प्रॉपर्टी खरीदना जितना उत्साह से भरा होता है, साथ कई जोखिम भी लेकर आता है। एक छोटी-सी कागजी गलती आपकी करोड़ों की संपत्ति पर सवाल खड़ा कर सकती है। जब भी कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार की प्रॉपर्टी खरीदता है तो उसे दो प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है, रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन। दोनों का नाम लगभग जुड़ा हुआ लगता है, इसलिए लोग अक्सर दोनों को एक जैसा मान लेते हैं, जबकि दोनों का काम बिल्कुल अलग है। कई लोग सोच लेते हैं कि म्यूटेशन हो गया मतलब अब वे मालिक बन गए, लेकिन कानून ऐसा नहीं कहता। हाल की रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में साफ कहा गया है कि रजिस्ट्रेशन ही असली कानूनी सबूत है, जबकि म्यूटेशन सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करता है ताकि टैक्स और रेवेन्यू रिकॉर्ड ठीक चल सकें।
2025 में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने इसको लेकर अपने नियम बदले हैं ताकि फर्जी बिक्री, गलत बिक्री और धोखाधड़ी पर रोक लगे। इसलिए यह समझना जरूरी है कि कौन-सी प्रक्रिया आपको कानूनी सुरक्षा देती है और कौन-सी केवल सिस्टम में आपका नाम दर्ज करती है, क्योंकि जरा-सी लापरवाही आपको कोर्ट केस और टैक्स विवाद में फंसा सकती है।
जब आप कोई भी प्रॉपर्टी लेते हैं, चाहे वह घर हो, प्लॉट या फिर विरासत में मिली हो, तो सबसे पहला काम रजिस्ट्रेशन कराना होता है। रजिस्ट्रेशन वो प्रक्रिया है जिसमें प्रॉपर्टी ट्रांसफर की पूरी जानकारी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज की जाती है। इसका मतलब यह होता है कि अब प्रॉपर्टी का अधिकार कानूनी तौर पर आपके नाम पर हो गया है। रजिस्ट्रेशन का काम सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में किया जाता है। इसके लिए आपको सेल डीड, गिफ्ट डीड या विल जैसे ओनरशिप डॉक्यूमेंट और अपनी ID जमा करनी होती है।
रजिस्ट्रेशन के दौरान स्टैंप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस लगती है, जो हर राज्य में अलग हो सकती है। कई जगह महिलाओं को इसकी दरों में छूट भी मिल जाती है। इंडियन रजिस्ट्रेशन एक्ट 1908 के सेक्शन 17 के तहत 100 रुपये से ज्यादा वैल्यू वाली प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन जरूरी है। अगर रजिस्ट्रेशन नहीं कराया जाए तो डील अमान्य मानी जाती है और आप उस प्रॉपर्टी पर न तो लोन ले सकते हैं और न ही आसानी से बेच सकते हैं।
यूपी सरकार ने हाल ही में इस प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। अब वहां टाइटल-बेस्ड रजिस्ट्रेशन होगा, यानी डील फाइनल होने से पहले ही यह चेक किया जाएगा कि प्रॉपर्टी का असली मालिक कौन है। पहले सिर्फ कागज देखकर रजिस्ट्रेशन हो जाता था, जिससे कई धोखाधड़ी के मामले सामने आए। अब रेवेन्यू और म्यूनिसिपल रिकॉर्ड से सीधे वेरिफिकेशन होगा, जिससे फर्जीवाड़ा रुकेगा, केस कम होंगे और रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया भी तेज चलेगी।
Also Read: देश के ‘घोस्ट मॉल्स’ से हो सकती है ₹357 करोड़ की कमाई, 8 मेट्रो शहरों में है सबसे बड़ा मौका
रजिस्ट्रेशन होने के बाद भी सरकारी लैंड रेवेन्यू रिकॉर्ड में पुराने मालिक का नाम बना रहता है। इसी रिकॉर्ड को अपडेट करने की प्रक्रिया को म्यूटेशन कहा जाता है। म्यूटेशन में नए मालिक का नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाता है। यह काम स्थानीय नगर निगम या रेवेन्यू ऑफिस में होता है और इसे तभी कराया जा सकता है जब रजिस्ट्रेशन पूरा हो चुका हो।
