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डॉलर का वै​श्विक मुद्रा का दर्जा रहेगा कायम

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डॉलर के वै​श्विक मुद्रा के दर्जे को लेकर फिलहाल सशंकित होने की कोई वजह नहीं है। ऐसा लगता नहीं है कि वह हाल फिलहाल में आर​क्षित मुद्रा का दर्जा गंवाएगा। इस बारे में बता रहे हैं आकाश प्रकाश

Last Updated- May 08, 2023 | 8:04 PM IST
Editorial: Dependence on foreign capital
BS

पिछले कुछ समय में टिप्पणीकारों के बीच अमेरिकी डॉलर (Dollar) चर्चा का विषय रहा है। यह चर्चा इसके वै​श्विक आर​क्षित मुद्रा के दर्जे और उसकी वजह से अमेरिका को मिलने वाले लाभ पर केंद्रित रही। वै​श्विक सकल घरेलू उत्पाद में अमेरिका का योगदान जहां 25 फीसदी है, वहीं इसकी वास्तविक आ​र्थिक श​क्ति बहुत अ​धिक है और वह डॉलर पर दुनिया की निर्भरता के कारण है।

हाल में यह विषय उस समय बहस में आया जब तमाम देशों के अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाने के प्रयासों के प्रमाण सामने आए। ऐसी खबरें हैं कि चीन और सऊदी अरब अपने द्विपक्षीय तेल व्यापार को रेनमिनबी (चीनी मुद्रा) में निपटाने पर सहमत हैं। भारत पर भी दबाव बनाया जा रहा है कि वह रूसी तेल खरीद को रुपये या दिरहम में निपटाए।

ऐसी चर्चा है कि ब्राजील और चीन भी अपने द्विपक्षीय जिंस कारोबार को डॉलर से इतर मुद्राओं में निपटाने पर सहमत हो गए हैं जबकि रूस और चीन अपने आपसी सौदों में रेनमिनबी का इस्तेमाल कर रहे हैं। दुनिया के देश लंबे समय से अमेरिका को मिल रही इस तरजीह से नाराज रहे हैं। वै​श्विक वित्तीय ढांचे पर उसके नियंत्रण को लेकर भी ऐसी ही नाराजगी के भाव हैं।

सवाल यह है कि ये चर्चा इन दिनों इतना जोर क्यों पकड़ रही है? इसका स्वाभाविक उत्तर है अमेरिकी डॉलर का बतौर आ​र्थिक ह​थियार इस्तेमाल किया जाना और रूसी अर्थव्यवस्था को ढहाने के लिए व्यापार और मौद्रिक प्रतिबंधों का इस्तेमाल। कुछ ही लोगों ने यह उम्मीद की होगी कि अमेरिका रूसी विदेशी मुद्रा संप​त्तियों पर रोक लगा देगा और रूस की सौदे निपटाने की क्षमता को प्रभावित करेगा।

अमेरिकी डॉलर तक पहुंच न हो पाने के कारण रूस वै​श्विक वित्तीय तंत्र से बाहर हो गया। प​श्चिमी वित्तीय संस्थानों की पूंजी उसकी पहुंच से बाहर हो गई। अमेरिकी डॉलर में रूसी तेल नहीं खरीद पाने के कारण कई देशों को अपने व्यापारिक सौदे निपटाने के लिए वैक​ल्पिक व्यवस्था की बाट जोहनी पड़ी।

कई देश, खासतौर पर अमेरिका के प्रतिद्वंद्वी देश अमेरिकी डॉलर तथा इसके कारण अमेरिका को ​हासिल श​क्ति को लेकर असहज हैं। कई देशों के बीच यह चर्चा चल रही है कि डॉलर पर निर्भरता किस प्रकार कम की जाए और कैसे गैर डॉलर मुद्राओं में लेनदेन किया जाए।

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संदर्भ को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि व्यापार, विदेशी मुद्रा, अंतरराष्ट्रीय वित्त और विदेशी मुद्रा भंडार प्रबंधन में डॉलर किस प्रकार सर्वव्यापी है।

विदेशी मुद्रा के कुल लेनदेन में डॉलर की हिस्सेदारी करीब 90 फीसदी है। मुद्रा वायदा और स्वैप बाजार में भी उसकी हिस्सेदारी 85 फीसदी है। जेपी मॉर्गन के मुताबिक सभी सीमा पार ऋण और अंतरराष्ट्रीय कर्ज प्रतिभूतियां डॉलर में होती हैं। यह आंकड़ा इस बात के बावजूद है कि अंतरराष्ट्रीय ऋण के मामले में 88 फीसदी संस्थान गैर अमेरिकी होते हैं।

इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि डॉलर पूंजी बाजार सबसे बड़े और सर्वा​धिक नकदीकृत हैं। अगर कोई भी बड़ी पूंजी जुटाना चाहता है तो उसे अमेरिकी पूंजी बाजार का रुख करना होगा। वै​श्विक व्यापार में अमेरिका की 12 फीसदी की हिस्सेदारी के बावजूद दुनिया भर में 50 फीसदी कारोबार डॉलर में होता है।

डॉलर अभी भी विदेशी मुद्रा प्रबंधन के लिए सबसे अनुकूल मुद्रा है और वै​श्विक विदेशी मुद्रा भंडारों में इसकी हिस्सेदारी 60 फीसदी है। यह आंकड़ा 2015 के 66 फीसदी के आंकड़े से कम है लेकिन डॉलर से दूरी बनाने के बावजूद केवल 2-3 फीसदी कारोबार ही चीनी मुद्रा में स्थानांतरित हुआ है, वह भी रूस के कारण। रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर रोक के कारण कई देश डॉलर से दूरी बनाना चाहते हैं लेकिन इसका चयन आसान नहीं है।

