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मजबूत मुद्रा के लिए दीर्घावधि नजरिया

Last Updated- December 12, 2022 | 10:40 AM IST

क्या भारत के लिए एक मजबूत मुद्रा वांछनीय नहीं है? इस बात पर व्यापक स्वीकार्यता दिखाई देती है कि रुपये की गिरती सेहत निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य है। क्या दीर्घावधि के लिए यह सच है कि सतत रूप से अपना मूल्य गंवा रही मुद्रा का होना भारत के अपने ही हित में है? अपने दीर्घावधि हितों के संदर्भ में इस बिंदु पर विचार करते हैं।
मुद्रा के मजबूत होते ही निर्यात अधिक महंगा होने लगता है, लिहाजा मजदूरी संबंधी क्रय-विक्रय पर निर्भर क्षेत्रों- मसलन, आईटीईएस एवं श्रम-बहुल विनिर्माण को मार्जिन में कमी आने का खमियाजा भुगतना पड़ेगा, अन्यथा उन पर अव्यवहार्य होने का खतरा मंडराने लगेगा। ऐसी गतिविधियों के लिए एक तर्कसंगत समय में अधिक उत्पादक एवं व्यवहार्य विकल्पों की तरफ बढऩे के लिए आदर्श रूप में नीतिगत समर्थन की दरकार होगी। प्रक्रिया एवं उत्पाद डिजाइन को बेहतर बनाने के साथ ही ऑटोमेशन या कंप्यूटर समर्थित प्रक्रिया आभूषण या एकदम अलग गतिविधि के लिए कौशल के रूप में हो सकता है। उच्च मूल्य उत्पादों के मामले में कथित मूल्य हासिल करने के लिए संवद्र्धित गुणवत्ता की जरूरत पड़ सकती है।
भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 1980 से ही लगातार अवमूल्यन होता रहा है, 1992-95 और 2003-11 की अवधि को छोड़कर। 1992-95 के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपया 30-33 रुपये के भाव पर रहा था जबकि 2003-11 की अवधि में भारतीय मुद्रा 44-48 रुपये प्रति डॉलर के भाव पर रही थी। यह आंकड़ा अर्थव्यवस्था एवं बाजार धारणा की सापेक्षिक मजबूती को भी दर्शाता है जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था कम मुद्रास्फीति के साथ ही अधिक उत्पादक स्थिति में थी।
तेल जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह से निर्भर देशों या कर पनाहगाह के रूप में चर्चित देशों को छोड़कर अधिकांश देशों की मजबूत मुद्राएं अर्थव्यवस्था की मजबूती को बयां करती हैं। अमेरिकी डॉलर, यूरो, ब्रिटिश पाउंड, जापानी येन, स्विस फ्रैंक, चीनी युआन और सिंगापुरी डॉलर इसके सशक्त उदाहरण हैं। इसी तरह अर्थव्यवस्थाओं की सापेक्षिक कमजोरी निर्बल एवं मूल्यह्रास से गुजर रहीं मुद्राओं में झलकती है। उच्च मुद्रास्फीति या आंतरिक प्रतिस्पद्र्धा एवं उठापटक एक अर्थव्यवस्था की ताकत को कम करते हैं और मुद्रा का अमूमन अवमूल्यन होने लगता है।
आयात के लिए खरीद ताकत को संरक्षित रखना एक मजबूत एवं स्थिर मुद्रा का फायदा है। भारत के लिए तेल एवं अन्य ऊर्जा आयात, रक्षा खरीद, सोना, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की खरीद, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी, बाह्य उधारी के पुनर्भुगतान, कच्चे माल के आयात एवं घरेलू बाजार एवं निर्यात के लिए विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल एवं मध्यवर्ती उत्पादों और यात्रा पर खर्च को सीमित रखना अहम है। व्यय के एक निर्दिष्ट उत्पाद समूह के लिए एक मजबूत मुद्रा होने से उपभोक्ताओं को लागत घटने से खर्च के लिए अधिक आय मिलती है और उद्यमों के पास बेहतर मुनाफा मार्जिन से अधिक अधिशेष बचता है। अल्पावधि में कोविड-19 महामारी के दौरान आर्थिक गतिविधि एवं आवागमन पर लगी बंदिशों की वजह से खाद्य, स्वर्ण, परिवहन एवं संचार में महंगाई बढ़ गई। अगर ब्याज दरें बढ़ाने का नीतिगत कदम उठाया जाता है तो समस्या पैदा हो सकती है जबकि हमारे हालात पूंजी प्रवाह को सहज बनाने की मांग करते हैं, अवरोध खड़ा करने के नहीं। जरूरत इस बात की है कि हमारी सरकार विवाद नहीं समाधान पर केंद्रित रहे। विवाद से उत्पादकता घटती है जैसा ढांचागत क्षेत्र में तमाम बाधाओं एवं गतिरोध की वजह से होता है।
उच्च वृद्धि यानी सशक्त मुद्रा