म्यूटेशन कराने के लिए जरूरी डॉक्यूमेंट जमा करने होते हैं और इसके लिए एक तय फीस देनी पड़ती है, जो हर राज्य में अलग होती है।
म्यूटेशन का सबसे बड़ा उद्देश्य टैक्स कलेक्शन है। इससे सरकार को पता चलता है कि जमीन या प्रॉपर्टी का टैक्स किससे लेना है। इसके अलावा बिजली, पानी, गैस कनेक्शन ट्रांसफर करने और आगे चलकर प्रॉपर्टी बेचने में भी आसानी होती है। लेकिन यह बात समझना जरूरी है कि म्यूटेशन से मालिकाना हक साबित नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में साफ कहा कि म्यूटेशन केवल टैक्स के उद्देश्यों के लिए होता है, इसे मालिकाना हक का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अगर मामला विरासत या वसीयतनामा का हो, तो म्यूटेशन कोर्ट के किसी भी फैसले को बदल नहीं सकता। अगर जमीन पैतृक है और उस पर झगड़ा चल रहा है, तो सिर्फ म्यूटेशन करा लेने से आप मालिक नहीं बन जाते। असली मालिक कौन है, यह तय करने का अधिकार सिर्फ सिविल कोर्ट के पास है।
Also Read: क्राउडफंडिंग से जुटाया पैसा? जान लें इसको लेकर क्या हैं टैक्स नियम, नहीं तो घर आ सकता है IT नोटिस
दोनों प्रक्रिया भले अलग दिखाई दें, लेकिन असल में एक-दूसरे पर ही टिके होते हैं। रजिस्ट्रेशन वह प्रक्रिया है जो आपको प्रॉपर्टी का कानूनी मालिक बनाती है। कोर्ट में भी वही मान्यता पाता है और बैंक भी लोन देते समय इसी डॉक्यूमेंट को देखकर भरोसा करते हैं। दूसरी तरफ, म्यूटेशन सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड अपडेट करने का तरीका है। इससे मालिकाना हक नहीं मिलता, सिर्फ रिकॉर्ड में आपका नाम जुड़ जाता है।
अगर प्रॉपर्टी का रजिस्ट्रेशन ही नहीं हुआ, तो म्यूटेशन कराया ही नहीं जा सकता। वहीं, रजिस्ट्रेशन होने के बाद भी अगर म्यूटेशन नहीं कराया गया तो सरकारी रिकॉर्ड में पुराना मालिक दिखता रहेगा, जिससे टैक्स नोटिस उसी के नाम पर जाएंगे और आगे चलकर परेशानियां बढ़ सकती हैं।
कानूनी नजर से, बिना रजिस्ट्रेशन के प्रॉपर्टी बेचना या किसी को देना मुश्किल हो जाता है। जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ रजिस्ट्रेशन से टाइटल साबित नहीं हो जाता, उसकी पूरी चेन जांचनी जरूरी है। बैंक और दूसरी फाइनेंशियल संस्थाएं भी लोन देने से पहले रजिस्ट्रेशन और म्यूटेशन दोनों की कॉपियां मांगती हैं।
2025 में प्रॉपर्टी से जुड़े कुछ बड़े बदलाव हुए हैं। उत्तरप्रदेश में नया टाइटल सिस्टम शुरू किया गया है, जिससे जमीन और घर से जुड़े फ्रॉड काफी हद तक रुक सकेंगे। अब सब-रजिस्ट्रार ऑफिस में प्रॉपर्टी की मालिकाना चेक हो सकेगी। इसका फायदा यह होगा कि एक ही प्रॉपर्टी को बार-बार बेचने जैसे मामले या किसी प्रॉपर्टी पर छुपे हुए लोन का खतरा काफी कम हो जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल के फैसलों में साफ किया है कि म्यूटेशन सिर्फ टैक्स से जुड़ा काम है। यह यह नहीं बताता कि असली मालिक कौन है। यानी म्यूटेशन होने से टाइटल का प्रमाण नहीं मिलता। इससे विवाद कम होने की उम्मीद है, लेकिन खरीदारों को फिर भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले खुद सारी जांच करना जरूरी है।
हर राज्य में म्यूटेशन के नियम उसके अपने लैंड रेवेन्यू एक्ट के आधार पर चलते हैं। इसलिए जहां भी प्रॉपर्टी खरीदें, वहां के लोकल नियमों की जांच पहले कर लेना समझदारी है।