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Editorial: अमेरिका की घटती वैश्विक भूमिका

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डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के निकलने असर जल्द ही महसूस किया जाएगा क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका अपनी सदस्यता शुल्क देना बंद कर देगा जिसे वह अनुचित मानता है।

Last Updated- January 23, 2025 | 9:35 PM IST
Donald Trump

अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पदभार संभालने के तुरंत बाद दो कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर किए जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि कैसे एक महाशक्ति जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य जैसी महत्त्वपूर्ण वैश्विक चुनौतियों का नेतृत्व करने से कदम पीछे खींच रहा है। इनमें से पहला आदेश, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के तहत 2015 के पेरिस समझौते से अमेरिका का बाहर निकलना है। वहीं दूसरा आदेश, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को छोड़ना है। ये दोनों ही निर्णय ट्रंप के अमेरिका प्रथम (अमेरिका फर्स्ट) एजेंडे को दर्शाते हैं। सवाल यह है कि इनसे बाहर निकलने का अमेरिका को क्या फायदा होगा और क्या इससे बाकी दुनिया, खासतौर पर विकासशील देशों पर वाकई कोई असर पड़ेगा जो दुनिया की आबादी का 83 फीसदी हिस्सा हैं।

सबसे पहले पेरिस समझौते से बाहर निकलने की बात पर आते हैं। पिछली बार जब अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने ऐसा किया तब यह कदम विफल रहा क्योंकि उस समय समझौते के मुताबिक किसी देश को समझौते से बाहर होने के लिए चार साल की समय-सीमा की आवश्यकता थी। लेकिन तब तक जो बाइडन अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए और अमेरिका इस समझौते में फिर से जुड़ गया। इसके अलावा 30 अमेरिकी राज्यों और कई स्थानीय निकायों ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के कार्यक्रमों पर अमल करना जारी रखा और समझौते का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध रहे। हालांकि अब इस समझौते से निकलने की समयसीमा एक वर्ष है। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण समझौते में अमेरिका फर्स्ट एजेंडे का कार्यकारी आदेश अन्य देशों में जलवायु परिवर्तन से निपटने और समझौते को अपनाने में अमेरिका के योगदान को सीमित करता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने जो बाइडन के कार्यकाल के दौरान स्थापित अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त योजना भी बंद कर दी जिसे बहुपक्षीय और द्विपक्षीय संस्थानों के माध्यम से फंड देने के लिए स्थापित किया गया था ताकि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में मदद मिल सके।

ट्रंप के शपथ ग्रहण से पहले ही निवेश बैंकों ने ग्रीन फंडों से निकलने के संकेत देने शुरू कर दिए थे जो वैसे भी विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह से अपर्याप्त है और अब तो यह जल्द ही खत्म हो जाएगा। ट्रंप ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के प्रभाव से जुड़े सभी शोध रोक दिए हैं और फिर से पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन पर दोबारा ध्यान केंद्रित किया है जिससे 2035 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 2005 के स्तर से 61-66 फीसदी तक घटाने के अमेरिका के लक्ष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है। वैश्विक तापमान रिकॉर्ड ऊंचाई को छू रहा है और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े उत्सर्जन करने वाले देश के द्वारा जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कार्रवाई रोकना, जलवायु संकट की गंभीरता के प्रति नकारात्मक संकेत देता है जो ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ाने में ऐतिहासिक रूप से जिम्मेदार रहा है।

डब्ल्यूएचओ से अमेरिका के निकलने असर जल्द ही महसूस किया जाएगा क्योंकि ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि अमेरिका अपनी सदस्यता शुल्क देना बंद कर देगा जिसे वह अनुचित मानता है। डब्ल्यूएचओ को सबसे ज्यादा फंड अमेरिका ने दिया और अब इसके निर्णय का तत्काल असर यह होगा कि कई महत्त्वपूर्ण वैश्विक शोध कार्यक्रमों की फंडिंग के लिए जोखिम बढ़ जाएगा जो बीमारियों और टीके के विकास के लिए हैं जिनमें चेचक, कोविड, फ्लू और महामारी के चलते उभरने वाली कई बीमारियां शामिल हैं। डब्ल्यूएचओ के माध्यम से ही अमेरिका गरीब देशों के बच्चों के लिए स्वच्छ जल, भोजन और टीके से जुड़े कार्यक्रमों के लिए मदद देता है।

डब्ल्यूएचओ से हटने से अमेरिका भी प्रभावित होगा क्योंकि यह बीमारियों से जुड़े वैश्विक सूचना डेटाबेस से बाहर हो जाएगा जिनमें इन्फ्लुएंजा की नई किस्म भी शामिल है। हालांकि इस तरह की आलोचना बिल्कुल जायज है कि डब्ल्यूएचओ में सुधार की आवश्यकता है लेकिन इससे अलग हो जाना इसका जवाब नहीं हो सकता है। यह संभव है कि चीन इस कमी को पूरा करने के लिए हस्तक्षेप करे जैसा कि उसने कोविड महामारी के दौरान ट्रंप द्वारा डब्ल्यूएचओ की फंडिंग रोकने के बाद 3 करोड़ डॉलर देने का वादा किया था। अब सवाल है कि क्या यह दुनिया के हित में है कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र अपना नैतिक नेतृत्व दुनिया के सबसे शक्तिशाली अधिनायकवादी शासन के हवाले कर रहा है।

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First Published - January 23, 2025 | 9:27 PM IST

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