facebookmetapixel
Advertisement
दूसरी और तीसरी तिमाही में रिटर्न 1% से ऊपर रहने की उम्मीद: बैंक ऑफ बड़ौदा2030 तक दोगुना होगा माइनिंग और कंस्ट्रक्शन कैपेक्स, भारत बनेगा ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हबEPFO की UPI सेवा में देरी, अब अगस्त में शुरू हो सकती है PF क्लेम की नई सुविधाभारत की शिक्षा व्यवस्था को नौकरशाही में फेरबदल नहीं, प्रणालीगत सुधारों की जरूरतभारत के 20 करोड़ मिडिल क्लास उपभोक्ता बनेंगे बाजार की नई ताकत, कंपनियां बदल रही हैं रणनीतिEditorial: ट्रंप के नए टैरिफ से बढ़ी अनिश्चितता, क्या भारत की व्यापार नीति तैयार है? Gold Loan के दम पर PSBs की कमाई बढ़ी, PSLC बिक्री से पहली तिमाही में हुआ बड़ा मुनाफाकांवड़ यात्रा के लिए योगी सरकार की बड़ी तैयारी, 24×7 कंट्रोल रूम और अतिरिक्त बसों का इंतजामपरीक्षा सुधारों पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, नंदन नीलेकणि की अगुवाई में बनेगी हाई पावर टास्क फोर्सUpcoming NFO: अगले हफ्ते लॉन्च होंगे SBI, Invesco, Edelweiss और DSP के 5 नए फंड, जानें पूरी डिटेल

लोकसभा में आईबीसी विधेयक में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव किया गया

Advertisement

दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) संशोधन विधेयक में लुक-बैक अवधि की गणना दिवाला प्रक्रिया की शुरुआत के बजाय दिवाला की पहल की तिथि से करने का प्रावधान किया गया है। 

Last Updated- August 13, 2025 | 10:38 PM IST
IBC

दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) संशोधन विधेयक में लुक-बैक अवधि की गणना दिवाला प्रक्रिया की शुरुआत के बजाय दिवाला की पहल की तिथि से करने का प्रावधान किया गया है।  इसका मकसद लेन-देन की एक विस्तृत श्रृंखला को शामिल करना है। खासकर इसमें ऐसे लेन-देन को शामिल करने का मकसद है, जो परिसंपत्ति को दिवालिया प्रक्रिया से बाहर रखने के लिए किए गए थे।

सरकार ने मंगलवार को लोकसभा में आईबीसी विधेयक पेश किया है। इसमें व्यापक सुधारों का प्रस्ताव किया गया है, जिसमें ग्रुप और क्रॉस बॉर्डर इनसॉल्वेंसी से लेकर ऋणदाता की पहल पर शुरू हुई दिवाला समाधान प्रक्रिया शामिल है।  सरकार ने यह विधेयर प्रवर समिति के पास भेज दिया है। आईबीसी के मुताबिक आवेदन 14 दिनों में स्वीकार हो जाना चाहिए। यदि इससे अधिक समय लगता है तो तरजीही सौदों के लिए लुक बैक की अवधि में ऐसे ज्यादातर सौदे नहीं आ पाते, जो आवेदन स्वीकार करने से पहले किए गए हों।

सरकार को चिंता थी कि इससे ऋणग्रस्त कंपनियां कोशिश करतीं कि दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आवेदन देर से स्वीकार किया जाए ताकि ऐसे सौदे उसके दायरे में नहीं आ पाएं, जिन्हें करना जरूरी नहीं था। विधेयक में कहा गया है, ‘इसलिए तरजीही सौदों के लिए लुक-बैक अवधि को इस तरह बदला गया है कि आवेदन से पहले हुए अधिक सौदे उसके दायरे में आ सकें। इनमें खास तौर पर वे सौदे होंगे, जो दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू होने की संभावना देखकर किए जाते हैं ताकि परिसंपत्तियों को प्रक्रिया से बाहर रखा जा सके।’

ग्रांट थॉर्नटन में पार्टनर सुरेंद्र राज ने कहा कि समाधान पेशेवरों और परिसमापकों को सावधानी से जांच करनी चाहिए ताकि सही कारोबारी सौदों को तरजीही सौदों की श्रेणी में नहीं रख दिया जाए और हर सौदे को धोखाधड़ी न मान लिया जाए। इस तरह के ढेरों मामले एनसीएलटी में पहले ही लंबित हैं।

Advertisement
First Published - August 13, 2025 | 10:29 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement