पुणे के नैशनल डिफेंस एकैडमी (एनडीए) का नाम दुनिया भर में बड़ी इज्जत के साथ लिया जाता है।
यह विश्व भर में इकलौती ऐसी मिलिट्री एकैडेमी है, जहां सेना के तीन अंगों (थलसेना, नौसेना और वायुसेना) को एक साथ प्रशिक्षण दिया जाता है।
इसी वजह से तो यहां से पिछले 60 सालों में पास ऑउट होने वाले हजारों कैडेट्स को भले ही अलग-अलग जगह पर अलग-अलग मुश्किलों का सामना करना पड़े, लेकिन परपंराओं और मूल्यों की एक डोर उन्हें जोड़े रखती है। इन मूल्यों को वे आत्मसात करते हैं एनडीए में बिताए तीन सालों के दौरान। लेकिन अब नौसेना के एक फैसले से सेना के तीनों अंगों की इस सामूहिक बुनियाद के टुकड़े-टुकड़े हो सकते हैं।
नौसेना अध्यक्ष एडमिरल सुरीश मेहता ने एनडीए को आदेश दिया है कि, अगले साल जुलाई से नौसेना कैडेट्स का अपना अलग सिलेबस होगा। साथ ही, ये कैडेट्स केवल दो साल ही एकेडमी में रहेंगे, जबकि थलसेना और वायुसेना के कैडेट्स को पूरे तीन साल यहां बिताने पड़ेंगे। एडमिरल मेहता ही इस वक्त सैन्य प्रमुखों की समिति के अध्यक्ष हैं।
उनके इस आदेश की वजह नौसेना का यह फैसला है कि उसके सभी कैडेट्स को कमीशन देने से बीटेक की डिग्री दी जाएगी। नेवी के इस नए आदेश से थलसेना और वायुसेना के बड़े अधिकारियों में काफी नाराजगी है। अब नौसेना कैडेट एनडीए में वहां का कॉमन सिलेबस पढ़ने के बजाए तकनीकी विषयों की पढ़ाई करेंगे। दो साल के बाद उन्हें केरल के एझीमाला में स्थित नेवल एकेडमी में ट्रांसफर कर दिया जाएगा, जहां उन्हें दो साल की और पढ़ाई के बाद बी.टेक की डिग्री दी जाएगी।
इस बारे में एनडीए को कोई विकल्प नहीं दिए गए हैं। खुद एडमिरल मेहता का कहना है कि अगर एनडीए नए सिलेबस को लागू नहीं करती या करवा पाती तो नौसेना वहां अपने कैडेट्स को भेजना बंद कर देगी। ऐसी हलात में उन्हें चार साल की ट्रेनिंग के लिए सीधा एझीमाला में भेज दिया जाएगा। नौसेना के इस फैसले से एनडीए में हड़कंप मच गया है।
इस संस्थान को अब अपने दशकों से चले आ रहे ट्रेनिंग सिलेबस को बदलने में खासी मशक्कत करनी पड़ रही है। सबसे पहले तो जरूरत है, तीन सालों के बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग को केवल दो सालों में समेटने की। एनडीए में बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग के तहत जवानों में नेतृत्व की भावना जगाई जाती है।
साथ ही, उन्हें एक ऑनर कोड सिखाया जाता है और उन्हें मिल-जुलकर काम करने की भावना को बढ़ावा दिया जाता है। एनडीए के उच्च अधिकारियों का कहना है कि बेसिक ट्रेनिंग को केवल दो साल में समेटना नामुमकिन है।
वहीं, नौसेना की मानें तो यह कतई नामुमकिन नहीं है। भारतीय नौसेना ने बिजनेस स्टैंडर्ड को एक बयान जारी कर कहा कि,’हमारे सामने एक ही विकल्प है। हम अपने कैडेट्स को एनडीए में दो साल की ट्रेनिंग दिलवाना चाहते हैं। उसके बाद नेवल एकैडमी में दो साल नई तकनीकों के बारे में जानकारी दी जाएगी। एनडीए में ट्रेनिंग से हमें अपने कैडेट्स में एकजुटता की भावना पैदा करने में मदद मिलेगी। साथ ही, हमारी जरूरत के हिसाब से वे नेवल एकैडमी में बी.टेक की डिग्री भी हासिल कर लेंगे।’
इसी वजह से एनडीए आजकल अपने बी.टेक सिलेबस को बनाने में जुटा हुआ है। इसके लिए तो उसने स्टाफ्स भी रखने शुरू कर दिए हैं। वैसे, इसमें उसे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। एनडीए का एकैडमिक डिपार्टमेंट पहले से ही प्रिंसपल, वाइस प्रिंसपल और रजिस्ट्रार के काम कर रहा है।
इस संस्थान में 120 लेक्चरों के पद हैं, लेकिन इस वक्त उसमें से केवल 57 कुर्सियां ही भरी हुई हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह से संस्थान का काफी पुराना पे स्ट्रक्चर है। इस वजह से तो यहां काम कर रहे लोग-बाग भी इसे छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
वैसे, नौसेना के इस फैसले की सेना के उच्चाधिकारियों की भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अब जनरल (रिटा.) वी. पी. मलिक को ही ले लीजिए। कारगिल की जंग के वक्त सेनाध्यक्ष रहे जनरल मलिक नौसेना के लिए बी.टेक कैडेट्स की जरूरत तो स्वीकारते हैं, लेकिन यह भी कहते हैं कि इस फैसले से एनडीए की सेवामूल्यों पर बुरा असर पड़ेगा। उनका कहना है, ‘मेरे ख्याल से तो नेवी कैडेट्स को दो साल के बाद एनडीए से सिफ्ट करने से बुरा असर पड़ेगा।
आज की तारीख में फौज में जो साथ मिलकर काम करने की भावना है, उसकी जड़ें एनडीए से ही शुरू होती हैं।’ उनकी बात से पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल (रिटा.) सुशील कुमार इत्तेफाक रखते हैं। उनका भी कहना है कि, ‘नौसेना अधिकारियों को एक तकनीक की तो जरूरत है, लेकिन एनडीए पास ऑउट होने की वजह से मुझे दो साल के बाद एनडीए कैडेट्स को शिफ्ट करने का आइडिया पसंद नहीं आएगा।
कारगिल की जंग के वक्त मैं और जनरल मलिक काफी करीब हुआ करते थे। दरअसल, हम लोग एक दूसरे को एनडीए के दिनों से ही जानते थे।’ वैसे, एनडीए में इस वक्त कैडेट्स की भी काफी किल्लत है। इस बार इस संस्थान में केवल 191 कैडेट्स ही आए, जबकि सामान्य तौर पर यहां 300 कैडेट्स आते हैं। अब तक तो नौ कैडेट्स संस्थान को छोड़ भी चुके हैं।