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को-इन्वेस्टमेंट में आ सकती है तेजी

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को-इन्वेस्टमेंट ऐसी व्यवस्था है जिसे वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) अपनाते हैं।

Last Updated- June 22, 2025 | 10:12 PM IST
SEBI

नियामकीय बदलाव उस सेगमेंट को और ज्यादा रफ्तार दे सकते हैं जिसने 2022 से लगातार  तेजी दर्ज की है। पोर्टफोलियो प्रबंधन सेवा (पीएमएस) विकल्प के तहत को-इन्वेस्टमेंट की परिसंपत्तियां 2022 के अधिकांश समय में 50 करोड़ से कम थीं और उसके एक दर्जन से कम ग्राहक थे। नए नियामकीय आंकड़े से पता चला है कि तब से ये एयूएम अप्रैल 2025 तक बढ़कर 3,812 करोड़ रुपये पर पहुंच गईं और अब इसके 535 ग्राहक हैं। विश्लेषकों का कहना है कि हाल के बदलावों से सॉवरिन वेल्थ और पेंशन फंड से अधिक निवेश की राह खुल सकती है।

को-इन्वेस्टमेंट ऐसी व्यवस्था है जिसे वैकल्पिक निवेश फंड (एआईएफ) अपनाते हैं। एआईएफ अक्सर स्टार्टअप और अन्य गैर-सूचीबद्ध फर्मों को आवंटित करने के लिए अमीर निवेशकों से पैसा एकत्र करते हैं। उदाहरण के लिए अगर किसी स्टार्टअप का 25 करोड़ डॉलर जुटाने का लक्ष्य है तो एक एआईएफ 20 करोड़ डॉलर का निवेश कर सकता है और फिर अपने निवेशकों को एआईएफ में उनके योगदान के अलावा शेष 5 करोड़ डॉलर व्यक्तिगत रूप से लगाने में सक्षम कर सकता है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने दिसंबर 2021 में पीएमएस रूट के माध्यम से को-इन्वेस्टमेंट को औपचारिक रूप दिया था।

18 जून को नियामक ने एक नई व्यवस्था घोषित की जिसमें एआईएफ को को-इन्वेस्टमेंट व्हीकल (सीआईवी) नाम से एक अलग इकाई बनाने की सुविधा दी गई। उम्मीद है कि इससे ऐसे निवेश के लिए अनुपालन आवश्यकताएं आसान बनेंगी।

नियामक के एक बयान के अनुसार, ‘बोर्ड ने सेबी (वैकल्पिक निवेश फंड) विनियम, 2012 के तहत श्रेणी 1 और 2 एआईएफ को सीआईवी योजना की पेशकश करने की अनुमति देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। इससे एआईएफ और निवेशकों को एआईएफ के माध्यम से गैर-सूचीबद्ध कंपनियों में सह-निवेश करने और पूंजी निर्माण करने में मदद मिलेगी।’

सलाहकार फर्म बेन ऐंड कंपनी की इंडिया प्राइवेट इक्विटी रिपोर्ट 2025 के अनुसार कई अमीर संस्थानों ने को-इन्वेस्टमेंट को अपनाया है। इसमें कहा गया है, ‘चूंकि सॉवरिन वेल्थ फंड और पब्लिक  पेंशन फंड जैसे लिमिटेड पार्टनर तेजी से प्रत्यक्ष निवेश और को-इन्वेस्टमेंट व्यवस्था को प्राथमिकता दे रहे हैं, इसलिए प्रतिस्पर्धी पूंजी जुटाने के माहौल में प्रतिबद्धताओं के लिए फंडों को मजबूत परिचालन मूल्य निर्माण का प्रदर्शन करना चाहिए।’

निशीथ देसाई एसोसिएट्स की पार्टनर इप्सिता अग्रवाल ने कहा कि इस व्यवस्था से सॉवरिन वेल्थ और पेंशन फंडों को सबसे अधिक फायदा होने की उम्मीद है और इस सेगमेंट में परिसंपत्तियां तेजी से बढ़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (आईएफएससीए)-गिफ्ट सिटी ने मई में को-इन्वेस्टमेंट के लिए नियम पेश किए। आईएफएससीए मुख्य तौर पर गुजरात इंटरनैशनल फाइनेंस टेक-सिटी इंटरनैशनल फाइनैंशियल सर्विसेज सेंटर (गिफ्ट आईएफएससी) जैसे केंद्रों से जुड़ीं गतिविधियों को नियंत्रित करता है। उन्होंने कहा, ‘एक बेहद लचीली को-इन्वेस्टमेंट व्यवस्था की मजबूत मांग है।’उन्होंने कहा कि को-इन्वेस्टमेंट का आमतौर पर अन्य क्षेत्राधिकारों में नियमन नहीं होता है।

खेतान एंड कंपनी के पार्टनर विवेक मिमानी ने कहा, ‘पहले, कई फंडों और निवेशकों को पीएमएस विकल्प  के लिए साइन अप करना पड़ता था। इस कारण उनको अतिरिक्त अनुपालन जरूरतें करनी पड़ती थीं। लेकिन नई व्यवस्था से जटिल दस्तावेजीकरण की समस्या दूर होगी और इस विकल्प के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ावा मिलेगा।’ उन्होंने कहा कि को-इन्वेस्टमेंट में और तेजी आने की उम्मीद है। पीएमएस और नई को-इन्वेस्टमेंट व्यवस्था दोनों ही बनी रहेंगी। मान्यताप्राप्त निवशक (विशेष श्रेणी) को-इन्वेस्टमेंट पर जोर देंगे।  

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First Published - June 22, 2025 | 10:12 PM IST

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