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BS Exclusive: खास घटना नहीं व्यापक बुनियाद पर बना है बजट- वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

समझौते की घोषणा से एक दिन पहले केंद्रीय बजट पेश कर चुकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मानती हैं कि समझौता कुछ वक्त पहले हो जाता तो भी बजट पर कोई फर्क नहीं पड़ता

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को व्यापार, निर्यात, विनिर्माण समेत समूची भारतीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से बहुत बड़ी घटना माना जा रहा है, जिसका देश पर बहुआयामी प्रभाव पड़ सकता है। मगर समझौते की घोषणा से एक दिन पहले केंद्रीय बजट पेश कर चुकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मानती हैं कि समझौता कुछ वक्त पहले हो जाता तो भी बजट पर कोई फर्क नहीं पड़ता। सीतारमण ने बुधवार दोपहर नए संसद भवन के भीतर अपने कार्यालय में असित रंजन मिश्र, विकास धूत, निवेदिता मुखर्जी और ए के भट्टाचार्य के साथ बातचीत में यह कहा। प्रमुख अंश:

इस बजट में किन प्रमुख मुद्दों पर ध्यान दिया गया है? क्या भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पहले हो गया होता तो इस बजट का रंग-ढंग अलग होता?

बजट तैयार करते समय मैं हमेशा व्यावहारिक रही हूं। यही कारण है कि यह कभी भी किसी घटना पर निर्भर या किसी एक खास मुद्दे पर आधारित बजट नहीं रहा है। उदाहरण के लिए कोविड महामारी के समय हमने बजट में केवल इसी को ध्यान में नहीं रखा था या उसके बाद हमने यह नहीं सोचा कि हम केवल कोविड के बाद सुधार प्रक्रिया पर बजट केंद्रित करेंगे।

इस तरह, हमने इस बजट को एक दीर्घ एवं बड़ी योजना को देखते हुए तैयार किया है न कि किसी एक घटना से जोड़ा है भले ही वह कितनी भी गंभीर क्यों न हो। आपका दूसरा सवाल यह है कि क्या बजट से पहले ही अमेरिकी शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो गया होता इसका रंग-ढंग अलग होता। मैं कहूंगी कि ऐसा नहीं होता।

क्या आप बजट की कुछ खास बातें बता सकती हैं?

प्रधानमंत्री ने सत्र की शुरुआत में बताया था कि यह शताब्दी के दूसरे चौथाई हिस्से का पहला बजट है और इस अवधि में वर्ष 2047 में विकसित भारत तैयार करने का लक्ष्य भी शामिल होगा। लिहाजा मुझे उस दिशा में 20 से अधिक वर्षों के लिए योजना तैयार करनी है। मैं नए वित्त आयोग के सुझावों के साथ आगे बढ़ रही हूं और अगले पांच वर्षों के लिए योजना बनाने की आवश्यकता है। यह पांच वर्षों में पहला है। उस लिहाज से यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बजट है। इस बजट का ध्यान स्थिर विकास को सतत बनाए रखना है।

क्या आप भी मानती हैं कि आप नॉमिनल वृद्धि और वास्तविक संग्रहों के बीच अंतर को लेकर अधिक रूढ़िवादी रही हैं? क्या अगले वर्ष के लिए राजकोषीय घाटा कम करने का लक्ष्य टाला नहीं जा सकता था?

मैं सहमत हूं मगर बहुत सी वैश्विक अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं। आयकर और जीएसटी राहत के बाद मेरा दृढ़ विश्वास है कि इन उपायों से  लोगों को अधिक रकम बचाने और खरीदारी करने में मदद मिलेगी। इसके बाद ध्यान आर्थिक तरक्की पर रहना चाहिए। मैं कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहती थी। मेरा यही सोचना था कि क्या अब मेरे पास वह थोड़ी सी गुंजाइश हो सकती है।

तो आप वर्ष के अंत में एक सकारात्मक मगर चौंकाने वाली स्थिति देने वाली हैं?

