facebookmetapixel
Advertisement
पश्चिम एशिया में जंग से दहला दलाल स्ट्रीट: सेंसेक्स 1048 अंक टूटा, निवेशकों के ₹6.6 लाख करोड़ डूबेभारतीय चाय पर ईरान संकट का साया: भुगतान अटके और शिपमेंट पर लगी रोक, निर्यातकों की बढ़ी चिंताकपड़ा उद्योग पर युद्ध की मार: पश्चिम एशिया के ऑर्डर अटके, तिरुपुर और सूरत के निर्यातकों की बढ़ी चिंताहोर्मुज संकट के बीच भारत ने खोला अपना ‘प्लान बी’: अमेरिका और अफ्रीका से कच्चा तेल मंगाने की तैयारीखाड़ी देशों में फंसे भारतीय विमानों की घर वापसी शुरू, 357 उड़ानें रद्द होने के बाद शुरू हुआ परिचालनपश्चिम एशिया में जंग के बीच PM मोदी ने इजरायल और खाड़ी देशों के नेताओं से की बातसुनील भारती मित्तल को ‘GSMA लाइफटाइम अचीवमेंट’ सम्मान, बार्सिलोना में वैश्विक दिग्गजों ने सराहाएयर इंडिया एक्सप्रेस में होगा नेतृत्व परिवर्तन: MD का पद छोड़ेंगे आलोक सिंह, कार्यकाल 19 मार्च को खत्म36 महारत्न व नवरत्न कंपनियों में न्यूनतम स्वतंत्र निदेशक नहीं, कॉरपोरेट गवर्नेंस में बड़ी खामियांकनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा: 8 समझौतों पर हस्ताक्षर, CEPA को जल्द अंतिम रूप देने पर बनी सहमति

प्रतिस्पर्धा विधेयक में व्यापक बदलाव के सुझाव

Advertisement
Last Updated- December 14, 2022 | 1:18 AM IST
nirmala sitaraman

वित्त पर स्थायी समिति ने आज संसद में अपनी रिपोर्ट पेश की और प्रस्तावित प्रतिस्पर्धा संशोधन विधेयक, 2022 में कई तरह के स्पष्टीकरण और बदलाव की सिफारिश की। जयंत सिन्हा की अध्यक्षता वाली स्थायी समिति ने प्रस्तावित विधेयक में सौदे के मूल्य की गणना करने के तरीके निर्दिष्ट करने और सांठगांठ को निपटान प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति देने का सुझाव दिया है। समिति ने प्रतिस्पर्धा-रोधी व्यवहार का पता लगाने से पहले भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) और महानिदेशक के लिए प्रभाव आधारित विश्लेषण शुरू करने का भी सुझाव दिया है।

समिति ने कहा कि अगर सौदे की जांच का मामला आता है तो सौदे के मूल्य की समीक्षा दो साल में एक बार की जगह हर साल होनी चाहिए। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि विधेयक में इसका उल्लेख नहीं किया गया है कि सौदे के मूल्य की गणना कैसे की जाए और प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या टाले गए प्रतिफल का क्या अर्थ है। हितधारकों की राय पर सहमति जताते हुए समिति ने कहा है, ‘ये शर्तें ऐसे लेनदेन को विलय नियंत्रण प्रक्रिया में ला सकती हैं, जिनसे प्रतिस्पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना ही नहीं है।’

कंपनी मामलों के मंत्रालय का प्रस्ताव है कि 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के सौदे तथा भारत में संबं​धित कंपनी का उल्लेखनीय परिचालन होने पर उस कंपनी के विलय-अधिग्रहण की सूचना सीसीआई को देनी होगी। इसका मकसद ऐसे विलय-अ​धिग्रहण का पता लगाने का था, जहां संपत्ति या सालाना कारोबार निर्धारित सीमा से कम हो सकता है मगर डिजिटल और नए युग के बाजारों के हिसाब से डेटा बहुत ज्यादा हो।

हितधारकों की एक प्रमुख चिंता थी – सौदे के मूल्य में क्या शामिल होगा? …उसमें केवल भारतीय परिचालन होगा या पूरा वैश्विक लेनदेन होगा? सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर (प्रमुख – प्रतिस्पर्धा कानून) अवंतिका कक्कड़ ने कहा, ‘कंपनी मामलों के मंत्रालय ने साफ कर दिया है कि यह केवल डिजिटल क्षेत्र के लिए है और छोटे लक्ष्य परीक्षण की स्थिति में भी लागू होगा।’

प्रस्तावित विधेयक में निपटान और प्रतिबद्धता के लिए भी एक प्रावधान पेश किया गया है, जिसमें जांच का सामना कर रहा कोई भी उद्यम निपटान के लिए आवेदन कर सकता है। सीसीआई ने कहा कि निपटान प्रस्ताव पर सहमत होना उसकी मर्जी होगी, जिसमें भुगतान या ऐसी अन्य शर्तें या दोनों शामिल हो सकते हैं।

स्थायी समिति ने प्रतिबद्धता तंत्र से संबं​धित उस प्रावधान को हटाने का सुझाव ​​दिया है, जिसमें कोई तीसरा पक्ष आपत्ति या सुझाव पेश कर सकता है। हितधारकों का कहना था कि इससे गोपनीयता का उल्लंगन हो सकता है। समिति ने कहा है कि ऐसा नियम विवेकाधीन होना चाहिए न कि अनिवार्य। समिति ने यह भी कहा है कि ऐसी कार्यवाही का विकल्प चुनने वाली कंपनी को उसे वापस लेने का भी विकल्प दिया जाना चाहिए, जबकि मौजूदा विधेयक में यह अ​धिकार केवल सीसीआई के पास है।

सांठगांठ के बारे में समिति ने सुझाव दिया है पूरी प्रक्रिया के लिए व्यावहारिक उपाय के रूप में निपटान की संभावना के दायरे में लाने पर विचार करना चाहिए। उसका कहना है कि निपटान तक पहुंचा कोई भी मामला सांठगांठ हो या न हो, प्रतिस्पर्धा-रोधी हो सकता था।

कंपनी मामलों के मंत्रालय ने समिति के समक्ष प्रस्तुति में स्पष्ट किया था कि मनमानापन कम करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए वह निपटान और प्रतिबद्धता तंत्र के लिए विस्तृत नियमन जारी करेगा। प्रस्तावित संशोधन के पीछे का विचार प्रतिस्पर्धा के मामलों का तेजी से समाधान करना और मुकदमेबाजी को कम करना है।

समिति ने पाया कि विधेयक में यह नहीं बताया गया है कि निपटान या प्रतिबद्धता के लिए कंपनी को अपराध स्वीकार करने की आवश्यकता है या नहीं। प्रथम दृष्टया दोष स्वीकार करना अनिवार्य नहीं होना चाहिए…आखिरी अवसर के रूप में सीसीआई द्वारा अंतिम निपटान के आदेश के बाद आवेदक को निपटान/प्रतिबद्धता पर पुनर्विचार करने की अनुमति देने का भी प्रावधान होना चाहिए।

समिति ने उपभोक्ताओं को उचित मुआवजा प्रदान करने का प्रावधान शामिल करने का भी सुझाव दिया है। वर्तमान कानून में प्रभाव आधारित विश्लेषण करने के लिए सीसीआई या महानिदेशक की आवश्यकता नहीं है – वर्चस्व के दुरुपयोग के मामलों की जांच करते समय आचरण के वास्तविक प्रभावों का विश्लेषण किया जाता है।

Advertisement
First Published - December 13, 2022 | 10:06 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement