धैर्य का फल मीठा होता है। यह कहावत तब सही होती दिखी जब सोमवार को भारतीय समयानुसार देर शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत करने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक घोषणा में कहा कि दोनों पक्ष तत्काल प्रभाव से एक व्यापार समझौते के लिए तैयार हो गए हैं। इसके अंतर्गत अमेरिका अपने जवाबी शुल्क को 25 फीसदी से कम करके 18 फीसदी करेगा। वास्तव में राहत इससे कहीं अधिक है और यह शेयर बाजार में भी नजर आया जहां बेंचमार्क बीएसई सेंसेक्स मंगलवार को 2.5 फीसदी बढ़ गया।
25 फीसदी के तथाकथित जवाबी शुल्क के अलावा अमेरिका ने भारत पर 25 फीसदी का और दंडात्मक शुल्क लगाया था क्योंकि भारत रूस से कच्चे तेल का आयात कर रहा था। इससे भारतीय निर्यातकों को काफी नुकसान हो रहा था। ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो 18 फीसदी की कर दर भी अधिक है लेकिन भारत को वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों पर शुल्क के मामले में 1-2 फीसदी की बढ़त हासिल हो गई है।
यह बहुत बड़ी राहत की बात है कि दोनों पक्ष समझौते पर सहमत हो गए हैं लेकिन तत्काल यह स्पष्ट नहीं हुआ कि आखिर कौन सी बात ने ट्रंप को अपना मन बदलने पर विवश किया। सरकार ने कहा कि संवेदनशील क्षेत्रों के हितों की रक्षा की गई है, हालांकि अखबार छपने के लिए जाने के समय तक कोई संयुक्त बयान नहीं आया था। साफ कहा जाए तो भारतीय पक्ष निरंतर अमेरिकी प्रशासन के साथ समझौते के लिए प्रयासरत था। सोमवार को ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि भारत 500 अरब डॉलर के अमेरिकी ईंधन, तकनीक, कोयला तथा अन्य वस्तुओं के साथ ही अतिरिक्त अमेरिकी चीजें खरीदने को राजी हो गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जताई है, जिससे यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, भारत अमेरिका से आयात पर शुल्क और गैर-शुल्क बाधाओं को शून्य करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। हालांकि इस मोर्चे पर और अधिक स्पष्टता की आवश्यकता होगी, लेकिन यहां कुछ बिंदु उल्लेखनीय हैं। भारत को अमेरिका में कहीं अधिक शुल्क का सामना करना पड़ा, जिससे सरकार और निर्यातकों ने अन्य बाजारों में विविधीकरण के लिए आक्रामक रूप से प्रयास किए। सरकार ने अन्य व्यापारिक साझेदारों के साथ व्यवहार में अधिक खुलापन भी दिखाया, जिससे उदाहरण के लिए यूरोपीय संघ के साथ व्यापार वार्ताओं को सफलतापूर्वक पूरा करने में मदद मिली।
घरेलू मोर्चे पर भी सुधारों की नई पहल दिखाई दी। अहम होगा कि यह प्रक्रिया जारी रहे और सुधारों का दायरा और विस्तृत किया जाए। भारत को यूरोपीय बाजारों में अधिक प्रासंगिक बनने और भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते तथा अमेरिका के साथ व्यापार समझौते का पूरा लाभ उठाने के लिए तैयार होना होगा। अमेरिका के साथ हुआ समझौता, विशेषकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों में बाजार हिस्सेदारी वापस पाने में मदद करने के अलावा, पूंजी खाते पर भी राहत प्रदान करेगा। व्यापार मोर्चे पर अनिश्चितता पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर रही थी।
उदाहरण के लिए, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने 2025 में लगभग 19 अरब डॉलर के शेयर बेचे, और इस वर्ष भी बिकवाली का दबाव जारी रहा। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली ने रुपये पर काफी दबाव डाला। चूंकि अब भारत का अमेरिका के साथ समझौता हो गया है, उम्मीद है कि प्रवाह की दिशा पलटेगी। यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने में भी मदद करेगा। भारत पर फिर से उन बड़ी वैश्विक कंपनियों का ध्यान बढ़ेगा जो चीन से हटकर विविधीकरण करना चाहती हैं।
यद्यपि अमेरिका के साथ हुए समझौते के बाद भारत की आर्थिक संभावनाएं काफी बेहतर हुई हैं, लेकिन नीति-निर्माताओं को ध्यान रखना होगा कि वर्तमान अमेरिकी प्रशासन का स्वभाव आवेगी प्रकृति का है। ऐसे में व्यापक वैश्विक अनिश्चितता चाहे आर्थिक हो या भू-राजनीतिक, वह जारी रहेगी। उदाहरण के लिए, व्यापारिक साझेदारों पर जवाबी शुल्क लगाने का कोई ठोस आर्थिक आधार नहीं था। व्यापार और आर्थिक नीति के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी अब यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका का दृष्टिकोण कहीं अधिक संकीर्ण है। इसलिए, भारत को व्यापार समझौते का लाभ तो उठाना ही चाहिए, उसे निर्यात का विविधीकरण जारी रखना चाहिए, घरेलू क्षमताओं को सुधारना चाहिए और नीतिगत सुरक्षा कवच भी तैयार करने चाहिए।