नहीं, सिर्फ मेरे लिए यह गुंजाइश होनी चाहिए क्योंकि क्योंकि आपको नहीं पता कि वैश्विक स्तर पर क्या होने वाला है क्योंकि कई चुनौतियां आज भी बरकरार हैं। हाल ही में हुई बातचीत (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत का जिक्र करते हुए) के बाद मैं कह सकती हूं कि देश में विदेशी रकम फिर  वापस आने की संभावना है।

सीमा शुल्क ढांचे में व्यापक स्तर पर बदलाव की उम्मीद की जा रही है। कुछ कदम उठाए गए हैं मगर अन्य उपायों की भी जरूरत बताई जा रही है…।

मैं यह सब इस बजट के दौरान कर सकती थी मगर लेकिन आयकर के उलट सीमा शुल्क के कई अलग-अलग आयाम हैं। इनमें शुल्क, देश में आने वाले सामान की जांच, निर्यातकों और आयातकों के लिए जरूरी सावधानियां,  स्वास्थ्य मानक और जांच प्रयोगशाला, इलेक्ट्रॉनिक और सेमीकंडक्टर सभी शामिल हैं। हम इन्हें लेकर कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते थे। हम इस ओर जरूर ध्यान देंगे और शायद ट्रेजरी संशोधनों के दौरान भी यह किया जा सकता है। इसमें से कुछ को बाद में एक साथ पैकेज के रूप में भी दिया जा सकता है।

क्या आपको लगता है कि निजी क्षेत्र से पूंजी निवेश आखिरकार शुरू हो जाएगा? क्या कोई खास उपाय हैं जो इसमें मदद कर सकते हैं?

कोई खास उपाय नहीं है। मैंने कंपनी कर में कटौती कर चुकी हूं। हमने इसे आसान बना दिया। आयकर में भी कर श्रेणियां दुरुस्त बनाई गई हैं।  इसलिए मुझे लगता है कि उद्योग जगत को भारत की आर्थिक तरक्की में भाग लेने के तरीकों पर सोचना होगा।

वैश्विक अनिश्चितताएं बरकरार हैं मगर अमेरिका के साथ समझौता होने के बाद बाहरी चुनौतियां अब कम हैं। क्या यह आंतरिक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का समय है?

हालात अब सुधरने चाहिए। मगर पहली घोषणा (अमेरिका के साथ समझौते पर) हम पर लगाए गए शुल्क को लेकर है जो 18 प्रतिशत रह गया है। विस्तृत ब्योरा अभी आना है। मुझे नहीं लगता कि वैश्विक चुनौतियों के बीच मैंने आंतरिक चुनौतियों पर कम ध्यान दिया है। मैं उन पर एक साथ काम कर रही हूं इसलिए अगर बाहर सब कुछ सुलझ जाता है,तो भी कई चीजें करने के लिए हैं।

बजट भाषण के दूसरे भाग में आपने कर निश्चितता वाले कई कदमों को सूचीबद्ध किया है। यह अच्छी बात है लेकिन एक धारणा यह भी है कि सॉवरिन गोल्ड बॉन्ड के पूंजीगत लाभ ढांचे को बदलना पुरानी तिथि से कानून लगाने जैसा है। आपका क्या कहना है?

बिल्कुल नहीं। इसे बहुत स्पष्ट रूप से इस उद्देश्य से शुरू किया गया था कि लोग इसमें निवेश करें। शुरू करते समय ही हम स्पष्ट थे कि इसे परिपक्वता तक रखना होगा। इसमें दो सीमाएं थीं। आप प्राथमिक बाजार निर्गम में आते हैं और इसे रखते हैं तो यह स्वाभाविक है मानना कि लाभ आपको मिलेगा, लेकिन इन दोनों सीमाओं को पूरा करना आवश्यक है। एक और उदाहरण है कि यदि कोई इसे द्वितीयक बाजार से खरीदता है और बाहर निकल जाता है तो निष्पक्ष रूप से देखें तो उसे लाभ नहीं मिल सकता, और यही हमने कहा है।

डेटा-सेंटर क्लाउड सेवा क्षेत्र में घरेलू कारोबारी यह जानने को उत्सुक हैं कि क्या उन्हें भी वही कर राहत मिलेगी? क्या इस विषय पर स्पष्टीकरण जरूरी है?

अगर स्पष्टीकरण की जरूरत है तो हम जारी करेंगे। लेकिन मैं कहना चाहती हूं कि यहां सबके लिए समान अवसर हैं। घरेलू निवेशकों को कोई नुकसान नहीं हैं। हमने उनके या घरेलू परिचालकों के लिए कोई असहजता नहीं पैदा की है। मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि जो भी लागू होगा वह सभी पर समान रूप से लागू होगा।

आपने बजट में यह प्रस्ताव रखा है कि वैश्विक अनिश्चितता के कारण एसईजेड घरेलू क्षेत्र में बिक्री कर सकेंगे। क्या आपको लगता है कि अमेरिका के साथ समझौते के बाद भी इसकी जरूरत होगी?