दीर्घावधि नजरिया है कि रिकवरी के बाद क्या गिरता हुआ रुपया एक पूर्व-निश्चित निष्कर्ष हो चुका है? अगर हम सामान्य ढंग से कारोबार करते रहे तो इसका जवाब हां है। इसके बजाय अगर हम उभरते बाजार में कृषि क्षेत्र के झटकों एवं मजदूरी-जनित महंगाई से जुड़ी वास्तविकताओं से निपटने में उत्पादकता बढ़ाकर वृद्धि के लिए लक्षित बदलाव लाने पर व्यवस्थित ढंग से काम करते हैं तो इससे एक ठोस रिकवरी एवं बेहतर दीर्घावधि संभावनाओं के निर्माण में मदद मिल सकती है। ढांचागत क्षेत्र में सुधार से उत्पादकता में बेहतरी हासिल करने में मदद मिलेगी। मानव संसाधन को संगठित करने और बाजार में भी इसी तरह व्यापक बदलाव लाने से वृद्धि को और गति मिलेगी। हालांकि इनके लिए समुचित उद्देश्यों को चुनने, डिजाइन एवं क्रियान्वयन में अनुशासित टीमवर्क और किसी भी तरह के बाधक राजनीतिक घटनाक्रम से परहेज करना होगा। अगर हम सफल रहते हैं तो हम तेजी से बढ़ेंगे और रुपया अधिक मजबूत हो पाएगा।
आधारभूत ढांचा एवं मुद्रा
अगर हम तेजी से नहीं बढ़ते हैं तो रुपये में अवमूल्यन जारी रहेगा। भारत उभरते बाजारों में भी इस कदर पिछड़ा हुआ है कि हमें अलग ढंग से सोचना जरूरी हो गया है। उच्च वृद्धि को हासिल करने का एक तरीका ढांचागत क्षेत्र में सुधार है।
हमारी कुछ समस्याएं महामारी पर काबू पाने की कोशिशों से जुड़ी हुई हैं लेकिन वृद्धि के लिए हमें भंडारण, बिजली, संचार, पानी एवं साफ-सफाई के खराब स्तर से जुड़ी बाधाओं से पार पाना होगा। ये सेवाएं हमें विनिर्माण, प्रक्रिया एवं उत्सर्जन के लिए ऊंचे मानक एवं दक्षता हासिल करने लायक बनाएंगी। खराब सेवाओं एवं मानक दूसरे देशों में रहने वाले तमाम भारतीयों के भारत में कारोबार खड़ा करने या यहां पर बसने की राह में बड़े अवरोध बन जाते हैं।
औषधि क्षेत्र के लिए सरकार ने बल्क ड्रग पार्कों एवं आयात-निर्भर एपीआई के घरेलू विनिर्माण के लिए एक नीति की घोषणा की है। जहां ऐंटी-डंपिंग शुल्कों एवं लक्षित विनिर्माण प्रोत्साहन जैसे अतिरिक्त कदमों की जरूरत हो सकती है, वहीं रसायनों, मशीनरी, ऑटो उपकरणों एवं इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों के लिए भी ऐसी ही प्रणालीगत पहल की जरूरत है। इन सबको अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए सहज अंदरूनी एवं बहिर्वाही लॉजिस्टिक की जरूरत है।
इसके साथ ही भारतीय मूल के लोगों की राह में एक बड़ा अवरोध नीतियों का पूर्वानुमान न लगा पाना है और भारत में बड़े अंतरराष्ट्रीय निवेशकों- मसलन वोडाफोन, एमेजॉन, वॉलमार्ट, केयर्न और बड़ी ऑटो कंपनियों को पेश आई बाधाएं इसकी तस्दीक भी करती हैं।
पिछले लेख में दिए गए सुझावों के अनुरूप ही लक्षित कदम उठाने की जरूरत है। वाहन विनिर्माण में सुजूकी की तरह वरीयता वाले उद्योगों में वैश्विक ऐंकर निवेशकों के साथ नोडल सरकारी समन्वय किया जाए, उनका उत्पीडऩ न किया जाए और सफलता सुनिश्चित करने के लिए उन्हें तैयार किया जाए। ऐसी पहलों पर गौर करने एवं उनके मूल्यांकन की जरूरत है और व्यवहार्य पाए जाने पर चुनिंदा उद्योगों के लिए उन्हें लागू भी किया जाए। आयात पर कम शुल्क रखे बगैर निर्यात भी वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के नाते सफल नहीं हो सकता है। फलक के अलावा वित्त का मुद्दा भी है और आखिर में विनिर्मित उत्पादों के लिए खरीद ऑर्डर का मसला भी है। स्टार्टअप के लिए सरकारी उत्साह वेंचर दौर पार करने के अगले चरण में खरीद ऑर्डर एवं वाणिज्यिक स्तर के लिए फंडिंग तक बरकरार नहीं रहता है। इससे संभावनाशील विनिर्माण उद्यम भी लडख़ड़ाने लगते हैं और अपना काम बढ़ाने में नाकाम रहते हैं।
बांग्लादेश एवं वियतनाम जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में लागू नीतियों को अपनाने के साथ ही निर्यात क्षमताओं के विकास एवं उनका फलक बड़ा करने की जरूरत होती है। भले ही वियतनाम को चीन के पास होने का फायदा मिलता है लेकिन उसे भी बांग्लादेश की तरह क्षमता निर्माण के लिए अध्ययन एवं विचार से निकले कदम उठाने की जरूरत है। हमें भारत की निर्यात क्षमता समय के साथ निर्मित करने पर ध्यान देना चाहिए ताकि एक सशक्त अर्थव्यवस्था एवं अधिक टिकाऊ मुद्रा में अपना अंशदान कर सके।

First Published - December 22, 2020 | 11:48 PM IST

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