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नौकरी में AI अपनाना उतना डरावना नहीं जितना लगता है: स्टैनफर्ड प्रोफेसर”

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स्टैनफर्ड प्रोफेसर सूज़न एथी: नौकरी में AI उतना डरावना नहीं, चुनिंदा समूह प्रभावित होंगे; भारत में कोडिंग और सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट के अवसर बढ़ेंगे।

Last Updated- December 22, 2025 | 8:08 AM IST
AI
Representative Image

स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय में इकनॉमिक्स ऑफ टेक्नॉलजी की प्रोफेसर सूज़न एथी ने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स की अपनी यात्रा के दौरान रुचिका चित्रवंशी और असित रंजन मिश्र के साथ बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कार्यबल, इकॉनमी पर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के प्रभाव और डिजिटल स्पेस में प्रतिस्पर्धा के लिए इंटरऑपरेबिलिटी के महत्त्व के बारे में वार्ता की। पेश हैं, मुख्य अंश :

क्या हम उम्मीद करते हैं कि एआई को अपनाने की गति पर्सनल कंप्यूटर जैसी पहले की तकनीकों से अधिक होगी या इसे अपनाने की गति को नियामक,  आधारभूत ढांचा और विश्वास संबंधी बाधाएं धीमी कर देंगी?

मुझे नहीं लगता कि इसका कोई एक जवाब है। कुछ उपयोगों में अपनाने की लागत कम है और वे जल्दी हो जाएंगे। ब्राउजर पर चैट जीपीटी का उपयोग करना बहुत आसान है।

कंपनियों के लिए अपने आंतरिक चैटबॉट का उपयोग करना आसान है लेकिन इससे अर्थव्यवस्था में ज्यादा बदलाव नहीं होता है। बहुत सी चीजें जो अर्थव्यवस्था को बदलती हैं, उन्हें अपनाने की लागत अधिक होती है और वे धीरे-धीरे होती हैं। इसमें सबसे आसान कदम एंट्री लेवल पर कर्मचारियों की नियुक्ति को रोकना है। दरअसल, आप यह नहीं जानते कि उनसे क्या करवाना चाहते हैं। इसलिए हम सबसे त्वरित प्रतिक्रिया वहीं देख रहे हैं। मेरा पूरे मामले में निष्कर्ष यह है कि नौकरी में कार्य करने के तरीके में ज्यादातर बदलाव उतना नाटकीय नहीं होगा, जितना लोग डरते हैं। हालांकि चुनिंदा समूहों जैसे एंट्री लेवल कर्मचारियों या कॉल सेंटरों पर खराब प्रभाव पड़ेगा।

भारत में भारी मात्रा में आईटी आउटसोर्सिंग होती है और वहां लोगों को यह बदलना होगा कि वे क्या करते हैं। जब कोई चीज सस्ती हो जाती है, जैसे कोडिंग। ऐसे में इसका मतलब यह नहीं है कि आप कोडिंग का कार्य कम करने जा रहे हैं। इसका असलियत में अर्थ है कि दुनियाभर की अधिक कंपनियां सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट कर सकती हैं। सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट का विशाल विश्वव्यापी बैकलॉग जो पहले आर्थिक रूप से संभव नहीं था, अब किया जा सकता है। मैं वास्तव में सतर्क आशावादी हूं। मुझे लगता है कि कुछ कंपनियां विफल हो जाएंगी। उद्योग का पुनर्गठन होगा। लिहाजा जो लोग इसे सबसे अच्छे ढंग से करेंगे, वे बढ़ेंगे। हालांकि जो नहीं कर पाएंगे, उनका कारोबार कम होने वाला है।

यदि एआई निम्न-कुशल कार्य के बजाय उच्च-भुगतान और व्हाइट-कॉलर नौकरियों को असमान रूप से स्वत: बदल देती है तो भारत जैसे देश क्या करें?

यह देखने की जरूरत है कि नई मांग कहां है और इसलिए उन्हें समय की मांग के अनुरूप बदलाव करना होगा। उन्हें अपने कर्मचारियों को अधिक उत्पादक बनाने के लिए एआई अपनानी होगी। दुनिया की हर सरकार, हर कंपनी नए सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट करना चाहेगी और एआई को अपनाने के लिए श्रम व विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। कंपनियों को यह पता लगाने की जरूरत है कि उस मांग को कैसे पूरा किया जाए, लेकिन मांग है। कॉलेज में पढ़ रहे लोगों के लिए यह थोड़ा डरावना है। कॉलेज के छात्रों को नए तरीकों को अपनाने में बेहद तेज और सटीक होना होगा। अब वे पारंपरिक ढर्रे का पालन नहीं कर सकते हैं।  लोगों को डोमेन के बारे में सीखना चाहिए। यह पहले से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है कि आप कोडिंग के अलावा कुछ और जानते हों। आप वित्त, चिकित्सा के बारे में सीखते हैं। आप समस्या के बारे में सीखते हैं।

भारत सरकार यह विचार कर रही है कि भारतीय कंटेंट क्रिएटर्स के डेटा का उपयोग करके एआई मॉडल को प्रशिक्षित करने वाली कंपनियों को इन सिस्टम के वाणिज्यिक होने के बाद अपने वैश्विक राजस्व का हिस्सा साझा करना चाहिए। क्या यह उचित है या यह नवाचार को हतोत्साहित करेगा?
इनोवेशन के लिए सबसे बुरा तब होता है जब रास्ते के नियम स्पष्ट नहीं होते हैं। लिहाजा किसी भी तरह की प्रणाली नहीं होने से बेहतर है कि कोई प्रणाली हो। कुछ खास तरह के कंटेंट बहुत अहम होते हैं।
मैं यह मानती हूं कि यह समाचार बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। यदि आप समाचार के बिजनेस मॉडल को हटा देते हैं, तो हमारे पास समाचार नहीं होंगे और हमें समाचार की आवश्यकता है। इसलिए मुझे लगता है कि समाचार कुछ खास है। दरअसल आपको हर दिन इस पर पैसा खर्च करना होता है।
यह दुनिया भर में समस्या रही है। हमारे पास अभी तक यह सुनिश्चित करने के लिए ढांचे नहीं हैं कि समाचार उद्योग को मुआवजा मिले और इनोवेशन भी आगे बढ़े। लिहाजा समाचार उद्योग स्वयं एआई उत्पादों का इनोवेशन और निर्माण कर रहा है।
इसलिए (जल्दी) ढांचा प्राप्त बाद में बनाने से पहले जितना पहले हो, उतना अच्छा है। हालांकि इस ढांचे को किसी न किसी रूप में क्रिएटर्स के हितों की रक्षा करनी होगी।

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First Published - December 22, 2025 | 8:08 AM IST

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