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जमीनी राजनीति से सत्ता के शिखर तक, अजित पवार की राजनीतिक यात्रा

अब अजित पवार के निधन के बाद शेष 40 विधायकों को यह तय करना होगा कि वे भाजपा और शिवसेना के साथ महायुति में बने रहना चाहते हैं या शरद पवार खेमे में वापस जाना जाएंगे।

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आदिति फडणीस   
Last Updated- January 29, 2026 | 8:41 AM IST

अपने समर्थकों के बीच ‘अजित दादा’ के नाम से लोकप्रिय महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री अजित पवार (66) की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई। इस दुर्घटना में चार अन्य की भी जान चली गई। पवार महाराष्ट्र में जिला परिषद चुनावों में प्रचार के लिए जा रहे थे। पवार ने उस कार्य के दौरान अपनी जान गंवाई जिसे वह अपना कर्तव्य (चुनावी राजनीति में सबसे निचले स्तर पर प्रचार) मानते थे। जमीनी राजनीति और राजनीतिक समझ-बूझ उनकी सबसे बड़ी ताकत और उनका प्राथमिक पेशा था।

अजित पवार राजनीतिक दिग्गज एवं चार बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे शरद पवार के भतीजे थे। भारतीय संदर्भ में यह एक करीबी पारिवारिक संबंध था जिसने शरद पवार और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की रणनीतियों और राजनीति को परिभाषित किया जो हमेशा ‘परिवार सर्व प्रथम’ पर केंद्रित था। अजित को पहली बड़ी चुनावी सफलता 1991 में मिली जब वह बारामती से लोकसभा के लिए चुने गए। वह तब मात्र 32 वर्ष के थे। शरद पवार के केंद्र में पी वी नरसिंह राव सरकार में रक्षा मंत्री के रूप में शामिल होने के बाद उन्होंने छह महीने के भीतर सीट खाली कर दी जिससे उनके चाचा को
उप-चुनाव में चुनाव लड़ने में मदद मिली।

अजित स्वयं बारामती विधानसभा सीट जीतकर राज्य की राजनीति में आ गए। 1999 में जब शरद पवार ने कांग्रेस और सोनिया गांधी के ‘विदेशी मूल’ के खिलाफ राकांपा बनाई तो तो यह अजित पवार ही थे जिन्होंने नई पार्टी के लिए विशेष रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र में जमीन तैयार की। उन्होंने सहकारी समितियों एवं स्थानीय संस्थानों पर अपनी मजबूत पकड़ का लाभ उठाया और राकांपा को मजबूती दी। सहकारी समितियां एवं स्थानीय संस्थानों का इस क्षेत्र में राजनीति का एक बड़ा मगर दखल रहा है।

सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने

40 साल की उम्र में अजित पवार विलासराव देशमुख सरकार (1999-2003) में सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने। उन्होंने सिंचाई विभाग संभाला। यह उनकी गतिविधि का क्षेत्र और उनकी शक्ति का स्रोत दोनों बन गया। उनके विभाग ने जलविद्युत बिजली परियोजनाओं, नहरों एवं सिंचाई स्रोतों के लिए अनुबंधों का प्रबंधन किया। उनके काम ने लोगों का ध्यान खींचा। उन्हें जल्द ही एक कर्मठ व्यक्ति के रूप में जाना जाने लगा। मगर उनकी पहचान एक सख्त स्वभाव वाले राजनीतिज्ञ की भी बन गई जो उनके चाचा के विपरीत था। शरद पवार हमेशा प्रतिद्वंद्वियों के प्रति सहनशील और सौहार्दपूर्ण स्वभाव के लिए जाने जाते थे।

शरद पवार ने स्वयं कुछ साल पहले एक सार्वजनिक बैठक में इस अंतर का जिक्र किया और कहा, ‘अजित स्वभाव से, अलग है। वह एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जमीन पर काम करना पसंद करते हैं और परिणामोन्मुखी हैं। वह मीडिया के अनुकूल नहीं हैं और प्रचार की परवाह नहीं करते हैं। वह पार्टी और राज्य के लिए काम कर रहे हैं। उनके बारे में गलत धारणाएं हैं।’

