चालू वित्त वर्ष 2025-26 में सूचीबद्धता पर मिलने वाले लाभ में कमजोरी आई है। सोमवार को शेयर बाजार में आगाज करने वाली आय फाइनैंस और फ्रैक्टल एनालिटिक्स ने निवेशकों को कोई लाभ नहीं दिया। बिजनेस स्टैंडर्ड ने जब प्राइमडेटाबेस डॉट कॉम के आंकड़ों का विश्लेषण किया तो पता चला कि इस वित्त वर्ष में आए 99 आरंभिक सार्वजनिक निर्गमों (आईपीओ) का कम हिस्सा (65 फीसदी) अपनी निर्गम कीमत से ज्यादा पर खुला था।
इश्यू प्राइस वह कीमत है जिस पर शेयर बाजार में लिस्ट होने वाली कंपनी अपने शेयर आम निवेशकों को बेचती है। शुरुआती कीमत वह भाव है, जिस पर लिस्टिंग के दिन शेयरों का कारोबार शुरू होता है। कई निवेशक आईपीओ में शेयर खरीदकर और लिस्टिंग के दिन बेचकर मुनाफा कमाने की कोशिश में रहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में यह रणनीति कुल मिलाकर लाभदायक साबित हुई है। वित्त वर्ष 2020 से लेकर अब तक हर साल अधिकांश आईपीओ लिस्टिंग में बढ़त के साथ खुले हैं। वित्त वर्ष 2025 में 82.1 फीसदी आईपीओ में लिस्टिंग लाभ देखा गया था। इस वर्ष यह घटकर 64.6 फीसदी रह गया है, जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम है। हालांकि, इस वर्ष का आंकड़ा वित्त वर्ष 2019 के 42.9 फीसदी के न्यूनतम स्तर से अधिक है।
सूचीबद्ध कीमत और शुरुआती कीमत के बीच औसत वृद्धि वित्त वर्ष 2026 में घटकर 4.1 फीसदी रह गई है जबकि वित्त वर्ष 2025 में यह 20.6 फीसदी थी। पिछले सात वर्षों में से पांच में दो अंक की वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ आईपीओ के ऊंचे मूल्यांकन की आलोचना के बावजूद, जिनमें शुरुआती निवेशकों जैसे प्राइवेट इक्विटी फंडों के बिक्री प्रस्ताव शामिल थे, ऐसा देखने को मिला है। कहा जाता है कि कई आईपीओ में इन शुरुआती निवेशकों की निकासी की कीमतें इतनी थीं कि लिस्टिंग के समय लाभ के लिए बहुत कम गुंजाइश बची थी।
प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया ने कहा कि निवेशकों को इस बात पर नजर रखनी चाहिए कि पीई फंड और अन्य संस्थान आंशिक हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रहे हैं या पूरी तरह बाहर निकल रहे हैं। हल्दिया के अनुसार साल के दौरान बाजार की सामान्य दिशा भी लाभ को प्रभावित कर रही है। उन्होंने कहा, इस साल काफी ज्यादा उतारचढ़ाव रहा है।
बुटीक इन्वेस्टमेंट बैंक रिपलवेव इक्विटी एडवाइजर्स में पार्टनर मेहुल सावला ने भी कहा, साल भर में बाजार के रुझान का भी थोड़ा बहुत असर इन आंकड़ों पर पड़ता है। सावला ने यह भी कहा कि आईपीओ को आकर्षक मूल्य पर पेश करने के लिए संरचनात्मक प्रोत्साहन हो सकता है, जिससे यह समझा जा सकता है कि कई आईपीओ की शुरुआती कीमतें निर्गम मूल्य से अधिक क्यों होती हैं।
आईपीओ में निवेश रकम का बड़ा हिस्सा संस्थागत निवेशकों के पास होता है और उनकी सौदेबाजी की शक्ति के कारण आईपीओ का मूल्य निर्धारण उनकी अनुपस्थिति की तुलना में ज्यादा आकर्षक होता है। इनमें से कई निवेशक एंकर निवेशक के रूप में आते हैं, जिनका निवेश 30-90 दिनों के लिए होता है। इससे वे निर्धारित अवधि के दौरान कीमतों में होने वाले प्रतिकूल उतार-चढ़ाव के जोखिम के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
संस्थागत निवेशक इस जोखिम को कम करने के लिए अधिक आकर्षक मूल्य निर्धारण की मांग करते हैं। सावला के अनुसार, वैकल्पिक निवेश फंड, बीमा कंपनियों और म्युचुअल फंडों सहित संस्थागत निवेशकों का बड़ा समूह प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकता है, जिससे अंततः इस तरह के मूल्य निर्धारण की प्रवृत्ति में कमी आ सकती है।
शुरुआती बढ़त जरूरी नहीं कि कायम रहे। 16 फरवरी तक के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2026 में सूचीबद्ध कंपनियों के आईपीओ शेयरों को अपने पास रखने वाले निवेशकों का औसत रिटर्न ऋणात्मक या कहें कि 6 फीसदी का घाटा था।