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क्षमता में सुधार

Last Updated- December 11, 2022 | 3:48 PM IST

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने रेलवे की भूमि नीति की समीक्षा का निर्णय लिया है जो स्वागतयोग्य है। आ​र्थिक परिणामों को बेहतर बनाने का एक तरीका यह भी है कि उपलब्ध संसाधनों का अ​धिक किफायती ढंग से इस्तेमाल किया जाए। लंबे समय से यह दलील दी जा रही है कि भारतीय रेल के पास देश भर में काफी जमीन है जिसका मुद्रीकरण करके न केवल उसके लिए राजस्व जुटाया जा सकता है ब​ल्कि समग्र आ​र्थिक गतिवि​धियों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है। सरकार का निर्णय इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने का है। उदाहरण के लिए मालवहन संबंधी गतिवि​धियों के लिए 35 वर्षों के ​लिए जमीन का मालिकाना हक बाजार मूल्य के 1.5 फीसदी सालाना के हिसाब से दिया जाएगा। फिलहाल ऐसी गतिवि​धियों के वास्ते केवल पांच वर्ष के लिए जमीन दी जाती है और इसके लिए अ​धिक ऊंची दर पर शुल्क वसूल किया जाता है। सरकार को उम्मीद है कि इस नीति की मदद से अगले पांच वर्षों में 300 पीएम गति-श​क्ति कार्गो टर्मिनल बनाए जा सकेंगे और इससे रोजगार के लगभग 120,000 अवसर सृजित होंगे।

सैद्धांतिक तौर पर देखा जाए तो इस संशो​धित नीति के कई लाभ होंगे। रेलवे की जमीन को अगर लंबे समय के पट्टे पर दिया जाए तो इससे कार्गो टर्मिनल बनाने की इच्छा रखने वाली कंपनियों को मदद मिलेगी। लागत कम होने से अ​धिक से अ​धिक संख्या में कंपनियों को ऐसे टर्मिनल बनाने का प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रेलवे इस उद्देश्य के लिए कितनी जमीन उपलब्ध कराएगा और उसे इससे कितना राजस्व हासिल होने की उम्मीद है। ऐसे में और अ​धिक तादाद में कार्गो टर्मिनल का निर्माण और उनका किफायती प्रबंधन उसके मालढुलाई राजस्व में बढ़ोतरी लाने में मदद करेगा। बीते दशकों में भारतीय रेल ने अपना मालढुलाई कारोबार सड़क परिवहन के हाथों गंवा दिया है। कार्गो के किफायती प्रबंधन की मदद से वह अपना खोया हुआ कारोबार कुछ हद तक वापस हासिल कर सकता है। रेलवे के माध्यम से मालढुलाई पर्यावरण की दृ​ष्टि से भी बेहतर होती है।

इसके अलावा बेहतर दृश्यता और कम लागत के कारण सरकार को कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकॉर) की नीतिगत बिक्री में भी मदद मिल सकती है। सरकार ने नवंबर 2019 में कॉनकॉर के निजीकरण को मंजूरी दी थी लेकिन यह काम पूरा नहीं हो सका। कॉनकॉर जिन 61 कंटेनर डिपो का संचालन करता है उनमें से 26 रेलवे की जमीन पर बने हैं। चूंकि सरकार ने मौजूदा परिचालकों को कुछ शर्तो के साथ नए संदर्भों पर स्थानांतरित होने की इजाजत दे दी है इसलिए कॉनकॉर को काफी अ​धिक लाभ होगा। फिलहाल वह बाजार मूल्य का 6 फीसदी भुगतान कर रहा है और चालू वित्त वर्ष में करीब 300 से 400 करोड़ रुपये के आवंटन की उम्मीद है। अब जबकि यह क्षेत्र अ​धिक चर्चा में रहेगा तो कंपनी का आकर्षण बढ़ जाएगा और नए मालिक भी परिचालन का विस्तार करने की दृ​ष्टि से बेहतर ​स्थिति में होंगे। 

कार्गों कारोबार के अलावा सरकार ने रेलवे की जमीन पर कई अन्य गतिवि​धियों के लिए भी मानक ​​शि​थिल किए हैं। प्रतिवर्ष 1.5 फीसदी बाजार मूल्य पर इसका इस्तेमाल बिजली, जल आपूर्ति, गैस और शहरी परिवहन से जुड़े कामों के ​लिए किया जा सकता है। यह नीति सामाजिक बुनियादी ढांचे के विकास की दृ​ष्टि से भी खुली हुई है। उदाहरण के लिए निजी-सार्वजनिक भागीदारी में अस्पताल का निर्माण और केंद्रीय विद्यालय संगठन के स्कूल आदि। इसके अलावा रेलवे की जमीन का इस्तेमाल नाम मात्र की लागत पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के लिए भी किया जा सकता है। सरकार का लक्ष्य एक व्यापक नीतिगत दस्तावेज तैयार करने और प्रस्तावों को 90 दिन के भीतर क्रिया​न्वित करने का है। इस संदर्भ में सरकार को यह सुनि​श्चित करना होगा कि नीति का क्रियान्वयन पारदर्शी तरीके से हो। जमीन के मूल्यांकन से सावधानीपूर्वक निपटना होगा क्योंकि इस नीति को एक साथ कई स्थानों पर सरकारी और निजी संस्थाओं से निपटना होगा और वह भी बहुत बड़ी संख्या में। यदि नीति का सफल क्रियान्वयन हुआ तो न केवल रेलवे के लिए संभावनाएं सुधरेंगी ब​ल्कि किफायत भी बढ़ेगी और देश में समग्र गति​वि​धियों में भी सुधार होगा। 

First Published - September 8, 2022 | 9:29 PM IST

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