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देश में एक अलग तरह की बैंक धोखाधड़ी

Last Updated- December 11, 2022 | 9:00 PM IST

भारत में बैंकों के साथ फर्जीवाड़ा कोई नई बात नहीं है। देश में कई ऐसे लोग हैं जिन पर बैंकों को चूना लगाने के आरोप लगे हैं। इनमें एबीबीजी शिपयार्ड लिमिटेड के संस्थापक एवं पूर्व चेयरमैन ऋषि अग्रवाल का नाम अग्रिम पंक्ति में शामिल किया जा सकता है। उनके इस कथित फर्जीवाड़े में वे सभी बातें शामिल हैं जो अमूमन ऐसे मामलों में देखी जाती है। मगर इस फर्जीवाड़े को अंजाम देने का तरीका काफी अलग रहा है।
वर्ष 2012 से एबीजी शिपयार्ड ने कथित तौर पर 28 बैंकों और वित्तीय संस्थानों के साथ 22,842 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी की है। इनमें आईसीआईसीआई बैंक के सर्वाधिक 7,089 करोड़ रुपये दांव पर लगे हैं। इसके बाद आईडीबीआई बैंक (3,639 करोड़) और भारतीय स्टेट बैंक (2,995 करोड़ रुपये) के ऋण अटक गए हैं।
कंपनी को आवंटित पूरी रकम बैंकों के बहीखातों में नवंबर 2013 में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बन गईं। वर्ष 2016 में निगमित ऋण पुनर्गठन का प्रयास हुआ था लेकिन इसके विफल रहने के बाद इन परिसंपत्तियों को 2013 से प्रभावी तौर पर एनपीए मान लिया गया। 2018 में ईऐंडवाई द्वारा की गई फोरेंसिक ऑडिट में असली कहानी सामने आई। अगस्त 2020 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को मामला सौंपने से पहले कर्जदाताओं ने भारतीय शिपयार्ड के खाते को फर्जीवाड़ा घोषित कर दिया। गहराई से जांच करने के बाद सीबीआई ने फरवरी 2021 में एबीजी शिपयार्ड और इसकी होल्डिंग (नियंत्रक) कंपनी एबीजी इंटरनैशनल प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।
फर्जीवाड़े का आकार और आवंटित ऋण को एनपीए घोषित करने से लेकर सीबीआई के हाथों में मामला जाने तक लगे समय की वजह से राजनीतिक भूचाल भी आया। अब कंपनी की बिक्री की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इस बीच सभी बैंकों ने कंपनी को आवंटित ऋणों के लिए प्रावधान भी कर दिए हैं। एबीजी शिपयार्ड की स्थापना 1985 में मागडल्ला शिपयार्ड प्राइवेट लिमिटेड के रूप में हुई थी। मई 1995 में यह एबीजी शिपयार्ड प्रा. लि. बन गई और जून में यह एबीजी शिपयार्ड लि. में तब्दील हो गई। अग्रवाल ने जहाज मरम्मत के बाद जहाज निर्माण कारोबार में भी कदम रख दिया। वह जहाज नियंत्रण, जहाज प्रबंधन कारोबार में भी उतर गए। जहाज मरम्मत कारोबार मजबूत करने के लिए उन्होंने वेस्टर्न इंडिया शिपयार्ड भी आईसीसीआईसीआई बैंक से करीब 40 प्रतिशत हिस्सेदारी लेकर खरीद ली। यहां तक तो सब ठीक था मगर वह सीमेंट निर्माण कारोबार में क्यों उतरे? प्रवर्तक की निवेश कंपनी एबीजी इंटरनैशनल प्रा. लि. ने 3.3 टन सालाना क्लिंकर उत्पादन क्षमता वाले संयंत्र की स्थापना के लिए एबीजी सीमेंट लिमिटेड की बुनियाद रखी। सूरत में 5.8 टन क्षमता वाली ग्राइंडिंग इकाई की भी स्थापना की गई और जहाज खड़ा करने के लिए वहीं एक जेटी (घाट) भी तैयार की गई।