अजित की और शरद पवार के व्यक्तित्व का टकराना तय था। बारामती में अजित के बढ़ते प्रभाव के कारण 1990 के दशक में मालेगांव सहकारी चीनी कारखाने में पवार समिति की सनसनीखेज हार हुई थी। शरद पवार के समकालीन एवं चीनी सहकारी राजनीति में एक सम्मानित व्यक्ति चंद्रराव तावडे ने हार का कारण अजित पवार का हस्तक्षेप बताया।

उन्होंने कहा कि अजित ‘अशिष्ट और अहंकारी’ थे। हालांकि, अजित के समर्थकों ने उनकी कसम खाई। एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने एक बार उन्हें एकनाथ शिंदे सरकार में एकमात्र मंत्री के रूप में वर्णित किया जो वादा करने पर उसे पूरा करते हैं’। अक्टूबर 2009 तक चाचा-भतीजे के रिश्ते में तनाव राकांपा में स्पष्ट हो गया था। अजित ने विधानसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री बनने का दावा किया मगर मौजूदा छगन भुजबल से पिछड़ गए। तब तक शरद पवार ने पहले ही अपनी बेटी सुप्रिया सुले को राकांपा में शक्ति के समानांतर केंद्र के रूप में बढ़ावा देना शुरू कर दिया था। इस बीच, कांग्रेस-राकांपा राजनीति में खामियों के कारण अजित की कार्यशैली आलोचना को आकर्षित करने लगी थी।

साल 2012 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में उप-मुख्यमंत्री के रूप में अजित पवार ने महाराष्ट्र में सिंचाई समस्याओं पर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण द्वारा एक श्वेत पत्र जारी किए जाने के बाद कई करोड़ के सिंचाई घोटाले में अपनी संलिप्तता के आरोपों के बाद इस्तीफा दे दिया। इन सबके बावजूद चाचा शरद उनके साथ खड़े रहे।

महाराष्ट्र की राजनीति में एक नाटकीय मोड़ 2019 के विधानसभा चुनावों के बाद आया। सुबह-सुबह तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और राकांपा के अजित पवार को उप-मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिला दी। भाजपा ने अक्टूबर के चुनावों में 105 सीटें जीती थीं। उसकी सहयोगी शिवसेना ने 56 सीटें जीती थीं। एक साथ सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें होने के बावजूद दोनों सहयोगी सत्ता-साझेदारी को लेकर झगड़ रहे थे। विवाद की जड़ मुख्यमंत्री की कुर्सी थी। अजित ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उन्होंने जरूरी बहुमत हासिल करने के लिए विधायकों को भाजपा में शामिल करा दिया। सवाल यह था कि क्या शरद पवार को पता था कि उनका भतीजा पाला बदलने वाला है और क्या उन्होंने इसके लिए अपनी मंजूरी दे दी थी।

शरद पवार का कहना है कि उन्हें अपने भतीजे की इस चाल की कोई जानकारी नहीं थी। मगर फडणवीस का कहना है कि शरद पवार को सब पता था। बाद में शरद पवार ने उद्धव ठाकरे (शिवसेना) और कांग्रेस के साथ महाविकास आघाड़ी का गठन किया। कुछ समय बाद अजित पवार वापस अपने परिवार में आ गए। हालांकि, 2023 में उनके रास्ते अलग हो गए। अजित पवार, प्रफुल्ल पटेल और अन्य राकांपा नेता से बाहर चले गए और पार्टी की संपत्ति और चिह्न भी अपने साथ ले गए। वे मुंबई में ‘महायुति गठबंधन’ और दिल्ली में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार में शामिल हो गए। अजित पवार ने नवंबर 2024 में महाराष्ट्र में अंतिम विधानसभा चुनाव ‘असली’ राकांपा के रूप में लड़ा। उन्होंने 288 सीटों में केवल 59 पर चुनाव लड़ा और 41 सीटें जीतीं जो किसी भी लिहाज से एक मजबूत प्रदर्शन माना जा सकता है।

अब अजित पवार के निधन के बाद शेष 40 विधायकों को यह तय करना होगा कि वे भाजपा और शिवसेना के साथ महायुति में बने रहना चाहते हैं या शरद पवार खेमे में वापस जाना जाएंगे।

First Published : January 29, 2026 | 8:41 AM IST