प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
करीब 4.75 अरब डॉलर में सौर ऊर्जा और भंडारण विकास कंपनी इंटरसेक्ट पावर के अधिग्रहण की गूगल की योजना स्वच्छ ऊर्जा कंपनी से जुड़ा आम सौदा भर नहीं होगा। लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) चलाने के लिए बने डेटा सेंटर अब उतनी ऊर्जा खा रहे हैं, जितनी पूरा शहर खर्च करता है। इसमें चिप्स या पूंजी की नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर विश्वसनीय ऊर्जा की उपलब्धता भी बाधा बन रही है।
नवीकरणीय ऊर्जा तैयार करने वाली प्रमुख कंपनी को खरीदकर गूगल केवल ऊर्जा खरीदार नहीं रह जाएगी बल्कि ऊर्जा कारोबारी बन जाएगी। वर्षों तक प्रौद्योगिकी कंपनियां मुख्य रूप से बिजली खरीद समझौतों (पीपीए) पर निर्भर थीं। इस मामले में स्वामित्व मिलने के बाद गूगल के पास नए डेटा सेंटर परिसरों के लिए ऊर्जा उत्पादन की क्षमता भी आ जाएगी। इंटरसेक्ट के पास टैक्सस में कई सौर और बैटरी स्टोरेज परियोजनाएं हैं तथा टेक्सस तेजी से डेटा सेंटर का अड्डा बनता जा रहा है।
इससे बड़ी टेक कंपनियों के बीच गहरे आंतरिक तनाव का भी पता चलता है। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस क्षमता में विस्तार का टकराव जलवायु परिवर्तन संबंधी संकल्पों से हो रहा है। गूगल ने नवीनतम वार्षिक पर्यावरण रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि कंपनी का कुल उत्सर्जन 2019 की बेसलाइन की तुलना में 51 फीसदी अधिक था। ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा सुनिश्चित करना न केवल बिजली की सतत उपलब्धता के लिए आवश्यक है बल्कि वह विशुद्ध शून्य उत्सर्जन की दिशा में बढ़ने के लिए भी आवश्यक है।
गूगल ऊर्जा से जुड़े विभिन्न प्रकार के उपायों का पोर्टफोलियो तैयार कर रही है, जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण, भूतापीय, परमाणु ऊर्जा और मांग आधारित कार्यक्रम शामिल हैं। इनसे डेटा सेंटर ग्रिड पर बोझ के समय लोड कम कर सकते हैं। गूगल की इस रणनीति में इंटरसेक्ट एकदम सही बैठती है।
गूगल ने दुनिया के सबसे बड़े कॉर्पोरेट बिजली खरीद सौदों के जरिये अपतटीय पवन ऊर्जा का भी जखीरा जुटा लिया है। इन सौदों में नीदरलैंड्स में 478 मेगावाट, ताइवान में 495 मेगावाट और जर्मनी तथा स्कॉटलैंड में अतिरिक्त क्षमताएं शामिल हैं। ये समझौते गूगल के उस लक्ष्य के लिए जरूरी हैं, जिसमें वह 2030 तक हर ग्रिड पर कार्बन-मुक्त ऊर्जा इस्तेमाल करना चाहता है।
गूगल के इंटरसेक्ट सौदे को अमेरिका के हालिया घटनाक्रम के आलोक में देखा जाना चाहिए, जहां डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन और देश के पूर्वोत्तर राज्यों के कई गवर्नर बिजली की 15 साल की आपातकालीन थोक नीलामी पर जोर द रहे हैं। इससे तकनीकी कंपनियां नए बिजली संयंत्रों के लिए वित्तीय सहायता पर विवश हो जाएंगी। इसके पीछे एकदम सीधा विचार है। आम परिवारों और छोटे कारोबारियों को केवल इसीलिए बिजली का ज्यादा बिल नहीं भरना चाहिए क्योंकि भारीभरकम डेटा सेंटरों को बहुत अधिक बिजली की जरूरत है।
फिर भी चौबीसों घंटे स्वच्छ ऊर्जा का निर्माण महंगा सौदा है। सौर और पवन ऊर्जा के लिए भंडारण या बैकअप उत्पादन की आवश्यकता होती है। यदि बड़ी कंपनियां सार्वजनिक ग्रिड से किनारा करके खुद ही बिजली हासिल करती रहेंगी तो साझा नेटवर्क को बनाए रखने का खर्च दूसरे उपभोक्ताओं के सिर पड़ जाने का जोखिम भी है। नियामकों को निवेश प्रोत्साहनों और न्यायसंगतता के बीच संतुलन बनाना होगा। भारत के लिए इसके फौरी निहितार्थ हैं।
महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात और तेलंगाना में डेटा-सेंटर के केंद्र तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। इनसे मांग में मामूली इजाफा नहीं होगा। इनसे एक ही जगह बड़ा लोड जाएगा, जिससे स्थानीय वितरण नेटवर्कों पर दबाव पड़ सकता है और ट्रांसमिशन के लिए लंबी चौड़ी योजना बनानी पड़ सकती है। भारत के बिजली क्षेत्र ने विद्युतीकरण में और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में प्रगति की है, लेकिन वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति अब भी नाजुक है और क्रॉस-सब्सिडी काफी हद तक बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं पर निर्भर है।
भारत के पास मांग पर प्रतिक्रिया करने वाले परिपक्व बाजार भी नहीं हैं, जो प्रणाली पर दबाव के दौरान डेटा-सेंटर लोड को लचीले ढंग से कम करने दें। कैलिफोर्निया की मांग-प्रतिक्रिया नीलामी प्रणाली इस संदर्भ में उपयोगी मानक प्रदान करती है। जैसे-जैसे एआई का ढांचा बढ़ेगा, भारत को इसके स्पष्ट नियम बनाने होंगे कि ग्रिड उन्नयन की कीमत कौन चुकाएगा, भंडारण को कैसे बढ़ाया जाएगा और नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण औद्योगिक मांग की गति के साथ कदमताल कैसे करेगा।