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स्वच्छ भारत की अगली चुनौती: सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर जोर

स्वच्छ भारत मिशन-शहरी की ताकत इस बात में है कि इसने शहरी स्थानीय निकायों के काम करने के तरीके और उनके प्रोत्साहनों को पूरी तरह बदल दिया

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अमित कपूर   
Last Updated- February 05, 2026 | 9:37 PM IST

भारतीय शहरों में स्वच्छता सुधारों के स्पष्ट परिणाम दिखे हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती अब भी दिखाई नहीं दे रही। यह चुनौती है सफाई के लक्ष्य को जन स्वास्थ्य और पर्यावरणीय सुरक्षा के कठिन कार्य के साथ जोड़ना। स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (एसबीएम-यू) देश के सबसे प्रभावशाली और सफल शहरी अभियानों में से एक है मगर इससे यह बात भी उजागर होती है कि केवल सफाई के आंकड़ों पर ध्यान दिया जाता है, उसके परिणामों पर नहीं। इस प्रयास का पैमाना सराहनीय है।

2016 में 7.3 करोड़ से अधिक आबादी वाले शहरों के सर्वेक्षण से शुरू होकर अब यह दुनिया का सबसे बड़ा शहरी स्वच्छता आकलन बन गया है। स्वच्छ सर्वेक्षण 2024-25 में विभिन्न जनसंख्या श्रेणियों के 4,589 शहरों को रैंकिंग दी जा रही है। इस विस्तार ने स्वच्छता को केवल समाज कल्याण के एक मामूली काम के बजाय अनिवार्य शहरी सेवा के रूप में स्थापित कर दिया है। किंतु आज भारतीय शहरों के सामने असली सवाल यह है कि इस मिशन का ढांचा सफाई से आगे बढ़कर व्यवस्थागत शहरी सुरक्षा की ओर बढ़ रहा है या नहीं।

स्वच्छ भारत मिशन-शहरी की ताकत इस बात में है कि इसने शहरी स्थानीय निकायों के काम करने के तरीके और उनके प्रोत्साहनों को पूरी तरह बदल दिया। स्वच्छता के परिणाम नगर पालिकाओं की फाइलों में नहीं दबते बल्कि प्रतिस्पर्धी रैंकिंग प्रणाली के जरिये राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चाओं के केंद्र में आ गए हैं।

स्वच्छ सर्वेक्षण 2024 के ढांचे के तहत, स्वच्छता के प्रदर्शन का मूल्यांकन 12,500 अंकों की एक व्यापक प्रणाली के माध्यम से किया जाता है। इसमें से 10,000 अंकों का मुख्य मूल्यांकन 10 प्रमुख विषयों पर आधारित है जिसमें प्रत्यक्ष साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन से लेकर इस्तेमाल किए गए पानी के प्रबंधन और स्वच्छता कर्मचारियों के कल्याण तक सब कुछ शामिल है।

इस सूक्ष्म और विस्तृत डिजाइन ने शहरों को उन क्षेत्रों में निवेश करने के लिए प्रेरित किया है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से बहुत कम बजट मिलता था जैसे, घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा करना, कचरा पुनर्चक्रण केंद्र, पुराने कचरे के ढेरों का निपटान, जल-मल शोधन संयंत्र आदि।

इस मिशन के विशाल पैमाने और व्यवहार बदलने की इसकी कोशिशों को दुनिया भर की संस्थाओं ने सराहा है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ शहरों के प्रदर्शन को सुधारने का ताकतवर हथियार बन गया है।

आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। कचरे को अलग-अलग करने वाले शहरी वार्डों की संख्या 2021 में 15 फीसदी थी जो 2023 में बढ़कर 89 फीसदी हो गई। वहीं, कचरे का प्रसंस्करण 2014 के 18 फीसदी से बढ़कर 2023 में 76 फीसदी हो गया है। इंदौर लगातार पहले पायदान पर इसीलिए बना हुआ है क्योंकि वहां लगभग हर घर से कचरा उठाया जाता है, गीले कचरे का प्रसंस्करण छोटी-छोटी जगहों पर होता है और नागरिकों तथा नगरपालिका के बीच फीडबैक की मजबूत व्यवस्था है।

लेकिन इंदौर की सफलता इस मिशन की एक बड़ी कमी को भी उजागर करती है। दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच इंदौर के भगीरथपुरा में नाली के पानी से दूषित पानी पीने पर कई लोग बीमार पड़ गए। यह समस्या सड़कों पर झाड़ू लगाने या दिखावटी सजावट की कमी से नहीं हुई थी क्योंकि इंदौर सफाई में माहिर है बल्कि यह शहरी जल की सुरक्षा, पानी के स्रोत की रक्षा और गंदे पानी के प्रबंधन की गहरी विफलता थी। यह घटना हमें एक कड़वी सच्चाई का अहसास कराती है कि स्वच्छता की अच्छी रैकिंग का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह शहर बीमारियों से सुरक्षित भी है।

स्वच्छ सर्वेक्षण के नए मानकों में अब इस्तेमाल किए गए पानी के प्रबंधन और जल निकायों को शामिल कर इस कमी को भरने की कोशिश की गई है। कुल अंकों का 10 फीसदी हिस्सा अब इसी पर निर्भर है। कागज पर तो यह ‘दिखावटी स्वच्छता’ से ‘पर्यावरणीय स्वच्छता’ की ओर एक बड़ा बदलाव है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी शहरों का ध्यान असल प्रदर्शन के बजाय केवल ढांचा खड़ा करने पर ही टिका है।

