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Year Ender 2025: टैरिफ, पूंजी निकासी और व्यापार घाटे के दबाव में 5% टूटा रुपया, एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना

एक्सपर्ट्स का मानना हैं कि 2026 में रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव के बीच कारोबार जारी रहने की उम्मीद है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता कोई रामबाण नहीं साबित होगा

Last Updated- December 31, 2025 | 4:42 PM IST
Rupee vs Dollar

Year Ender 2025: भारतीय रुपया कई प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए, वैश्विक व्यापार व्यवधानों और विदेशी पूंजी की भारी निकासी के बीच मजबूत घरेलू व्यापक आर्थिक सहायक कारकों के बावजूद टैरिफ के प्रभाव की अनिश्चितता बनी रहने तक अपनी गिरावट को रोक पाने की स्थिति में नहीं दिखता है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) टैरिफ के प्रभावों की भरपाई के लिए रुपये की गिरावट को एक तरह का उपाय मानता है और उसे उम्मीद है कि भारत के अपने सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार अमेरिका के साथ व्यापार समझौता हो जाने के बाद मुद्रा में स्थिरता लौट आएगी।

2025 में अब तक कितना कमजोर हुआ रुपया?

भारतीय मुद्रा जनवरी में प्रति डॉलर 85 के स्तर से अब तक करीब पांच फीसदी कमजोर हो चुकी है और डॉलर के मुकाबले 91 के ऐतिहासिक निचले स्तर को भी पार कर गई है। वर्ष के दौरान रुपये की विनिमय दर यूरो के मुकाबले 19 फीसदी से ज्यादा, ब्रिटिश पाउंड के मुकाबले लगभग 14 फीसदी और जापानी येन के मुकाबले पांच फीसदी से ज्यादा कमजोर हुई है।

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एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा बना रुपया

अमेरिकी डॉलर इंडेक्स में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों के कमजोर बने रहने के बावजूद रुपये का प्रदर्शन एशियाई समकक्ष मुद्राओं में सबसे खराब रहा। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के अप्रैल में व्यापक जवाबी शुल्क की घोषणा के साथ शुरू हुई मुद्रा में तीव्र गिरावट ने विदेशी निवेशकों को अन्य उभरते बाजारों में बेहतर मुनाफे की तलाश में लगातार धन निकालने के लिए प्रेरित किया।

रुपये में कमजोरी से विदेशी निवेश घटा

इस ट्रेंड का असर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के माध्यम से आने वाली विदेशी पूंजी में भी दिखा। शुद्ध आधार पर इस वर्ष जनवरी से अक्टूबर के बीच एफडीआई नकारात्मक हो गया। कोटक सिक्योरिटीज में मुद्रा एवं जिंस शोध प्रमुख अनिंद्य बनर्जी ने कहा, ‘‘एफडीआई भुगतान संतुलन के लिए एक मुख्य आधार की तरह काम करता है। जब यह कमजोर पड़ता है, तो करेंसी पोर्टफोलियो इनफ्लो पर ज्यादा निर्भर हो जाती है। विदेशी मुद्रा बाजार वैश्विक जोखिम भावना के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप की आवश्यकता बढ़ जाती है।”

इससे रुपये की गिरावट और तेज होती दिखी। 21 नवंबर को एक ही सत्र में यह एक फीसदी से ज्यादा टूटकर डॉलर के मुकाबले 89.66 पर आ गया। 13 सत्र के भीतर दो दिसंबर को यह 90 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया और 16 दिसंबर को डॉलर के मुकाबले 91 के ऐतिहासिक निचले स्तर से भी नीचे चला गया।

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आखिर क्यों टूट रहा है रुपया?

