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अब नए गगन में उड़ान भर रही है उड़न परी

Last Updated- December 05, 2022 | 9:22 PM IST

पी. टी. उषा का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। वह पहली भारतीय महिला थीं, जिन्होंने विश्व एथलेटिक्स के नक्शे में भारत को पहचान दिलाई।


हालांकि इस घटना को बीते हुए काफी दिन हो चुके हैं, जब 1984 के लॉस एंजलिस ओलम्पिक में चंद पलों के फासले की वजह से उन्हें पदक से वंचित रहना पड़ा था। उषा कहती हैं कि उस वक्त उनकी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। हालांकि उन्हें अपने करियर ग्राफ पर अब भी कोई पछतावा नहीं है।


हाल में कुछ गलत वजहों से उनका नाम काफी सुर्खियों में रहा था। हालांकि वह इसके लिए कतई जिम्मेदार नहीं थीं। दरअसल अंजू बॉबी जॉर्ज ने पी. टी. उषा के बारे में टिप्पणी की थी कि उन्हें विश्वस्तरीय एथलीट नहीं माना जा सकता। अंजू की इस टिप्पणी पर उनका कहना है कि वह इस बात से काफी आहत हैं, लेकिन अंजू अभी बीजिंग ओलंपिक की तैयारियों में जुटी है और इस वजह से वह इस मामले को आगे नहीं बढ़ाकर उन्हें परेशान नहीं करना चाहतीं।


पेइचिंग ओलंपिक खेलों के मद्देनजर यहां भारत की सफलता की संभावनाओं पर चर्चा लाजमी है। बीजिंग में भारत की सफलता पर बिना किसी लाग-लपेट के उषा कहती हैं कि कम से कम एथलेटिक्स में तो सफलता की गुंजाइश काफी कम है। वह इसकी वजह खिलाड़ियों को पर्याप्त प्रशिक्षण और अन्य जरूरी सुविधाओं की कमी को मानती हैं।


उषा के मुताबिक, ‘हमारे यहां प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन उन्हें पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं।’ शायद यही वजह है कि उन्होंने कुछ साल पहले अपनी स्पोट्र्स अकादमी खोली है। इसमें उन्हें किसी की मदद भी नहीं ली है। उषा स्कूल ऑफ एथलेटिक्स युवा एथलीटों को प्रशिक्षण देने का काम कर रहा है। उषा ने कहा, ‘ एथलेटिक्स में इतना सारा वक्त गुजारने के बाद मुझे लगता है कि भारत में प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। कमी है तो बस आधारभूत, आधुनिक और वैज्ञानिक सुविधाओं की।’


सौभाग्य से उड़न परी को अपनी अकादमी के लिए कई प्रायोजक भी मिल गए हैं। केरल सरकार ओर से भी उषा को काफी मदद मिली है। अकादमी को शुरू करने के लिए राज्य सरकार ने उषा को 30 एकड़ जमीन के अलावा वित्तीय सहायता भी मुहैया कराई है।


उषा का कहना है कि अगर हम विश्वस्तर के एथलीट तैयार करना चाहते हैं, तो हमें व्यापक स्तर पर ऐसी पहल करनी होगी। तकरीबन एक दशक पहले जब उन्होंने अपने प्रोफेशनल करियर को अलविदा कहा था, तो उनके दिमाग में यही बात चल रही थी कि युवा प्रतिभाओं को उभरने के लिए किस तरह बेहतर तरीके से तैयार किया जाए।
 
वह कहती हैं, ‘ मैं नहीं चाहती थी कि मैंने अपना करियर संवारने के दौरान जो समस्याएं झेलीं, वहीं समस्या हमारी युवा पीढ़ी भी झेले और इसके मद्देनजर मेरे दिमाग में अकादमी का आइडिया आया।’ उषा मानती हैं कि उनके जमाने में एथलेटिक्स में करियर बनाना काफी मुश्किल काम था। दुर्भाग्य से अब भी स्थिति में बदलाव नहीं हुआ है।


वैसे उनका कहना है कि अगर भारतीय प्रतिभाओं को उचित प्रशिक्षण दिया जाए तो ओलंपिक मेडल हासिल करने का लक्ष्य कोई टेढ़ी खीर नहीं होगा। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त एथलेटिक्स विशेषज्ञों की मदद से अभ्यास, भोजन, मनोवैज्ञानिक सलाह समेत तमाम प्रशिक्षण मुहैया कराने की जरूरत है।


उड़न परी की राय है कि एथलेटिक्स में भारत की सफलता का रास्ता इसमें सरकार और संबंधित फेडरेशनों की सक्रिय भागीदारी से खुलता है और इस बाबत कोशिशें स्कूल स्तर से शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए डोपिंग जैसी समस्याओं से निपटने में और पेशवर तरीका अख्तियार करने की जरूरत है। गौरतलब है कि डोपिंग की वजह से कई भारत के कई एथलीटों का करियर दांव पर लग चुका है।


पी. टी. उषा का मकसद युवा एथलीटों की ऐसी फौज तैयार करना है, जो 2012 के ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व कर सकें। वह प्रशिक्षण के लिए 11 से 17 साल के युवाओं का चयन करती हैं और उनके साथ खुद भी काफी कड़ी मेहनत करती हैं। वह कहती हैं कि बच्चों के लिए यह सोचना जरूरी है कि क्या स्पोट्र्स में उनका भविष्य है या नहीं? दुभार्ग्य से प्रतिभा होने के बावजूद कई बच्चे खेलों से अपना नाता तोड़ लेते हैं।


पी. टी. उषा का मकसद पहले इन बच्चों को जूनियर स्तर के लिए तैयार करना है। इसके बाद उन्हें धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जाएगा। उन्हें उम्मीद है कि अगले कुछ वर्षों में उनकी अकादमी के बच्चें एथलेटिक्स की दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कायमाब होंगे। हालांकि इस अकादमी के कई बच्चे राज्य और राष्ट्रीय (जूनियर लेवल) स्तर पर अपना जलवा दिखा चुके हैं।


उषा को उम्मीद है कि उनकी अकादमी के बच्चे एक दिन देश का नाम ऊंचा करेंगे। उनके मुताबिक, जरूरत ऐसा माहौल तैयार करने की है, जिसमें बच्चे एथलेटिक्स में करियर बनाने के लिए प्रेरित हो सकें। उषा इस बार के ओलंपिक मशाल रिले का भी शिरकत करेंगी। उन्हें इस बात की बेहद खुशी है कि उनकी सफलताएं लोगों के जेहन में अब भी मौजूद हैं।

First Published - April 14, 2008 | 1:14 AM IST

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