कच्छ में निजी इस्तेमाल के लिए चूना पत्थर और निकटतम बंदरगाह मुंद्रा के रास्ते समुद्री मार्ग से 140 किलोमीटर दूर भुज रेलवे स्टेशन से परिवहन की सुविधा सटीक थी और सूरत के निकट मोरा ग्राइंडिंग यूनिट से बिना किसी कठिनाई के कच्चे माल का परिवहन किया जा सकता था। क्लिंकर का परिवहन विशेष रूप से समुद्री मार्ग के माध्यम से करने पर जोर दिया गया था। ग्राइंडिंग यूनिट तक सामग्री पहुंचने के लए जेटी का निर्माण किया गया था। क्या यह परियोजना लंबे परिवार समूह को मदद देने के लिए तैयार की गई थी जो ड्राई बल्क शिप का परिचालन कर रहा था?
एबीजी समूह ने सीमेंट संयंत्र की स्थापना को ‘सॉफ्ट लॉन्च’ का नाम दिया। विनिर्माण क्षेत्र में अब तक ऐसा कोई शब्द नहीं सुना गया था मगर बैंकों को इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ा और उन्होंने समय और लागत में बढ़ोतरी की परवाह नहीं की। सहायक कंपनी एबीजी शिपयार्ड एनर्जी गुजरात लिमिटेड ने कच्छ और सूरत दोनों जगहों में सीमेंट संयंत्र के परिसरों में 100 मेगावॉट क्षमता वाले बिजली संयंत्र की स्थापना का प्रस्ताव दिया। सीमेंट विनिर्माण में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए यह प्रस्ताव दिया गया था। निजी इस्तेमाल के लिए बिजली संयंत्रों को मिलने वाली सब्सिडी लेने की मंशा से ऐसा किया गया था और इस बात का पूरा ख्याल रखा गया था कि सीमेंट संयंत्र से इतर लाभ उठाया जाए। ज्यादातर सहायक इकाइयां रकम जुटाने और गैर-रकम आधारित संयंत्रों जैसे सभी प्रकार के कर्जदाताओं से गारंटी पाने के लिए स्थापित की गई थीं।
नवोन्मेष और आक्रामकता अग्रवाल की खून में थे। परिवार की पृष्ठभूमि का लाभ उठाकर उन्होंने बैंकों के साथ अच्छे संबंध बना लिए। आईसीआईसीआई बैंक के लिए अग्रवाल वेस्टर्न इंडिया शिपयार्ड के अधिग्रहण के दौरान अहम भूमिका में नजर आए। बैंक ने कर्ज का एक हिस्सा शेयर में बदल लिया और ऋण भुगतान की अवधि बढ़ाकर कुछ दूसरी रियायतें भी दे दीं। आईएफसीआई ने शेयर में भाग लिया और नई सीमेंट परियोजना के लिए कर्ज की पेशकश की।
अग्रवाल ने महज 2 प्रतिशत पूंजी के साथ 2009 में ग्रेट ऑफशोर के लिए साहसिक बोली लगाई। इससे भारती शिपयार्ड के साथ उसका कानूनी विवाद खडा़ हो गया। यह तब हुआ जब ग्रेट ऑफशोर के प्रवर्तक इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेस को ऋण का भुगतान नहीं कर पाए। अगर अग्रवाल गे्रट ऑफशेयर का अधिग्रहण करने में सफल रहे होते तो एबीजी शिपयार्ड भारतीय शिपयार्ड की परोक्ष मालिक बन गई होती और कंपनी भारत में निजी क्षेत्र की एक मात्र जहाज निर्माता कंपनी बन गई होती। अग्रवाल ने भारतीय स्टेट बैंक से महज 1 लाख रुपये ऋण लेकर 8 लाख रुपये में मगडल्ला शिपयार्ड खरीदने की दिशा में कदम बढ़ाया था। अग्रवाल पुरानी एवं अब विरासत समझी जाने वाली कारों के शौकीन रहे हैं। उन्होंने पढ़ाई अमेरिका की पड्र्यूू यूनिवर्सिटी से पूरी की। बड़ा सवाल यह है कि क्या वह भी नीरव मोदी की तरह बैंकों का ऋण लेकर भगोड़े लोगों की फेहरिस्त में अपना नाम दर्ज कराएंगे।
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं।) 

First Published - February 28, 2022 | 11:54 PM IST

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