सरकार ने रुपये की गिरावट के लिए व्यापार घाटे के बढ़ने और कमजोर पूंजी खाते के बीच अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत में प्रगति की कमी को जिम्मेदार ठहराया। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने 16 दिसंबर को राज्यसभा में कहा था, ‘‘…भारतीय रुपये में गिरावट, व्यापार घाटे में वृद्धि और अमेरिका के साथ भारत के व्यापार समझौते से जुड़ी प्रगति के कारण है जबकि पूंजी खाते से अपेक्षाकृत कमजोर समर्थन मिला है।’’

पूंजी खाते का संकट एक बड़ी वजह

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हालांकि कहा कि केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये के लिए किसी निश्चित दायरे को लक्ष्य नहीं बनाता। एचडीएफसी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक दिलीप परमार रुपये की गिरावट का मुख्य कारण “पूंजी खाते का संकट” मानते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले संकट जहां व्यापार के कारण हुए थे, इसके विपरीत मौजूदा गिरावट का कारण पूंजी प्रवाह में कमी है।’’ उन्होंने कहा कि घरेलू वृद्धि को समर्थन देने के लिए आरबीआई के ब्याज दरों में कटौती किए जाने से रुपया कम आकर्षक हो गया।

रुपये पर अमेरिकी टैरिफ का दिखा असर

मिराए एसेट शेयरखान के शोध विश्लेषक अनुज चौधरी ने कहा, ‘‘भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और भारत से निर्यात पर अमेरिका द्वारा 50 फीसदी शुल्क लगाए जाने से भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ जिससे व्यापार घाटा बढ़ा और रुपये पर नकारात्मक असर पड़ा।’’ उन्होंने निकट अवधि में रुपये के 91 और 92.50 के स्तर तक गिरने का अनुमान लगाया है।

एलकेपी सिक्योरिटीज में जिंस एवं मुद्रा के उपाध्यक्ष (शोध) जतीन त्रिवेदी ने कहा कि एफडीआई में तेज गिरावट ने “लॉन्ग टर्म डॉलर इनफ्लो को कम कर दिया है जिससे रुपया अस्थिर पोर्टफोलियो फ्लो पर ज्यादा निर्भर हो गया है।” उन्होंने कहा, “जिंस की ऊंची कीमतों तथा अमेरिका के साथ व्यापार समझौतों को लेकर बढ़े जोखिम ने एफडीआई को दूर रखा और निवेश की कमी के कारण रुपया प्रभावित हुआ क्योंकि निवेश हमारे प्रतिस्पर्धी देशों की ओर चला गया।”

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इस साल कुल निवेश घटा

आरबीआई के आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष जनवरी से अक्टूबर के बीच कुल निवेश फ्लो घटकर शुद्ध रूप से (-) 0.010 अरब डॉलर हो गया। इसके विपरीत 2024 के जनवरी-दिसंबर के दौरान देश में 23 अरब डॉलर का निवेश फ्लो दर्ज किया गया था। शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) जनवरी-दिसंबर 2025 के दौरान 6.567 अरब डॉलर रहा जबकि नेट पोर्टफोलियो निवेश (-) 6.575 अरब डॉलर रहा।

वित्त वर्ष 2026 की जुलाई-सितंबर तिमाही के भुगतान संतुलन के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार में 10.9 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई, जबकि एक वर्ष पहले इसी अवधि में 18.6 अरब डॉलर की वृद्धि हुई थी।

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के दिलीप परमार ने कहा कि मौजूदा रुपये का संकट लगभग पूरी तरह पूंजी खाते के असंतुलन से प्रेरित है। 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा 17.5 अरब डॉलर की रिकॉर्ड निकासी ने डॉलर की भारी मांग उत्पन्न की, जिससे रुपया दबाव में आ गया।

व्यापार समझौता कोई रामबाण नहीं

कोटक सिक्योरिटीज के अनिंद्य बनर्जी ने कहा, “अमेरिका के साथ व्यापार समझौता मददगार होगा लेकिन यह कोई रामबाण नहीं है।” उन्होंने कहा कि एफडीआई अनुमोदनों को तेज एवं सरल बनाना, घरेलू बॉन्ड तथा विदेशी मुद्रा बाजारों को गहराई देना और अल्पकालिक पोर्टफोलियो फ्लो पर निर्भरता कम करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बनर्जी ने कहा कि चुनौतियों के बावजूद, मजबूत व्यापक आर्थिक बुनियादी ढांचे के सहारे रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव के बीच कारोबार जारी रहने की उम्मीद है।

(PTI इनपुट के साथ)

First Published - December 31, 2025 | 4:40 PM IST

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