अक्सर सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र कागज पर तो होते हैं, लेकिन सही तरीके से काम नहीं करते। स्वच्छता के पैमाने पर ‘बेहतर प्रदर्शन’ करने वाले क्षेत्रों में भी पाइपों का रिसाव और पीने के पानी में गंदे पानी के मिलने का खतरा बना रहता है। सबसे खतरनाक विफलताएं वे होती हैं जो तब तक दिखाई नहीं देतीं जब तक कि लोग बड़ी संख्या में बीमार न पड़ने लगें।

एक बुनियादी कमजोरी मिशन की डेटा प्रणाली में भी है। सर्वेक्षण का ढांचा काफी हद तक नगर निगमों द्वारा हर महीने खुद अपलोड की गई जानकारी पर निर्भर करता है और बाद में नमूनों और थर्ड पार्टी निरीक्षणों के जरिये इसकी पुष्टि की जाती है। गलत जानकारी पर अंक काटने की व्यवस्था भी है। लेकिन यह तंत्र शहरों को ‘जोखिम कम करने’ के बजाय केवल ‘अंक हासिल करने’ की होड़ में लगाता है। ऐसी चीजों पर ध्यान कम ही जाता है, जो तकनीकी रूप से जटिल हैं या जिन्हें समझाना कठिन है।

शहर वह जल्दी सीख जाते हैं, जिसके लिए उन्हें इनाम मिलता है। जमीन के नीचे बिछी सीवर लाइनों की मरम्मत करने, पानी में क्लोरीन की मात्रा जांचने या साफ पानी में गंदा पानी मिलने का खतरा पता करने से ज्यादा आसान है सड़कों पर समय से झाड़ू लगाना, कूड़ेदान रखना या सौंदर्यीकरण कराना। इस वजह से हालत ऐसी हो गई है कि शहर दिखते तो साफ हैं मगर सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

अच्छी बात यह है कि इस मिशन ने आम नागरिकों की सोच बदल दी है। अब साफ सड़कें, चालू सार्वजनिक शौचालय और नियमित रूप से कचरे का संग्रह कोई सुविधा नहीं बल्कि बुनियादी शहरी अधिकार माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय और सरकार से जुड़े ढांचे लगातार बता रहे हैं कि संपत्ति निर्माण से आगे बढ़कर सेवा के परिणाम तक पहुंचना होगा। उदाहरण के तौर पर भारतीय संस्थाओं के साथ तैयार किए गए 2025 विश्व बैंक-एडीबी नॉलेज फ्रेमवर्क में भी बुनियादी ढांचा सृजन के बजाय ग्राहकोन्मुख सेवाओं को प्रोत्साहन देने का तर्क दिया गया है, जिसमें सुरक्षित पेयजल की विश्वसनीय आपूर्ति शामिल है।

एसबीएम-यू के अपने तंत्र के भीतर दिसंबर 2025 तक के सरकारी आंकड़े बताते हैं कि लोगों के घर-घर जाकर 97 प्रतिशत कचरा संग्रह किया गया है और करीब 80.31 प्रतिशत कचरा प्रसंस्करण किया गया है। इससे संकेत मिलते हैं कि ठोस कचरा प्रबंधन में हमने काफी सुधार किया है लेकिन अब असली चुनौती इस प्रक्रिया को और गहराई तक ले जाने की है। स्वच्छता को अब केवल दिखने वाली सफाई नहीं, बल्कि शहरी सुरक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। इसमें पानी की शुद्धता, बाढ़ से सुरक्षित नालियां और बीमारियों को रोकना शामिल होना चाहिए।

भविष्य में रैंकिंग को खत्म करने की जरूरत नहीं है बल्कि उसे और बेहतर बनाने की जरूरत है। पानी की गुणवत्ता की जांच और जल जनित बीमारियों के संकेतों और आपातकालीन प्रतिक्रिया क्षमता को स्वच्छता की कहानी का मुख्य हिस्सा बनाना चाहिए। उसे रहने योग्य और टिकाऊ शहरों के ठोस उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए।

शहरों को केवल इसलिए इनाम नहीं मिलना चाहिए कि वहां कचरा नहीं है बल्कि इसलिए मिलना चाहिए क्योंकि उनके पास ऐसी पुख्ता प्रणालियां हैं जो जानलेवा प्रदूषण को रोक सकें। इंदौर के भगीरथपुरा की घटना एक राष्ट्रीय चेतावनी है, जो आगाह करती है कि भारत की स्वच्छता यात्रा अब पेचीदा दौर में पहुंच गई है, जहां गलती की गुंजाइश बहुत कम है। इस मिशन ने सफाई को चर्चा का विषय बना दिया लेकिन अब इसे सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी उतना ही महत्वपूर्ण बनाना होगा। तभी भारत के शहर केवल साफ नहीं, बल्कि रहने लायक बन पाएंगे।


(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपेटिटिवनेस के अध्यक्ष हैं। इस आलेख में मीनाक्षी अजित का भी सहयोग है)

First Published : February 5, 2026 | 9:34 PM IST