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Editorial: हिट ऐंड रन कानून के लिए बेहतर पुलिस व्यवस्था जरूरी

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नया कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 106 के तहत आता है।

Last Updated- January 05, 2024 | 9:51 PM IST
Police

हिट ऐंड रन दुर्घटनाओं (वाहनों से सड़क पर हादसा कर भाग जाने के मामले) के लिए बने नए कानूनों के कुछ प्रावधानों का पहले ट्रक संचालकों और बाद में कैब चालकों का विरोध बताता है कि सड़क परिवहन उद्योग और देश की पुलिस तथा न्यायिक व्यवस्था दोनों में दिक्कतें हैं।

नया कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 106 के तहत आता है। संसद ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) को हटाकर उसकी जगह लागू करने के लिए बीएनएस पारित कर दी है। अगर कोई वाहन चालक खराब ढंग से वाहन चलाते हुए या असावधानीवश सड़क पर किसी को घायल कर देता है या उसके कारण किसी की मौत हो जाती है तब नई संहिता की धारा 106 कहती है कि चालक पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना दिए बगैर फरार हो जाता है तो उसे 10 वर्ष की कैद और/अथवा जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। आईपीसी के तहत ऐसे मामलों में केवल दो वर्ष की जेल और/अथवा जुर्माना था। नया कानून अमेरिका और यूरोपीय संघ में लागू कानून के अनुसार ही है।

उदाहरण के लिए अमेरिका में हर राज्य दुर्घटना के बाद फरार होने पर आपराधिक आरोप तय करता है। वहां इसके लिए 1 वर्ष से 15 वर्ष की कैद हो सकती है और 5,000 डॉलर से 20,000 डॉलर जुर्माना भी चुकाना पड़ सकता है। भारत में आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यहां कठोर कानूनी दंड की दरकार लंबे समय से थी।

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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि भारत में हिट ऐंड रन के 43,000 से 47,000 मामले दर्ज हैं और करीब 50,000 लोग इन मामलों में शिकार हुए। सड़क दुर्घटनाओ में होने वाली मौतों की दूसरी सबसे बड़ी वजह ऐसे ही मामले हैं, जहां दुर्घटना करने वाले किसी को सूचित किए बगैर घटनास्थल से निकल भागते हैं। चूंकि यह कानून सभी नागरिकों पर लागू होता है तो सवाल उठता है कि ट्रक चालक और कैब चालक इतना विरोध क्यों कर रहे हैं?

इस प्रश्न का उत्तर इस बात से मिलता है कि नए कानून से सबसे अधिक प्रभावित वे ही हो सकते हैं क्योंकि वाणिज्यिक वाहन चलाने वाले अक्सर तेज रफ्तार में या लापरवाही से वाहन चलाते पाए जाते हैं। उनकी नजर में ऐसा करना फायदेमंद है। उदाहरण के लिए यह बात हम सभी जानते हैं कि जो ट्रक चालक माल को समय से पहले तय जगह पर पहुंचा देते हैं उन्हें ट्रांसपोर्टर बहुत उदारता के साथ पुरस्कृत करते हैं और अच्छा बोनस देते हैं। इसी प्रकार कैब चलाने वाले रोज कमाने और खाने वाले होते हैं। वे भी रोज अधिक से अधिक सवारियां ढोने की कोशिश करते हैं। कैब एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म के बढ़ने के साथ यह रुझान भी काफी बढ़ा है।

एक प्रश्न यह भी है कि आखिर क्यों भारत के लोग हिट ऐंड रन जैसे दुर्घटना के मामलों में प्रशासन को सूचना देने का अपना नागरिक दायित्व निभाने में पीछे रहते हैं या ऐसा नहीं करना चाहते। इसकी एक वजह जनता के साथ पुलिस के व्यवहार से जुड़ी हुई भी है। वर्ष 2018 का एक अध्ययन बताता है कि 25 फीसदी से भी कम भारतीय पुलिस पर भरोसा करते हैं।

वे डरते हैं कि वे कहीं लंबी मुकदमेबाजी में न फंसना पड़ जाए और एक डर इस बात का भी रहता है कि कानूनी मदद कहीं उनकी जेब पर भारी न पड़ जाए। मगर नए कानून को इस तरह तैयार किया गया है कि यह लोगों को ऐसा करने से रोकने का काम करे। ऐसे में यह दुर्घटनाओं के मामलों की सूचना देने की कम दर को भी बढ़ाने में मददगार साबित हो सकता है।

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ऐसे मामलों में सजा की कम दर भी एक वास्तविक समस्या को रेखांकित करती है। हिट ऐंड रन मामलों के जिम्मेदार अधिकतर लोग अक्सर सजा से बच निकलते हैं। एनसीआरबी के आंकड़े दिखाते हैं कि केवल 49 फीसदी मामलों में ही दोषियों को सजा होती है। इस मसले को कोई भी कानून हल नहीं कर सकता है चाहे वह कितना भी कठोर क्यों न हो।

यह दिक्कत तभी दूर हो सकती है जब राज्यों के पुलिस बलों का विस्तार किया जाए और उन्हें प्रशिक्षण दिया जाए तथा कम से कम उनको निगरानी कैमरों जैसी समुचित बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जाएं। उदाहरण के लिए दिल्ली में करीब 80,000 पुलिसकर्मी हैं लेकिन उनमें से केवल 6,000 ही यातायात पुलिस में तैनात हैं।

ऐसे में बीएनएस की धारा 106 को नीयत के स्तर पर तो ठीक कहा जा सकता है लेकिन जब तक कानून प्रवर्तन प्रणाली की बुनियाद मजबूत नहीं होगी तब तक यह प्रभावी साबित नहीं होगी।

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First Published - January 5, 2024 | 9:51 PM IST

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