संपादकीय

Editorial: व्यापार समझौते के बाद भारत-अमेरिका रिश्तों में नई गर्माहट

भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा तैयार की गई है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- February 08, 2026 | 10:02 PM IST

भारत और अमेरिका द्वारा जारी किया गया संयुक्त बयान जिसमें एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पेश की गई है, वह दोनों देशों के बीच संबंधों में महत्त्वपूर्ण नरमी का संकेत हो सकता है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि इसे कितनी तेजी से लागू किया जाएगा, लेकिन उम्मीद है कि उन निर्यातकों को कुछ राहत मिलेगी जो अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा कुछ महीने पहले लागू किए गए 50 फीसदी के शुल्क से प्रभावित हो रहे थे।

रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाए गए 25 फीसदी के अतिरिक्त शुल्क के बारे में बयान में स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया है लेकिन माना यही जा रहा है कि इसे समाप्त कर दिया जाएगा। ट्रंप ने अपनी एक पोस्ट में दावा किया था कि भारत ने ‘रूस से तेल खरीदना बंद करने तथा अमेरिका और संभावित तौर पर वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदने पर सहमति जताई है।’ 

शेष 25 फीसदी शुल्क को अब घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा। यह दर एशिया की कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धी है। इसके अलावा भारत ने यह सुनिश्चित किया है कृषि उत्पादों का एक खास हिस्सा सुरक्षित रहे। अमेरिका की कुछ कृषि जिंस मसलन फल, सोयाबीन तेल, नट्स आदि को भारतीय बाजारों में भेजने की इजाजत होगी। परंतु अहम घरेलू उत्पाद जिनमें चावल, गेहूं, पोल्ट्री और डेरी आदि शामिल हैं, वे सुरक्षित रहेंगे।

अहम औद्योगिक वस्तुओं पर लगने वाले शुल्कों में भारी कमी की जा रही है हालांकि यह देखना होगा कि किन चीजों पर शून्य शुल्क लगेगा और दूसरी वस्तुओं के लिए क्या रास्ता होगा। चाहे जो भी हो, यह भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक जीत है क्योंकि हाल ही में कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों से व्यापार के लिए मुक्त कर दिया गया है। भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान खरीदने का वादा भी किया है। बोइंग से विमान खरीदने की बड़ी प्रतिबद्धताएं इसका एक उचित हिस्सा होंगी।

यदि जीवाश्म ईंधनों की बढ़ी हुई खरीद वास्तव में होती है, तो वह भी मददगार होगी। ऑस्ट्रेलिया से कोकिंग कोयले के आयात की जगह लंबे समय से विविध स्रोतों से हासिल करने की को​शिश रही है, और अमेरिका एक संभावित विकल्प है। यदि हाल ही में केंद्रीय बजट में घोषित कर राहत से कुछ हद तक प्रोत्साहित होकर डेटा केंद्रों में बड़े निवेश साकार होते हैं तो ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) की खेपें, जो ऐसी स्थापनाओं की रीढ़ हैं, इस 500 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता का एक बड़ा हिस्सा बन सकती हैं। 

पिछले कुछ सप्ताह भारत के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत लेकर आए हैं। भारत 2014 से ही नए व्यापार समझौते को लेकर संकोच करता रहा है। पहले के मुक्त व्यापार समझौते राजनीतिक नाराजगी का शिकार हो गए क्योंकि भारत में कुछ लोगों का मानना था कि निर्यातकों को उनसे पर्याप्त लाभ नहीं मिला। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस बार स्थिति अलग हो, सरकार को आंतरिक सुधारों की गति तेज करनी होगी। इसका कुछ हिस्सा संयुक्त बयान के नियामक समन्वय वाले खंड में निहित है। लेकिन इससे अतिरिक्त कुछ करने की आवश्यकता होगी। विशेषकर बुनियादी कारक बाजार सुधारों के क्षेत्र में कुछ करने की आवश्यकता होगी।

सरकार को इस मानसिकता से भी बाहर निकलना होगा कि केवल बाजार तक पहुंच ही निर्यात वृद्धि का कारण बनेगी। यह अत्यंत आवश्यक है कि नए तंत्र बनाए जाएं जो छोटे और मध्यम उद्यमों को नई संभावनाओं को सही ढंग से समझने और उनका लाभ उठाने में सक्षम बनाएं, साथ ही इन निर्यात बाजारों में अपरिचित नियमों को भी समझने में मदद करें। लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना होगा और बिजली क्षेत्र में सुधारों को गहराई तक ले जाना होगा।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाएं केवल एक दिशा में काम नहीं करतीं। एशिया के अन्य हिस्सों से कच्चे माल को सस्ते और भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध कराना होगा ताकि पश्चिम के लिए निर्यात बढ़ सके। व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार समझौते जैसे व्यापार समझौतों में प्रवेश पर नए सिरे से विचार करना होगा।

First Published : February 8, 2026 | 10:02 PM IST