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बाघ संरक्षण में नए बदलाव लाना जरूरी

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Last Updated- May 01, 2023 | 8:13 PM IST
Tiger
Shutter Stock

वर्ष 2023 प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) की 50 वीं वर्षगांठ है और यह देश में बाघ की प्रजातियों की रक्षा के लिए भारत का प्रमुख कार्यक्रम है। वर्ष 2005 में मैंने साथी संरक्षणवादियों के साथ एक बाघ कार्यबल की अध्यक्षता की थी जिसमें इस बात की समीक्षा की जानी थी कि सरिस्का बाघ अभयारण्य में क्या गड़बड़ी हुई जिसकी वजह से सभी बाघ खत्म हो गए।

हमारी रिपोर्ट, ‘जॉइनिंग द डॉट्स’, के जरिये बाघ संरक्षण के लिए एजेंडा सामने रखा गया। हालांकि इसे ‘बाघ’ संरक्षण समुदाय से जुड़े लोगों ने सकारात्मक तरीके से नहीं देखा क्योंकि इसे संरक्षणवादी बनाने की तुलना में मनुष्यों के साथ सह-अस्तित्व पर केंद्रित होते हुए देखा गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद से काफी कुछ बदलाव आए हैं। इसकी सिफारिशों पर आगे बढ़ने के लिए बहुत कुछ किया गया है जिसमें बाघों की गणना के तरीके उनके पांव के निशान के बजाय कैमरा ट्रैप का उपयोग करने जैसे वैज्ञानिक अनुमान पर आधारित है। इसके अलावा बाघ प्राधिकरण और वन्यजीव अपराध ब्यूरो स्थापित किया गया है जिसके बजट में भी काफी बढ़ोतरी हुई है।

प्रबंधन और सुरक्षा के लिए नए प्रोटोकॉल निर्धारित किए गए हैं जैसे कि गांवों में स्थानांतरण लागत बढ़ा दी गई है। इन सभी कदमों के चलते देश में बाघों की आबादी अब स्थिर होने के साथ बढ़ भी रही है। लेकिन फिर भी इस 50वें वर्ष में हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि एक बहुत बड़ा एजेंडा अधूरा है जिस पर काम करने की आवश्यकता है।

भारत की चुनौती अब दोहरी है, पहला, जंगल में बाघों की सुरक्षा से जुड़ा है जबकि दूसरा, बाघों की संख्या को निर्दिष्ट संरक्षित क्षेत्र की क्षमता से अधिक बढ़ाना है। यही कारण है कि सह-अस्तित्व का एजेंडा ही भविष्य होना चाहिए जहां संरक्षण कार्यों में स्थानीय समुदायों का समर्थन भी होता है।

हालांकि कुछ वजहें खुश होने की भी हैं। वर्ष 2006 में देश भर बाघ, सह-शिकारी और शिकार से जुड़े अनुमान में पाया गया कि देश में 1,411 बाघ थे और वर्ष 2010 में यह संख्या बढ़कर 1,706 हो गई। वर्ष 2014 तक यह संख्या 2,226 और 2018 के चौथे चरण में यह संख्या 2,967 और 2023 में अब यह 3,167 हो गई है। लेकिन इसमें एक पेच है।

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2006 में, बाघ लगभग 93,000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में घूमते थे। वर्ष 2018 तक, यह दायरा घटकर 89,000 वर्ग किमी तक रह गया। इसका मतलब यह है कि अब बाघ संरक्षित क्षेत्र का दायरा भीतर से काफी सुरक्षित है लेकिन बाघ के निवास स्थान की जगह कम हो रही है।

बाघों का एक सीमित दायरे में ‘शिकार’ हो रहा है। इसके अलावा, 2018 के अनुमान से पता चलता है कि करीब 1,923 बाघ यानी 65 प्रतिशत तक आरक्षित सीमाओं के भीतर पाए जाते हैं जबकि बाकी बाहर जंगलों में घूमते हैं और उनकी रहने की जगह जंगली जानवरों और लोगों के बीच ही बन जाती है।

यही कारण है कि मैं इस बात को दोहराती रहती हूं कि सह-अस्तित्व के लिए बाघ संरक्षित क्षेत्र के बारे में लोगों के साथ काम करना और गठजोड़ बनाते हुए उन्हें भी फायदे वाली स्थिति में लाना कितना जरूरी है जिसे बाघ संरक्षण से जुड़े समुदाय ने गलत ही ठहराया था। अब तक की नीति ने यह सुनिश्चित किया है कि संरक्षित क्षेत्र के बाहर के समुदायों को सुरक्षा से कुछ भी नहीं मिलता है।