जैसा कि मैंने कहा इसे स्पष्ट होने दें। तब तक के लिए जो व्यवस्था है वही रहेगी। यह वैसे भी अस्थायी उपाय है। घरेलू क्षेत्रों में होने वाली बिक्री निर्यात का एक छोटा हिस्सा होगी। ऐसा नहीं होगा कि निर्यात के बजाय केवल देश में बिक्री की जाए।

आम तौर पर आप राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए पूंजीगत व्यय में कटौती नहीं करतीं? आपको लगता है कि 2025-26 एक अपवाद है?

मैंने बजट को अंतिम रूप देने के पहले इसे देखा था। कई विभाग अभी तक मुझे उपयोगिता प्रमाणपत्र नहीं दे पाए हैं। राज्य भी इन प्रमाणपत्रों को रोके बैठे हैं। मैं बिना उपयोगिता प्रमाणपत्रों के पैसा जारी नहीं कर सकती। यह दिक्कत कई राज्यों में है।

अर्थशास्त्री मान रहे हैं कि बजट से आगामी वर्ष में वृद्धि दर 0.6 फीसदी से 0.8 फीसदी तक बढ़ावा देगा। अप्रत्यक्ष कर संबंधी धारणाओं पर आपने 0.2 फीसदी कर कर वृद्धि के साथ सतर्क नजरिया अपनाया है।

मैं अर्थव्यवस्था को नीचे नहीं आने देना चाहती। किसी भी क्षेत्र में मामूली गिरावट सही जा सकती है लेकिन वित्त मंत्रालय के आंकड़े पत्थर की लकीर हैं। मुझे इसका ध्यान रखना होता है। वरना बीते पांच सालों में वित्तीय अनुशासन और बजट में पारदर्शिता से जो विश्वसनीयता हासिल हुई है वह सब सामने आ जाएगी। यह सब कठिन श्रम से मिला है।  मुझे ऐसे आंकड़े पेश करने होंगे जो अर्थव्यवस्था में भरोसा कमजोर न करें।

विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के लिए क्या किसी और तरीके पर विचार कर रही हैं?

पहले जब विदेशी निवेश बाहर गया था तब भी हमारी वृहद आर्थिक बुनियाद मजबूत थी। वे लाभ कमाकर चले गए। बुनियादी संकेतक तब भी मजबूत थे और अब भी मजबूत हैं। परंतु निवेश को वापस आने के लिए कुछ और चाहिए। अगर आप अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  के बीच 2 फरवरी को हुई बातचीत की प्रतिक्रिया देखें तो आपको अंदाजा मिलेगा। अब वातावरण में अलग किस्म की ताजगी है। मुझे उम्मीद है कि निवेश आएगा। फोन पर बातचीत के बाद माहौल बदल रहा है। कनाडाई फंड, नॉर्वेजियन फंड, ईएफटीए आदि आ रहे थे, हमारी नजर उन पर है जो हवा का रुख बदलने की प्रतीक्षा करते हैं।

क्या आपको लगता है कि वायदा और विकल्प कारोबार पर प्रतिभूति लेनदेन कर में इजाफा भागीदारी कम करने के लिए पर्याप्त होगा, जो कि प्राथमिक लक्ष्य है। या वित्त मंत्रालय और नियामकों को और कार्रवाई करनी होगी?

शायद नियामक की ओर से और कार्रवाई की जरूरत होगी। एक सीमा के बाद कर लगाने से काम नहीं बनता। शराबबंदी किसी राज्य में कामयाब नहीं रही। इसलिए मुझे नहीं लगता कि मंत्रालय को और कुछ करने की जरूरत है। हम सिर्फ उन्हें बता सकते हैं कि यह खतरनाक है। सटोरिया गतिविधियों की कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन यह बताने की भी एक सीमा है। अगर कोई अपने हाथ जलाना ही चाहता है तो उसकी मर्जी। अध्ययन बताते हैं कि वायदा एवं विकल्प में कारोबार करने वाले 90 फीसदी लोगों को नुकसान हुआ है। इसलिए सरकार इससे अधिक कुछ नहीं कर सकती।

अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में पीछे की कहानी क्या है? क्या आपको इसके अभी होने की उम्मीद थी?

