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कैसी होगी ट्रंप की नई कैबिनेट?

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नई चुनौतियां और संरक्षणवाद की झलक

Last Updated- November 28, 2024 | 10:25 PM IST
Tariff War

फॉक्स न्यूज के पूर्व समाचार प्रस्तोता, वर्ल्ड रेसलिंग एंटरटेनमेंट के पूर्व मुख्य कार्या​धिकारी, हेज फंड प्रबंधकों, टीकाकरण के विरोधियों, जलवायु परिवर्तन को नकारने वालों, आव्रजन विरोधियों, बड़े कारोबारों के समर्थकों, अमेरिका प्रथम के हिमायतियों, रूढ़िवादी नीतिकारों और ईलॉन मस्क जैसे लोगों से सुसज्जित डॉनल्ड ट्रंप के कैबिनेट संबंधी चयन उनके ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ के एजेंडे को आगे ले जाने वाले नजर आते हैं।

उन्होंने जिस तरह के लोगों का चयन किया है उसने रिपब्लिकन पार्टी के समर्थकों तक को चौंका दिया है। इससे संकेत मिलता है कि अपने पहले कार्यकाल से ही वह जिन वादों पर काम कर रहे हैं और इन चुनाव में भी जिनका जिक्र किया उन्हें अमल में लाने में वह पूरा जोर लगाएंगे। जहां तक अर्थव्यवस्था और कारोबार का सवाल है, ट्रंप ने अपने संरक्षणवादी इरादे जाहिर कर दिए हैं।

इस सप्ताह के आरंभ में उन्होंने अमेरिका के तीन सबसे बड़े साझेदारों मेक्सिको, कनाडा (प्रत्येक 25 फीसदी) और चीन (10 फीसदी) पर गलत कारोबारी व्यवहार और मादक पदार्थों की आवक तथा अवैध प्रवासियों का हवाला देते हुए अतिरिक्त शुल्क लगाने की धमकी दी है।

जमेसों ग्रीयर को अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) बनाने का उनका निर्णय भी इस कदम को बाधित नहीं करेगा। ग्रीयर ट्रंप के पहले कार्यकाल में भी उनके साथ थे और तत्कालीन यूएसटीआर रॉबर्ट लाइटहाइजर के चीफ ऑफ स्टाफ थे।

लाइटहाइजर ने ही मेक्सिको और कनाडा के साथ उत्तर अमेरिकी मुक्त व्यापार समझौते को अंजाम दिया था। ट्रंप द्वारा चीन के 370 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के सामान पर टैरिफ लगाने के फैसले को उन्होंने ही आकार दिया था।

ग्रीयर उस टीम का हिस्सा थे जिसने 2020 में एक व्यापार समझौते को लेकर वार्ता की थी जिसके तहत चीन को अमेरिका से 200 अरब डॉलर मूल्य का सामान खरीदना था। कोविड 19 महामारी के कारण यह लक्ष्य कभी हासिल ही नहीं हो सका। हालांकि यह राहत की बात है कि भारत को शुरुआती शुल्क वृद्धि से बाहर रखा गया है और उम्मीद है की ट्रंप और मोदी की मित्रता इसे ऐसे ही रहने देगी।

ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में प्राथमिकता की सामान्य पहुंच की व्यवस्था को खत्म किया था जो अमेरिका का सबसे बड़ा और पुराना शुल्क मुक्त व्यापार कार्यक्रम था। भारत उस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी था। उस समय तत्कालीन यूएसटीआर ने कहा था कि वह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि भारत ने अपने बाजारों की ‘समान और उचित पहुंच ‘ मुहैया नहीं कराई। बाइडन सरकार ने ट्रंप की शुल्क दरों को वैसे ही रहने दिया।

ऐसे में भारत को नए प्रशासन से किसी रियायत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। उसे समय हार्ली डेविडसन मोटरसाइकिल पर शुल्क भी समस्या की वजह बना था, ऐसे में गवर्नमेंट आफ एफिशिएंसी जैसे प्रमुख विभाग के नए मुखिया मस्क की कंपनी टेस्ला को रियायत की मांग की जा सकती है।

वाणिज्य मंत्री हार्वर्ड लुटनिक का चयन भी भारत के लिए चिंतित करने वाला हो सकता है। हेज फंड कैंटर फिट्जगेरॉल्ड के यह अरबपति चेयरमैन ट्रंप की बदलाव वाली टीम में शामिल है और अमेरिका फर्स्ट की तर्ज पर अमेरिकियों को पहले रोजगार देने के हिमायती हैं। शुल्क व्यवस्था को लागू करने वाले प्रमुख जिम्मेदार कैबिनेट सदस्य की हैसियत से उनके कठोर संरक्षणवादी विचार उसे व्यक्ति से मेल खाते हैं जिसे ट्रंप ने आंतरिक सुरक्षा की देखभाल के लिए चुना है और जो सीमा और आव्रजन पर नजर रखते हैं।

उनका नाम है क्रिस्टी नोएम। क्रिस्टी साउथ डकोटा की पूर्व गवर्नर हैं जिन्होंने एक विवादास्पद फैसले में राज्य के नैशनल गार्ड को दक्षिणी सीमा पर तैनात कर दिया था। इससे आव्रजन को लेकर उनके कड़े रुख को समझा जा सकता है। भारत के आईटी उद्योग के नजरिये से देखें तो क्रिस्टी का विभाग और श्रम विभाग एच 1 बी और ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार होंगे। ट्रंप के पहले कार्यकाल में ये प्रक्रियाएं अस्थिर हो गई थीं।

तुलसी गबार्ड को राष्ट्रीय खुफिया विभाग का निदेशक बनाया गया है जिनके रूस और सीरिया से ताल्लुकात हैं। इजरायल समर्थक मार्क रूबियो को विदेश मंत्री बनाया गया है। श्वेत नस्ल की श्रेष्ठता के हिमायती फॉक्स न्यूज़ के पीटर हेगसेठ को रक्षा मंत्री बनाया गया है। ऐसे में माना जा रहा है कि ट्रंप का दूसरा कार्यकाल पहले की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव वाला होगा। भारत और शेष विश्व को इसके प्रभाव के लिए तैयार रहना चाहिए।

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First Published - November 28, 2024 | 10:25 PM IST

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