मौजूदा दौर में बड़ी भारतीय कंपनियों के सामने आंतरिक शक्ति और बाहरी कठिनाइयों के मिश्रण का परिदृश्य है। आपूर्ति शृंखला की गड़बड़ी की एक नयी शृंखला हमारे सामने है। वृहद आर्थिक अस्थिरता की काली छाया वापस लौट आई है और मुद्रास्फीति में भी इजाफा हुआ है। इस बीच मुद्रास्फीति को लेकर विकसित देशों का रुझान वैश्विक वित्तीय बाजारों को और परेशानी में डाल सकता है। देश के आम परिवारों की बात करें तो में कुछ ठोस आर्थिक समस्याएं हैं जो मांग को प्रभावित करती हैं। बड़ी कंपनियों ने राजस्व वृद्धि और मुनाफे में सुधार किया है, निर्यात में भी वृद्धि हासिल हुई है लेकिन सफल कंपनियों के आशावाद को कठिन परिदृश्य की भावना ने प्रभावित किया है। मजबूत आंतरिक एमआईएस की स्थिति में निजी निवेश में हालिया इजाफा सतर्क रणनीति सोच के बारे में ही दर्शाता है।
आपूर्ति शृंखला की दिक्कत: बीते दशकों के दौरान समय पर आपूर्ति करने वाली प्रणालियां बनायी गईं, इसमें आधुनिक आईटी का उपयोग किया गया। कोविड-19 ने इन्हें बाधित किया। यह आशा भी ध्वस्त हो गई कि यह उथलपुथल 2020 तक सीमित रहेगी। ऐसा इसलिए हुआ कि चीन ने दोबारा लॉकडाउन लगा दिया और रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया। समय बीतने के साथ भारत में होने वाले उत्पादन का अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ, अब वह वैश्विक मूल्य शृंखला में कहीं बेहतर संबद्ध है। चीन भारत के आयात का सबसे बड़ा स्रोत है। महामारी के पहले भारत के आयात का 14 फीसदी वहीं से आता था। वहीं 5 फीसदी निर्यात के साथ वह भारत का दूसरा सबसे बड़ा निर्यात साझेदार था। ऐसे में चीन में लॉकडाउन भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डालता है।
वैश्विक कंपनियां एक राष्ट्रवादी सत्ता के कारण हुए नुकसान को देख रही हैं और यह सोच रही हैं कि ऐसे अन्य देश क्या कर सकते हैं। ऐसे रणनीतिक विचार के कारण ही आपूर्ति शृंखला में मजबूती की मांग उठी। इसका नतीजा और अधिक विविधता और इन्वेंटरी की मांग के रूप में सामने आया। वैश्विक कंपनियों की ओर से अधिक विविधता भारत में हमारे लिए भी कारगर रही क्योंकि भारत को बढ़ी हुई गतिविधियों का लाभ मिला। दुनिया भर में इन्वेंटरी बढ़ाने की आकांक्षा अस्थायी रूप से मांग को बढ़ावा दे रही है। इसका आरओई पर भी बुरा असर पड़ता है।
वृहद आर्थिक अस्थिरता की समस्या: कई दशकों तक कम और स्थिर मुद्रास्फीति ने व्यक्तियों और कंपनियों के वित्तीय नियोजन के लिए एक स्थिर माहौल बनाया। अब हम दोबारा बढ़ी हुई मुद्रास्फीति से जूझ रहे हैं। भारत संबंधी ताजा आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2022 में शीर्ष मुद्रास्फीति 7 फीसदी रही। यह 2 से 6 फीसदी के आरबीआई के लिए विधिक अधिदेश से अधिक थी। अप्रैल और मई में स्थितियां और बिगड़ सकती हैं। विश्व स्तर पर देखें तो मुद्रास्फीति में काफी विचलन है। उच्च मुद्रास्फीति का वातावरण अधिक जोखिमभरा है।
