर्भर नहीं रहते। हर बड़ी कंपनी चाहती है कि वह माहौल बना रहे जिसमें वह काम करती है। उसके बेहतर भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि साथ की छोटी कंपनियां अच्छा काम करती रहें। छोटी फर्म अक्सर मित्रों और परिजन की होती हैं। ये लंबे रिश्ते बड़ी कंपनियों की सफलता मेंं अहम होते हैं। इस दोहराव भरी प्रक्रिया में सब साथ होते हैं। ऐसे में अधिवक्ताओं और अदालती प्रवर्तन की भूमिका अपने आप कम हो जाती है। निश्चित रूप से जब कारोबारी समुदाय भी ऐसी फर्म से छुटकारा चाहता है जो विधिक प्रक्रिया में उलझती दिखती है।

कोविड-19 का सामना होने के बाद इस बात की काफी संभावना है कि आगे की राह अधिवक्ताओं के माध्यम से नहीं बल्कि बातचीत से निकले। यकीनन कई बड़ी कंपनियां जिनके पास थोक वित्तीय बाजार में पर्याप्त इक्विटी और डेट पूंजी है वे इस माहौल में फाइनैंसर की भूमिका निभाएं। यकीनन अनुबंधों और अदालतों की भूमिका के बजाय हमारी व्यवस्था ऐसी है जहां बड़ी फर्म के फाइनैंंसर बनने की संभावना बहुत अधिक होती है। यह बात ऐसे कठिन समय से निकलने में हमारी मदद करती है।

नोटबंदी के बाद उपजे आर्थिक तनाव के वक्त भी हमें ऐसा ही देखने को मिला था। उस समय भी अर्थव्यवस्था ऐसी दिक्कतों से निपटने मेंं कामयाब रही थी जिनसे शायद अनुबंधों के माध्यम से नहीं निपटा जा सकता था। शोधकर्ताओं शुभमय चक्रवर्ती और रेणुका साने के एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2016 से 2018 के बीच हर 10 में से एक परिवार दुकानों से उधार ले रहा था। औपचारिक अर्थव्यवस्था में ऐसा संभव नहीं था। एमेजॉन या डीमार्ट के ग्राहकों को दुकान से यूं उधार नहीं मिलेगा लेकिन पारंपरिक भारत में दुकानदार और ग्राहक एक दूसरे को जानते हैं। दुकान मालिक किसी का कर्मचारी नहीं होता है और उसमें यह क्षमता होती है कि वह ऐसे कठिन समय से उबरने के लिए जरूरी निर्णय ले सके।

कहने का अर्थ यह नहीं है कि अनुबंध प्रवर्तन और विधि के शासन की महत्ता समाप्त की जाए। निजी स्तर पर बातचीत से जो नतीजे निकलते हैं उन्हें विधिक अनुबंध में शामिल करके ही उन्नत पूंजीवादी व्यवस्था की इमारत बनती है और समृद्धि आती है। भारत को परिपक्व अर्थव्यवस्था वाला बाजार बनाने के लिए हमें न्याय व्यवस्था में बदलाव लाने होंगे ताकि यहां ऐसी जटिल इमारत निर्मित हो सकें। आधुनिक उच्च उत्पादकता वाली फर्म तैयार करने के लिए ऐसी जटिल इमारतें आवश्यक हैं। जब फर्म को अपनी तलाश मित्रों और परिवार तक सीमित नहीं रखनी होगी तो उच्च उत्पादकता वाले कारोबारी साझेदार तलाश करना आसान होगा और बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। यहां एक बात यह भी है कि अनुबंध आधारित पूंजीवाद की जटिल इमारत कोविड-19 जैसी नई समस्या से ठीक तरह नहीं निपट पाती। इसके विपरीत परिवार और मित्रों के साथ कारोबार जैसी भारतीय व्यवस्था में बातचीत और मोलभाव आसानी से होता है। ऐसे में भारत जैसे देश में कोविड जैसी घटनाओं के कारण उत्पन्न कठिनाइयां अपेक्षाकृत आसानी से हल हो सकती हैं।
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं।)

First Published - July 14, 2020 | 11:11 PM IST

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