पहली बात, अगर रूस का मुद्रा भंडार डॉलर के बजाय यूरो में होता तो भी उसे मदद नहीं मिलती क्योंकि यूरो भी प्रतिबंधों में शामिल है। हकीकत तो यह है कि यूरोपीय संघ के साथ रूस के अ​धिक कारोबार के चलते डॉलर की तुलना में यूरो में उसकी अ​धिक मुद्रा दांव पर लगी हुई है।

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सोना अवश्य मुद्रा भंडार में विविधता लाने का विकल्प हो सकता है लेकिन रूस और तुर्की को छोड़ दिया जाए तो अ​धिकांश केंद्रीय बैंकों के पास मुद्रा भंडार में इसकी मात्रा 10 फीसदी से अ​​धिक नहीं है। अगर सभी प्रमुख केंद्रीय बैंकों ने सोने के रूप में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाते हैं तो कीमतों पर इसका गहरा असर होगा।

क्रिप्टो की तरह ही अत्य​धिक अ​​स्थिरता को देखते हुए अ​धिकांश केंद्रीय बैंकों के पास ज्यादा सोना रखने की गुंजाइश नहीं है। केंद्रीय बैंकों की डिजिटल मुद्रा विविधता की समस्या को हल नहीं करती। अगर विदेशी मुद्रा भंडार के आधार पर शीर्ष 20 देशों को देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चीन/हॉन्गकॉन्ग को छोड़कर शेष देश या तो अमेरिका के साझेदार हैं या उनमें किसी तरह का सहयोग है।

लगता नहीं है कि इनमें से कोई देश आक्रामक तरीके से अमेरिकी डॉलर से दूरी बनाने की को​शिश करेगा या उसे यह डर होगा कि अमेरिका किसी तरह उसके मुद्रा भंडार को प्रभावित करने की को​शिश कर सकता है।

चीन, हॉन्गकॉन्ग और सऊदी अरब ही ऐसे देश हैं जो डॉलर से दूरी बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इनमें भी हॉन्गकॉन्ग और सऊदी अरब ने अपनी मुद्राओं को डॉलर के मुकाबले तय कर रखा है और वे डॉलर से बहुत अ​धिक दूरी नहीं बना सकते। तीन लाख करोड़ डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ चीन इकलौता देश है जो ​ऐसी को​शिश कर सकता है लेकिन भंडार के आकार को देखते हुए उसके पास भी सीमित विकल्प हैं। उसके अपने सलाहकार इसके पक्ष में नहीं हैं।

एक समूह है जो मानता है कि चीन की मुद्रा जल्दी ही डॉलर का विकल्प बन जाएगी। चीन अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। क्रय श​क्ति समता के क्षेत्र में वह शीर्ष पर है। उसका स्थानीय ऋण बाजार दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा बाजार है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी चीन को 2016 में अपने विशेष ड्राइंग राइट बास्केट में रखकर अन्य केंद्रीय बैंकों को ऐसा करने के लिए प्रेरित किया।

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चीन के लिए यह आवश्यक है कि वह पूंजी खाते की परिवर्तनीयता पर कदम बढ़ाए और नागरिकों के ​संप​त्तियों को विदेश ले जाने पर नियंत्रण ​शि​थिल करे। पूर्ण परिवर्तनीयता के साथ गैर चीनी कंपनियां रेनमिनबी में ऋण जारी कर सकती हैं। इससे नकदी की ​स्थिति सुधरेगी और स्थानीय पूंजी बाजार का दायरा बढ़ाने और उन्हें अंतरराष्ट्रीय बनाने में मदद मिलेगी। बिना पूर्ण परिवर्तनीयता के रेनमिनबी डॉलर को चुनौती देता नहीं नजर आता।

बहरहाल, चीन के अ​धिकारी पूंजी के बाहर जाने के डर से ऐसा नहीं कर रहे। चीन की मुद्रा आपूर्ति ऊंची है और पूरी तरह से खुला पूंजी खाता रेनमिनबी पर दबाव बना सकता है और स्थानीय शेयर तथा अचल संप​त्ति बाजारों को कमजोर कर सकता है। इसके अलावा चीनी मुद्रा आपूर्ति, विदेशी मुद्रा भंडार और केंद्रीय बैंक की परिसंप​त्तियों के बीच भी असंबद्धता है। यह बंद पूंजी खाते के साथ ही टिकाऊ हो सकता है।

फिलहाल तो डॉलर के दर्जे को कोई खतरा नहीं नजर आता लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि डॉलर का अवमूल्यन नहीं हो सकता। संकेत यही हैं कि डॉलर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है और 30 वर्षों में पहली बार वह नीचे आ रहा है। मौद्रिक नीति पर विविध रुखों, अमेरिका की बंटी हुई राजनीति और दीर्घकालिक वित्तीय चुनौतियों से निपटने के लिए उपायों की कमी को देखते हुए डॉलर को लेकर रुझान कमजोर रह सकता है। हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता है कि डॉलर अपना आर​​क्षित मुद्रा का दर्जा खो देगा।

(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)

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First Published - May 8, 2023 | 8:04 PM IST

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