यह कहना सही नहीं होगा कि हम इस समझौते के किसी खास वक्त पर होने की उम्मीद कर रहे थे या नहीं। लेकिन यह हुआ और हम इसका स्वागत करते हैं।

आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि विकसित भारत का लक्ष्य पाने के लिए हमें एक साथ भर्राटा भी भरना होगा और मैराथन की तरह धीमी और लंबी दौड़ भी लगानी होगी। क्या कोई स्पष्टता है कि हमें कब धीमे और कहां तेज भागना है?

नहीं। इसीलिए मैंने कहा कि इस बजट में एक साल का एजेंडा है जिसे भर्राटा कह सकते हैं और विकसित भारत की दिशा में मैराथन। लेकिन दोनों के बीच में पांच साल की समय-सीमा भी है। यह कहना शब्दों की बाजीगरी भी है लेकिन ग्रामीण सुधार, आर्थिक क्षेत्र के रूप में शहरों, जल मार्गों के लिए हमारी योजनाएं तात्कालिक भी हैं और दीर्घकालिक भी। युवाओं को कौशल संपन्न बनाना, एआई से कृषि और उद्योगों तथा विज्ञान-प्रौद्योगिकी की उत्पादकता बढ़ाना आदि सभी का मिश्रण बजट में मिलेगा। पहले आपको खोजना होगा, फिर निकालना होगा, फिर उसे परिष्कृत करना होगा ताकि वे चीजें बनाई जा सकें जो सौर ऊर्जा, हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर और रोबोट्स के लिए आवश्यक हैं। लेकिन कच्चे माल के लिए कहीं और पर निर्भर रहना हमें इस स्थिति तक ले आया है कि किसी भी छोटे निर्णय का उल्टा असर हम पर पड़ता है।

लेकिन केरल ने इसका विरोध किया है।

विरोध नहीं किया है उन्होंने केवल यह कहा है कि हमने उन्हें कुछ नहीं दिया। वे भूल गए हैं कि मैंने संबंधित कॉरिडोर में उनका नाम भी घोषित किया था। उन्हें कर विभाजन में भी बेहतर हिस्सा मिला है। वित्त आयोग के पांच साल के कार्यकाल में हर वर्ष प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने राज्यों को पर्याप्त राशि नहीं दी। अब बेहतर धनराशि मिलने पर भी वे प्रधानमंत्री को धन्यवाद नहीं दे रहे हैं। अब वे कह रहे हैं कि यह राशि वित्त आयोग ने दी है। यह राजनीति है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने भी कहा है कि बजट में राज्यों के लिए कुछ खास नहीं है। क्या आपको यह अनुचित लगता है?

तमिलनाडु इकलौता राज्य है जिसे रक्षा कॉरिडोर भी मिला और दुर्लभ खनिज कॉरिडोर भी। कोई भी राज्य मुझ पर आरोप लगा सकता है कि मैंने ये तमिलनाडु को दे दिए उन्हें नहीं दिए। क्या उन्हें अंदाजा है कि बेंगलुरू से चेन्नई को जोड़ने वाले हाई स्पीड कॉरिडोर की क्या अहमियत है। अगर आपको लगता है कि सभी लोग अंधे, बहरे और गूंगे हैं तो आप जो चाहे कह सकते हैं।

लोगों को यह बात परेशान कर रही है कि राज्यों और केंद्रीय विभागों द्वारा अपने धन का उपयोग सुनिश्चित करने की क्या व्यवस्था है? क्या कोई संस्थागत तंत्र जरूरी है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य और केंद्रीय मंत्रालय वास्तव में धन खर्च करें। उदाहरण के लिए जल जीवन मिशन के तहत। आपने पारदर्शिता की ओर कदम बढ़ाया है, लेकिन लोगों की सूचनाओं पर कार्रवाई करने की आवश्यकता है क्या?

जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार अंतिम छोर के काम को बाधित करता है, उसे परियोजना को पूरा करने की उत्सुकता और प्रयास में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जैसे मनरेगा में था, वैसे ही कुछ राज्यों में जल जीवन मिशन में भी है। ऐसा भ्रष्टाचार परियोजना की मंशा को ही बिगाड़ सकता है। आप पाइप बिछा सकते हैं लेकिन उस स्रोत में पानी ही नहीं है, जहां से आना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जब आप देखते हैं कि लोग किसी अच्छे इरादे वाली परियोजना का दुरुपयोग कर सकते हैं, तो आपको उसे सुधारना होगा। क्या हमने मनरेगा को ठीक नहीं किया? आपको वीबी जी राम जी का नाम भले पसंद नहीं आए लेकिन क्या मैंने उसके लिए करीब 95,000 करोड़ रुपये नहीं दिए। हमने एक ही साल में मनरेगा और वीबी जी राम जी के नाम पर 1.20 लाख करोड़ रुपये से अधिक दिए। ऐसा भी हुआ कि व्यवस्था का दुरुपयोग हुआ और सीएजी ने रिपोर्ट दी। राज्य टीम और केंद्रीय टीम उन गांवों में एक साथ गए जहां यह हो रहा था और राज्य टीम इसे गलत साबित न कर सकी। तब यह तय किया गया कि वह पैसा वापस सरकारी व्यवस्था में आएगा। वीबी जी राम जी इसका उदाहरण है कि कैसे प्रधानमंत्री मोदी व्यवस्था के दुरुपयोग को बरदाश्त नहीं कर सकते।

बजट में आपने 200 पुराने औद्योगिक क्लस्टरों को उन्नत करने की बात की थी। क्या उनकी पहचान कर ली गई है, उनका किस प्रकार उन्नयन किया जाएगा?

मैं एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) मंत्रालय के साथ काम कर रही हूं। जब मैं कहती हूं कि विनिर्माण को सतत विकास के स्तंभों में से एक बनाना है तो मैं केवल बड़े उद्योगों की बात नहीं करती हूं। सिक्के का एक पहलू है पीएलआई। उसके माध्यम से हम उन उद्योगों को देखते हैं जहां श्रमिक की बहुत जरूरत होती है और निर्यात की संभावना होती है। इसमें सेमीकंडक्टर, फोन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, रत्न और आभूषण, वस्त्र आदि क्षेत्र हैं।  सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि हमारे निर्यात का 40 प्रतिशत एमएसएमई से होता है। मझोले उद्योग संभावनाओं के बावजूद बढ़ना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि वे एमएसएमई लाभ खो देंगे। हमने मानदंड बदले हैं। हम उन्हें एमएसएमई श्रेणी में रहते हुए भी मदद प्रदान करेंगे।

विदेशी निवेशकों के लिए एआईएफ (वैकल्पिक निवेश फंड) निवेश की उच्च सीमा को पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है। लेकिन घरेलू बचत पूल को जुटाने की चुनौती भी है। खासकर उच्च- मूल्य (हाई नेटवर्थ) वाले व्यक्तियों से जो पोर्टफोलियो मार्ग का उपयोग करके विदेश में निवेश कर रहे हैं और संभवतः घरेलू निवेशों के लिए उपलब्ध बचत को कम कर रहे हैं। क्या आपको चिंता होती है कि कैसे इन बचतों को घरेलू उद्यमों और परियोजनाओं में लाया जा सके?

मुझे नहीं लगता कि इसका कोई एक जवाब है। मैं उन्हें बाहर जाने के लिए प्रोत्साहित नहीं कर रही हूं लेकिन इसमें वास्तव में निवेश योग्य धन कम नहीं हो जाता। बाहर जाने के कुछ लाभ हैं, लेकिन हां, उसका उल्लेखनीय हिस्सा वापस भारत में निवेश के लिए आ रहा है। हमें उन्हें आकर्षित करना होगा। विलय और अधिग्रहण की लहर अक्टूबर में कुछ समय के लिए रुकी थी, लेकिन अब फिर से शुरू हो रही है, और आईपीओ में बढ़ती रुचि भी है। बीच में यह चर्चा थी कि पारंपरिक व्यापारिक घराने और उनके उत्तराधिकारी इसे जारी नहीं रखना चाहते, वे इसे कहीं और लगा रहे हैं और प्रतिफल कमा रहे हैं। आप उन्हें दोष नहीं दे सकते, यह उनका पैसा है। फिर भी, भारत अधिक निवेश, अधिक क्षमता निर्माण, अधिक रोजगार सृजन और अधिक उत्पादन का लाभ चाहता है।

टाइगर ग्लोबल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद क्या कुछ स्पष्ट करने की जरूरत है ताकि यह अनिश्चितता का विषय नहीं बने?

