कई कंपनियों द्वारा एक अरब डॉलर से अधिक के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) लाने की तैयारी के साथ इस साल बाजार पिछले दो वर्षों की तरह ही व्यस्त रह सकता है। रॉशचाइल्ड ऐंड कंपनी के प्रबंध निदेशक शुभकांत बाल ने ये बातें कही। मुंबई में समी मोडक और सुंदर सेतुरामन को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि जब तक कोई बड़ा आर्थिक झटका नहीं लगता या प्रतिकूल वैश्विक घटनाक्रम नहीं होता, तब तक बाजार में पूरे साल आईपीओ की अच्छी गतिविधि देखने को मिलेगी। संपादित अंश:
वर्ष 2024 और 2025 आईपीओ के जरिये रकम जुटाने के लिहाज से रिकॉर्ड साल रहे। क्या आपको लगता है कि इस साल भी इक्विटी कैपिटल मार्केट के लिए इतना ही बड़ा साल रहेगा?
अभी आईपीओ की संभावनाएं काफी मजबूत हैं और हमारा मानना है कि इस साल आईपीओ गतिविधि 20 अरब डॉलर के आंकड़े को भी पार कर सकती है, जो 2025 में आईपीओ से जुटाई गई कुल रकम थी। अरबों डॉलर से अधिक के आईपीओ की योजना बना रही कई कंपनियां इस साल सार्वजनिक बाजार में उतरने की तैयारी में हैं।
आईपीओ गतिविधियों में अचानक गिरावट आई है। आपको क्या लगता है कि इनमें सुधार कब तक आएगा?
यहां तक कि 2025 में भी पहले छह महीने धीमी गति से चले और फिर दूसरे छह महीने काफी मजबूत रहे। आप जिस गिरावट की बात कर रहे हैं, वह आय में कुछ नरमी और एआई के प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर कुछ आशंकाओं के कारण हो सकती है। लेकिन चूंकि कई कंपनियां इस साल सार्वजनिक होने की तैयारी में हैं और इनमें से कुछ बड़े आईपीओ हैं, इसलिए जब तक कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक समाचार या कोई आर्थिक अनिश्चितता या प्रतिकूल घटनाक्रम नहीं होता, तब तक हम इस साल आईपीओ गतिविधियों में अच्छी वृद्धि की उम्मीद करते हैं।
क्या भारत के बाजार के अपेक्षाकृत कम प्रदर्शन ने आईपीओ की रफ्तार को प्रभावित किया है?
मुझे ऐसा नहीं लगता। 2025 भारत में आईपीओ के लिए बहुत सक्रिय वर्ष था। आम तौर पर इक्विटी बाज़ार चक्रीय होते हैं और भारत में सार्वजनिक बाजार पिछले कुछ तिमाहियों में सीमित दायरे में रहे हैं, जिसका मुख्य कारण धीमी आय वृद्धि है, न कि कोई संरचनात्मक समस्या या निवेशकों की रुचि की कमी। उम्मीद है कि आने वाले समय में अच्छी आय वृद्धि देखने को मिलेगी, जिसका आंशिक कारण हालिया व्यापार समझौते, अन्य नीतिगत सुधार और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर कटौती से प्रेरित उपभोग में वृद्धि है। घरेलू तरलता मजबूत बनी हुई है और विदेशी निवेशक आईपीओ में भाग लेना जारी रखे हुए हैं, भले ही उन्होंने द्वितीयक बाज़ारों में बिक्री की हो। सार्वजनिक होने की इच्छुक कंपनियों की संख्या मजबूत बनी हुई है। संक्षेप में, हमें आईपीओ गतिविधि में तत्काल संरचनात्मक मंदी के कोई संकेत नहीं दिखते हैं।
भीड़भाड़ वाले आईपीओ बाजार में गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित की जाए?
व्यस्त बाजार में निवेशक स्वाभाविक रूप से अधिक चयनात्मक हो जाते हैं। समय के साथ आईपीओ की संख्या में भारी वृद्धि हुई है, जिसका अर्थ है कि पूरा इकोसिस्टम (जिसमें बैंकर, निवेशक आदि शामिल हैं) 3-4 साल पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आईपीओ का प्रबंधन कर रहा है। इससे यह अनिवार्य हो जाता है कि कंपनियां एक आकर्षक इक्विटी स्टोरी और पोजिशनिंग तैयार करें और प्रबंधन टीम संभावित निवेशकों की चिंताओं का प्रभावी ढंग से जवाब देने के लिए पूरी तरह से तैयार हो। यहीं पर हमारे जैसे वैश्विक सलाहकार की भूमिका आती है, जो क्षेत्र विशेषज्ञता और उत्पाद अनुभव को समाहित करते हुए व्यापक सलाहकार समाधान प्रदान करते हैं।
सबसे ज्यादा दिलचस्पी किन क्षेत्रों और भौगोलिक क्षेत्रों में देखी जा रही है?
स्वास्थ्य सेवा, उपभोक्ता, प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, औद्योगिक और विनिर्माण सहित कई क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर रुचि देखी जा रही है। भौगोलिक दृष्टि से यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका सहित सभी प्रमुख क्षेत्रों से मजबूत रुचि दिखाई दे रही है।
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अचानक भारतीय पूंजी बाजार पर जोर क्यों दे रही हैं?
बाहर से, भारत बहुत आकर्षक लगता है। अच्छा मूल्यांकन, मजबूत घरेलू प्रवाह सहित विस्तारित निवेशक पूल और बढ़ी हुई तरलता इसके मुख्य कारण हैं। भारत उन एमएनसी के लिए एक महत्त्वपूर्ण बाजार है जो स्थानीय व्यवसाय के लिए भारत में लिस्टिंग पर विचार कर रहे हैं और इसलिए अक्सर लिस्टिंग उनकी व्यापक भारत रणनीति में मदद करने का एक अन्य साधन है। लिस्टिंग यानी सूचीबद्धता से पूंजी जुटाने में मदद मिलती है। एक सलाहकार के रूप में हमारी भूमिका एमएनसी के साथ मिलकर उन्हें यह समझने में मदद करना है कि भारत में लिस्टिंग कब, कैसे और क्यों जरूरी है।
भारतीय सूचीबद्धता पर विचार करने वाली एमएनसी के बीच आप क्या रुझान देख रहे हैं?
भारत में लिस्टिंग का मूल्यांकन करने के लिए एमएनसी की रुचि बढ़ी है। भारत में सूचीबद्धता की संभावना तलाश रहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संख्या बढ़कर दो अंक में पहुंच गई है। घरेलू बाजारों (वैश्विक मूल कंपनी के लिए) की तुलना में मूल्यांकन आर्बिट्राज मुख्य कारकों में से एक है। साथ ही, लिस्टिंग मूल कंपनी के लिए तरलता प्रदान करती है, जबकि वे नियंत्रण बनाए रख सकते हैं और भारत के प्रति अपनी रणनीतिक प्रतिबद्धता को दीर्घावधि वृद्धि वाले बाजार के रूप में देखना जारी रख सकते हैं।
क्या भारत में नियामकीय बाधाएं एमएनसी लिस्टिंग को हतोत्साहित करती हैं?
मुद्दा नियामकीय बाधाओं का नहीं है, बल्कि यह है कि कुछ स्थानीय नियम अन्य देशों से अलग हैं। शासन, संबंधित-पक्ष लेनदेन, खुलासे और डीलिस्टिंग से संबंधित भारतीय नियमों को सावधानीपूर्वक समझने की आवश्यकता है।