इन वर्षों में इस बात की समझ नहीं बन पाई है कि कम निवेश में मवेशी और बकरियों के लिए पेड़ कैसे लगाएं जिसके चलते आरक्षित क्षेत्र के बाहर की भूमि बंजर सरीखी हो गई है। लोगों के पास अपने मवेशियों को चारा चराने के लिए संरक्षित क्षेत्रों में भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जैसे ही जुगाली करने वाले पशु जंगलों में जाते हैं, शाकाहारी जानवर जैसे कि हिरण और अन्य जानवर किसानों के खेतों की ओर आते हैं और उन्हें नष्ट करते हैं।

यदि हम अधिक बाघों की सुरक्षा के लिए अधिक भूमि चाहते हैं तो हमें इस वास्तविकता को समझना चाहिए। इसका जवाब यह है कि सबसे पहले और सबसे महत्त्वपूर्ण रूप से लोगों की नष्ट हुई फसलों या मारे गए मवेशियों के लिए जल्दी और उदारता से भुगतान करना होगा। दूसरा, हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि बाघ अभयारण्य से लगी भूमि में भारी और असंगत विकास निवेश हो। लोगों को संरक्षित क्षेत्र में रहने का फायदा मिलना चाहिए।

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उन्हें यह अहसास होना चाहिए कि उन्हें अपने हित के लिए बाघ को सुरक्षित रखना है। तीसरा, लोगों को संरक्षण से सीधे लाभ मिलना चाहिए मसलन उन्हें बचाने के एवज में नौकरियों में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्हें भागीदार, मालिक और वास्तव में बाघ के चलते हो रहे पर्यटन कार्य से कमाई के मौके मिलने चाहिए।

आज हम जानते हैं कि वन्यजीव पर्यटन बढ़ रहा है और यह काफी महंगा भी है और यह उन मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं को पूरा करता है जो जंगल में जानवरों को देखना चाहते हैं। इसे और बढ़ना चाहिए, लेकिन उन तरीकों से जिससे बाघ के निवास स्थान में रहने वाले लोग लाभान्वित हो सकें। ऐसा नहीं हो रहा है। तथ्य यह है कि संरक्षण अब भी उन तरीकों से हो रहा है जो जानवर और स्थानीय समुदायों के बीच संघर्ष को बढ़ा रहा है।

आज, कई मामलों में आदिवासियों को लगभग मैदानी जगहों में स्थानांतरित कर दिया जाता है और लक्जरी पर्यटन से जुड़े लोग उसी क्षेत्र का आभासी तरीके से अधिग्रहण कर लेते हैं। इससे निश्चित रूप से केवल अलगाव जैसी स्थिति पैदा होती है और इससे संघर्ष बढ़ता है। वर्ष 2005 बाघ कार्यबल की रिपोर्ट में हमने उन होटलों पर 30 प्रतिशत उपकर लगाने के लिए कहा था जो बाघ संरक्षित क्षेत्र के आसपास थे और इस पैसे को लोगों और इस क्षेत्र को वापस देने का आग्रह किया गया था।

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हमने यह भी कहा था कि स्थानीय समुदायों के स्वामित्व और संचालन वाले पर्यटन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जहां लोगों के ठहरने का इंतजाम भी हो ताकि लोग सुरक्षा में भागीदार हों। बाघ और उसके भविष्य में उनकी बराबर की हिस्सेदारी है। ऐसा नहीं हो रहा है, लेकिन यह होना चाहिए।

संरक्षण का नया एजेंडा बाघ बनाम आदिवासी के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए। यह बाघों और लोगों के बारे में होना चाहिए। इसी वजह से अगले 50 वर्षों में हमें भारतीय नैतिकता के अनुरूप संरक्षण की आवश्यकता है। हमें मूल और पश्चिमी विचारधारा के अनुरूप बाघों को अलग से रखने और उनकी किलेबंदी के अभ्यास में थोड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है, जिसमें बाघ के साथ सह-अस्तित्व की विचारधारा के साथ रहने वाले लोगों का हित शामिल है। केवल तभी बाघ मुक्त होकर दूर तक घूम सकेंगे और उनका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है।

(ले​खिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)

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First Published - May 1, 2023 | 8:08 PM IST

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