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Editorial: संघीय संतुलन, राज्यों की हिस्सेदारी और राजकोषीय अनुशासन की कठिन कसौटी

सोलहवें वित्त आयोग ने बांटे जा सकने वाले कर पूल में राज्यों का हिस्सा 41 फीसदी बनाए रखा है, जो पिछले वित्त आयोग द्वारा तय स्तर के बराबर ही है

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बीएस संपादकीय   
Last Updated- February 02, 2026 | 10:39 PM IST

सोलहवें वित्त आयोग को अपना काम उल्लेखनीय निगरानी के बीच करना पड़ा। बीते दशक में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच के रिश्तों में गिरावट आई है और इसकी वजह केवल दलगत राजनीति नहीं रही है। इसके लिए व्यापक मुद्दे जिम्मेदार रहे हैं। राज्यपालों की भूमिका से लेकर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन तक के व्यापक मुद्दों ने देश की संघीय संरचना को ऐसे दबाव में डाल दिया है, जैसा उसने पिछले चार दशकों में नहीं देखा था। इसलिए आयोग के सामने यह कठिन कार्य था कि सरकार के राजस्व के विभाजन से इन प्रवृत्तियों को और बढ़ावा न मिले।

संसद में रविवार को प्रस्तुत इसका प्रतिवेदन स्वागत योग्य है, क्योंकि ऐसा लगता है कि उसने इस उद्देश्य को हासिल कर लिया है। आयोग ने उस सूत्र की पुनः समीक्षा की है जिसके आधार पर बांटे जा सकने लायक कोष के तहत कर की गणना की जाती है, और इसमें ‘सकल घरेलू उत्पाद में योगदान’ को एक कारक के रूप में शामिल किया है। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कुछ दक्षिणी राज्यों, जिनमें कर्नाटक शामिल है, तथा पश्चिमी तट के अधिक विकसित राज्यों, जैसे गुजरात, का हिस्सा वास्तव में बढ़े।

राज्य सरकारें लंबे समय से यह तर्क देती रही हैं कि उनके लिए नीतिगत प्रयोग और स्वायत्तता की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) एक आवश्यक सुधार था, लेकिन इसने निस्संदेह उनकी राजकोषीय स्वायत्तता को कम कर दिया। इस बीच, जो राजस्व उनके पास उपलब्ध रहा, उसका बड़ा हिस्सा उन योजनाओं के वित्तपोषण और क्रियान्वयन में खर्च हुआ जो केंद्र सरकार द्वारा तैयार और चुनी गई थीं और जिनका राजनीतिक श्रेय स्थानीय नेताओं को नहीं मिलता। इस समय उनके संसाधनों में कमी करना इसलिए एक खतरनाक कदम होता।

सोलहवें वित्त आयोग ने बांटे जा सकने वाले कर पूल में राज्यों का हिस्सा 41 फीसदी बनाए रखा है, जो पिछले वित्त आयोग द्वारा तय स्तर के बराबर ही है। लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि यह हिस्सा उस कोष से लिया जाता है जो वास्तव में जितना होना चाहिए उससे छोटा है, क्योंकि केंद्र सरकार अब ज्यादा से ज्यादा विभिन्न उप करों का सहारा लेती है, जो कर माने जाते हैं लेकिन जिन्हें वह पूरी तरह अपने पास रख सकती है। इस प्रकार आयोग की सिफारिशें राज्यों की ज्यादा हिस्सेदारी की मांगों को खत्म नहीं करेंगी, लेकिन इससे शायद नाइंसाफी की शिकायतों को रोका जा सकेगा।

राज्यों की सीमित नीतिगत स्वतंत्रता शायद उन कारणों में से एक है जिसकी वजह से राज्य ऋण फिर से व्यापक स्तर पर चिंता का विषय बनने लगा है। आयोग ने राज्य सरकारों द्वारा बजट से इतर ऋण लेने की प्रवृ​त्ति को रोकने का आग्रह किया है। राजकोषीय घाटे को सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी जीएसडीपी के लगभग 3 फीसदी पर नियंत्रित करना एक बड़ा सुधार था, और इससे बचने के लिए किसी भी प्रकार के शॉर्टकट को अपनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। बजट से बाहर उधार लेने से और भी जटिलताएं उत्पन्न होती हैं। एक ओर, इससे कई सरकारों की वास्तविक देनदारियों के बारे में पारदर्शिता में काफी कमी आई है। दूसरी ओर, यह व्यापक बॉन्ड बाजार पर बोझ डालता है।

स्वयं राज्यों के लिए, भारी ऋण देनदारी चुकाना एक बड़ा कारण हो सकता है कि वे ऐसी नई नीतियां लागू करने में असमर्थ महसूस करते हैं, जिनमें व्यय शामिल होता है। आयोग ने राजस्व घाटा अनुदान को समाप्त करने की सिफारिश करके भी अच्छा किया है, जिससे राजकोषीय अनुशासन में सुधार होगा। अर्थशास्त्री अरविंद पानगड़िया की अध्यक्षता वाले सोलहवें वित्त आयोग की सराहना की जानी चाहिए कि उसने राजनीतिक धारा के विपरीत जाकर यह सुनिश्चित किया कि अधिक उत्पादक राज्यों के पास संसाधन हों, और राजकोषीय ईमानदारी तथा विकासोन्मुख नीतियों वाले राज्यों को प्रोत्साहन मिले।

First Published : February 2, 2026 | 10:35 PM IST