रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट में राजकोषीय प्रदर्शन के आकलन के पैमाने में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव हुआ। सरकार ने पहले घोषणा की थी कि 2026-27 से राजकोषीय घाटे को उस स्तर पर बनाए रखा जाएगा जिससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में केंद्र सरकार का ऋण घटता रहे। उस हिसाब से सरकार का लक्ष्य 2026-27 में ऋण-जीडीपी अनुपात को 55.6 प्रतिशत तक लाना है, जबकि 2025-26 में यह संशोधित अनुमान 56.1 प्रतिशत था।
परिणामस्वरूप 2026-27 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जबकि चालू वर्ष में यह 4.4 प्रतिशत था। केंद्र सरकार ने पिछले कई वर्षों में राजकोषीय प्रबंधन के मामले में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। महामारी के वर्ष (2020-21) में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 9.2 प्रतिशत था जो चालू वर्ष में 4.4 प्रतिशत तक आ गया है। इसके अलावा व्यय की गुणवत्ता में ठोस सुधार हुआ है।
किंतु आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण हो सकता है। सरकार ने कहा है कि उसका इरादा 2030-31 तक केंद्र सरकार का ऋण-जीडीपी अनुपात 50 प्रतिशत (1 प्रतिशत ज्यादा या कम) करने का है। यहां दो महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। पहला, भले ही सरकार इस लक्ष्य को हासिल कर ले, ऋण का स्तर फिर भी उच्च रहेगा। राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन ढांचे में मार्च 2025 तक सामान्य सरकारी ऋण को जीडीपी के 60 प्रतिशत और केंद्र सरकार के ऋण को 40 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया था।
वर्तमान स्थिति में, केंद्र सरकार का सकल ऋण 2031 में भी वांछित स्तर से लगभग 10 प्रतिशत अंक अधिक होगा। दूसरा, सरकार अगले वर्ष ऋण और कम करने का लक्ष्य रख सकती थी क्योंकि आने वाले वर्षों में ऐसा करना और कठिन हो सकता है। उदाहरण के लिए, सरकार को आठवें वेतन आयोग के लिए प्रावधान करना होगा। दूसरा 2030-31 से पहले आम चुनाव भी होंगे। अर्थव्यवस्था की अपेक्षित दर से अधिक वृद्धि को देखते हुए सरकार और अधिक सख्त कदम उठा सकती थी।
आदर्श रूप से ऋण में निरंतर कमी के लिए सरकार को कम से कम एक छोटा प्राथमिक अधिशेष बनाए रखना चाहिए। ऋण में कमी की गति भी नॉमिनल जीडीपी वृद्धि और ब्याज दरों द्वारा निर्धारित की जाएगी। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण होगा कि विकास दर उच्च स्तर पर बनी रहे। इसके अलावा समग्र राजकोषीय और व्यापक आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में दो अन्य मुद्दे भी ध्यान में रखने योग्य हैं। पहला, सामान्य सरकारी ऋण पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है, जो जीडीपी का लगभग 80 प्रतिशत है।
इस समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित एक विश्लेषण से पता चला है कि राज्यों में ऋण स्तर में वृद्धि होने की संभावना है, जिससे आने वाले वर्षों में केंद्र के स्तर पर ऋण में कमी काफी हद तक प्रभावहीन हो सकती है। इसलिए केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर ऋण कम करने की गति बढ़ाने के तरीके खोजना महत्त्वपूर्ण है। दूसरा, समग्र राजकोषीय नियोजन में धन का इंतजाम करने की अर्थव्यवस्था की क्षमता को ध्यान में रखना महत्त्वपूर्ण है।
सरकार की बढ़ती वित्तीय आवश्यकताओं से निजी निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। रिपोर्टों के अनुसार बॉन्ड बाजार सरकारी बॉन्डों की अधिक आवक से चिंतित है। वर्ष 2024-25 में घरेलू बचत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की लगभग 6 प्रतिशत थी, जो सरकार की सामान्य वित्तीय आवश्यकता से काफी कम है। यदि निजी कॉरपोरेट निवेश में अपेक्षित रूप से वृद्धि होती है, तो बाजार में ब्याज दरें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसलिए यह कहना उचित होगा कि वार्षिक बजट के आंकड़ों से परे मध्यम अवधि के लिए सामान्य सरकारी राजकोषीय नियोजन की आवश्यकता है।