एयर इंडिया के निजीकरण के चौतरफा स्वागत के बीच भी यह मानना होगा कि इसके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ रही है। हमारे देश में अरुण शौरी आज भी उन शर्तों से जुड़े सवालों के जवाब दे रहे हैं जिन पर एयर इंडिया से कम महत्त्वपूर्ण सरकारी कंपनियों का निजीकरण किया गया था। यहां एक बात ध्यान देने लायक है कि कर्मचारियों के एक धड़े द्वारा चिंता जताने तथा वाम दलों के एक हिस्से की ओर से कुछ शोरशराबे के अलावा समूचे राजनीतिक वर्ग में से किसी ने इस विमानन सेवा की बिक्री की आलोचना नहीं की है। कर्मचारी भी मोटे तौर पर राहत महसूस कर रहे होंगे क्योंकि उनका वेतन निरंतर मिलता रहेगा।
एयर इंडिया बीते करीब 15 वर्ष से लगातार घाटे में चल रही है। संभव है अन्य सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन भी इतना खराब रहा हो लेकिन कोई सरकारी कंपनी इतनी बुरी स्थिति में नहीं पहुंची कि उसका घाटा लाख करोड़ रुपये के आसपास हो गया हो। एयर इंडिया का समग्र घाटा लगभग 80,000 करोड़ रुपये और उसका रोज का घाटा 20 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका था। ऐसे में एक कट्टर वामपंथी के लिए भी यह जाहिर सी बात थी कि यह विमानन कंपनी अब उड़ान भरने की स्थिति में नहीं रह गई थी। कंपनी का कारोबारी निपटान तय था। इसके साथ तमाम कठिनाइयां भी जुड़ी हुई थीं। उदाहरण के लिए खाली एयरपोर्ट स्लॉट, 100 से अधिक खराब रखरखाव वाले विमानों से निजात, इससे पहले कि वे हवाई अड्डों पर खड़े-खड़े जंग खा जाएं तथा कर्मचारियों को जरूरी लाभ के साथ सेवा समाप्ति देना। संक्षेप में कहें तो अफरा-तफरी और बड़े पैमाने पर शर्मिंदगी।
एक बार जब टाटा ने एयर इंडिया को उबारने की पहल की तो सरकार ने राहत महसूस की। इसकी एक झलक तब मिली जब विमानन कंपनी को टाटा को सौंपे जाने के दिन प्रधानमंत्री ने टाटा समूह के चेयरमैन से औपचारिक मुलाकात की। वित्त मंत्रालय के कर्मचारियों ने इस विषय पर काम किया कि करीब 61,000 करोड़ रुपये के बाकी रह गए कर्ज का निपटान कैसे होगा। इस बीच सरकार के पास 14,000 करोड़ रुपये मूल्य की गैर विमानन परिसंपत्तियां रह गई हैं तथा बिक्री का कुल नकद मूल्य 2,700 करोड़ रुपये (विमानन कंपनी का कुल मूल्य 18,000 करोड़ रुपये लगा जिसमें बकाया कर्ज घटाकर 2,700 करोड़ रुपये की राशि बची) रहा। बकाया 44,000 करोड़ रुपये की राशि को बट्टेखाते में डाले जाने को सबके लिए बेहतर स्थिति के रूप में पेश किया गया जो कि उपलब्ध विकल्पों के मुताबिक उचित भी है। ऐसा सौदा जिसे लेकर खरीदार और विक्रेता दोनों पक्ष खुश हों, वह हमें इस विमानन कंपनी और इसके हालिया इतिहास के बारे में भी काफी कुछ बताता है।
टाटा समूह द्वारा इस सौदे में रुचि लेने के बाद सरकार की प्रसन्नता समझी जा सकती है लेकिन ऐसे मौके पर किसी को उस व्यक्ति से भी टिप्पणी लेनी चाहिए जो इस विमानन कंपनी को पतन के रास्ते पर डालने के बाद एकदम खामोश है। वह व्यक्ति हैं मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल के नागर विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल। एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस का विलय कराने पर पटेल ने ही जोर दिया था। इसके नतीजे बहुत त्रासद हुए क्योंकि इससे अनुमानित लक्ष्य नहीं हासिल हुए। ढेर सारे विमान खरीदने के ऑर्डर देने के लिए भी उन पर सवाल उठे क्योंकि इससे कंपनी कर्ज में डूब गयी और फिर उबर नहीं सकी। एक निजी विमानन कंपनी के आगमन के बाद प्रमुख मार्गों के अहम स्लॉट को खाली कराए जाने को लेकर भी तमाम बातें हुईं। विजय माल्या जो एक समय अपनी (अब बंद हो चुकी) विमानन कंपनी को अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर उड़ाना चाहते थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से मंत्री पर आरोप लगाया कि वह एक अन्य विमानन कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। इस पर नाराज पटेल ने प्रतिक्रिया दी थी कि माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस अर्हता नहीं हासिल कर सकी।
अब एयर इंडिया टाटा समूह की घाटे वाली कंपनियों में नजर आएगी। एन चंद्रशेखरन के नेतृत्व में समूह के परिचालन में जबरदस्त सुधारों के बावजूद अगर टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को छोड़ दिया जाए तो समूह गत तीन वर्ष से घाटे में है। इस वर्ष हालात बदल सकते हैं क्योंकि टाटा स्टील इस्पात की बढ़ती कीमतों की बदौलत टीसीएस से अधिक मुनाफा कमा रही है। अगर एयर इंडिया कुछ समय तक घाटे में भी रहती है तो भी घाटे का आकार कम हो जाएगा। ब्याज का बोझ कम होगा और बकाया कर्ज की लागत कम होगी। समूह की दूसरी विमानन कंपनी के साथ तालमेल करने से यात्रियों की तादाद बढ़ाई जा सकेगी। एक फायदा यह भी हो सकता है कि शायद सरकार के मंत्री अब टाटा पर सार्वजनिक हमले न करें।