विकसित देशों के केंद्रीय बैंक भी इस समस्या से जूझ रहे हैं और वहां दरों में इजाफा होने की संभावना है। एक स्पष्ट बात यह भी है कि स्थिर और अनुमान लगाने लायक दो फीसदी मुद्रास्फीति एक गलती थी। वर्तमान बहस इस बात को लेकर हो रही है कि दरों में इजाफे की तीव्रता और उसकी गति क्या होगी। यह मौद्रिक कड़ाई वैश्विक स्तर पर परिसंपत्ति आवंटन को नए सिरे से व्यवस्थित करने की वजह बनेगी। जो पूंजी प्रतिफल की तलाश में वैश्विक वित्त के अंधेरे कोनों में चली गई है वह वहां से वापस आएगी। इसका उभरते बाजारों पर बुरा असर होगा। खासतौर पर नकदीकृत और जोखिम वाली परिसंपत्तियों पर। भारत में हमने देखा कि 2007-2008 और 2012-2013 में हालात बिगडऩे पर पूंजी देश से बाहर गई।
भारतीय परिवारों की समस्याएं: भारत में आय, रोजगार और उपभोक्ताओं का आत्मविश्वास आदि कठिन दौर से गुजर रहे हैं। अप्रैल 2020 के लॉकडाउन से तुलना की जाए तो उपभोक्ता रुझान काफी सुधरा है लेकिन अधिकांश परिवारों का आर्थिक जीवन अभी भी मुश्किलों से भरा हुआ है। इसका असर परिवारों की मांग पर पड़ता है।
कंपनियों की हालत बेहतर: जब हम गैर वित्तीय कंपनियों के राजस्व तथा मुनाफे पर नजर डालते हैं तो हाल के समय में उन्होंने ऐसा मुनाफा कमाया जो वे 2010 से हासिल नहीं कर सकी थीं। उदाहरण के लिए 2010 की दूसरी तिमाही से 2021 की दूसरी तिमाही तक सूचीबद्ध गैर वित्तीय कंपनियों की वास्तविक बिक्री में ठहराव था लेकिन बीती दो तिमाहियों में हमने 20 फीसदी की वृद्धि दर्ज की। आपूर्ति शृंखला, वृहद आर्थिक अस्थिरता और आम परिवारों की कमजोर आय एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
समस्या का हल दो अलग-अलग पहलुओं के संयोजन में निहित है। कई प्रबंधक इस बात को लेकर उत्साहित रहते हैं कि आंतरिक एमआईएस क्या दर्शा रहा है, मसलन मजबूत मांग, मूल्य शक्ति, राजस्व में वृद्धि और मुनाफे में वृद्धि। यह प्रदर्शन तथा क्रियान्वयन को लेकर दृष्टिकोण यह बताएगा कि निवेश के लिए नए अवसर कैसे हैं। इसके साथ ही एक रणनीतिक नजरिया ऐसा भी है जो बाहरी परिदृश्य को समझता है तथा और अधिक सतर्कता बरतने की मांग करता है। बाहरी परिदृश्य अलग-अलग कंपनियों पर किस प्रकार का असर डालता है यह भी अलग-अलग होगा। प्रत्येक बोर्ड इन सवालों पर रणनीतिक चर्चा में उलझा हुआ है।
आंतरिक और बाहरी दृष्टि को लेकर यह तनाव उस समय एकजुट हुआ जब लंबे समय के बाद निजी निवेश में सुधार के पहले संकेत नजर आए। 2011 के बाद से सीएमआईई कैपेक्स के डेटाबेस में निजी परियोजनाओं की हिस्सेदारी साल दर साल आधार पर हर तिमाही में कम होती गई। दो हालिया तिमाहियों की बात करें तो अक्टूबर-दिसंबर 2021 और जनवरी-मार्च 2022 तिमाहियों में हमें साल दर साल आधार पर पहली बार सकारात्मक वृद्धि देखने को मिली।
निजी निवेश में इजाफा अर्थव्यवस्था के लिए टॉनिक का काम करता है। परियोजनाएं संचालित होती हैं और परियोजना व्यय के कारण अर्थव्यवस्था में मांग मजबूत होती है। एक बार परियोजनाओं के आरंभ हो जाने पर रोजगार तथा अनुबंध आकार लेते हैं। एक गिरते निवेश वाले माहौल से बढ़ते निवेश वाले माहौल में बदलाव अच्छी बात है और इससे आर्थिक प्रदर्शन में बेहतरी आएगी।
इस समय भारत की तस्वीर मजबूत है। निजी कंपनियां उत्पादन, मुनाफा तथा निवेश के मामले में बीते कुछ समय का सबसे अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। यह परिस्थिति दुनिया के अन्य हिस्सों में व्याप्त कठिनाइयों से अलग है। खासतौर पर यह चीन और यूरोप से काफी अलग है जहां क्रमश: स्वास्थ्य नीति और एक युद्ध ने अर्थव्यवस्थाओं के कदम थाम रखे हैं।