नहीं। मैं डीटीएए और जनरल एंटी अवॉयडेंस रूल्स (जीएएआर) के हर शब्द का सम्मान करती हूं। लेकिन अगर कभी-कभार किसी एक मामले में दुरुपयोग होता है, तो मुझे इसलिए आंखें नहीं मूंदनी चाहिए कि निवेशकों का मन प्रभावित होगा। जहां दुरुपयोग है, वहां कानूनी उपाय मौजूद है। विभिन्न स्तरों पर न्यायपालिका ने इसे देखा और सहमति दी कि दुरुपयोग हुआ था। इसे इस रूप में नहीं देखा जा सकता कि मैंने डीटीएए या जीएएआर मानदंडों का उल्लंघन किया है। दुरुपयोग को पहचानना, नोटिस करना और कानूनी रूप से निपटना मेरा कर्तव्य है। मुझे नहीं लगता कि जिस विशेष मामले का आप उल्लेख कर रहे हैं, उसमें इससे अधिक कुछ है। कानून सही है और 2012 के वोडाफोन कर की तरह  स्वभाव से प्रतिगामी नहीं है। यह कानून भावी प्रकृति का था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे प्रतिगामी प्रभाव के साथ पढ़ा। इसलिए प्रश्न व्याख्या पर है न कि कानून पर।  मुझे नहीं लगता कि यह धारणा सही है।

तो आपको नहीं लगता है कि यह एक नजीर स्थापित करेगा?

नहीं। यही कारण है कि मैं कह रही हूं कि यह एक ऐसा मामला है जहां दुरुपयोग हुआ था। कानून को अदालत के सामने पढ़ा गया, दोबारा पढ़ा गया, साक्ष्यों के साथ बहस हुई, और इसलिए अदालत ने कहा, ‘हां, यह कानून का दुरुपयोग है।’ यह निर्णय व्याख्या के संदर्भ में कोई मिसाल स्थापित नहीं करता। कानून की व्याख्या की गई और दुरुपयोग को उजागर किया गया। बस इतना ही।

आपने आठ पूर्ण बजट और एक अंतरिम बजट प्रस्तुत किया है। क्या आपको लगता है कि बजट बनाने में एक अलग दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, किसी प्रकार का नवाचार, कोई नया विचार जिसे आप इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहती हों?

किसी भी नए विचार को स्वीकार करने के लिए खुले मन का होना चाहिए। लेकिन दो बातें हैं। इस प्रक्रिया में बहुत अधिक खुलापन हो सकता है, मैं दस्तावेज की बात नहीं कर रही हूं। यही कारण है कि हम बहुत से लोगों से जुड़ रहे हैं, इसे वेबसाइटों पर डाल रहे हैं और कह रहे हैं ‘अपने सुझाव दीजिए’। यहां तक कि यदि आप व्हाट्सऐप पर संदेश भेजते हैं, तो हम उसे भी देखेंगे। हम कॉलेजों में जा रहे हैं। मैंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के छात्रों को आमंत्रित किया। यह अर्थशास्त्र का प्रतिष्ठित संस्थान है तो उनको बजट निर्माण में भूमिका निभानी चाहिए। इसलिए मैं उन्हें हर साल बुलाती हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ एक युवा संवाद हुआ था जिसमें बहुत से विचार आए। कुछ को हमने बजट में शामिल किया। बजट के बाद मैंने कहा कि मैं जाकर साक्षात्कार नहीं दूंगी। लोग बजट सुन चुके हैं। उस दिन मैं पूरे भारत के छात्रों से जुड़ूंगी। हमने पूरे भारत से 33 छात्रों को संसद में बैठने, बजट देखने और बजट के बाद शाम को मेरे साथ बैठने के लिए बुलाया। इसलिए यह प्रक्रिया पहले से ही काफी खुली है। तमाम खुलेपन के बीच मैं दोहराती हूं कि मैं पारदर्शिता के लिए प्रतिबद्ध हूं किंतु दस्तावेज के मामले में नहीं। मैं पार्ट बी को पारदर्शी नहीं बना सकती। यह तमाम अटकलों को जन्म दे सकता है।

First Published : February 5, 2026 | 11:23 PM IST