लगातार वैश्विक अनिश्चितता के बीच केंद्र सरकार ने राजकोष से जुड़ी ज्यादा गुंजाइश बनाए रखी है और ऋण-जीडीपी अनुपात को वित्त वर्ष 2026 में हासिल किए गए 56.1 प्रतिशत के मुकाबले वित्त वर्ष 2027 में महज 50 आधार अंक घटाकर 55.6 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा है। बजट में 10 प्रतिशत की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने वित्त वर्ष 2027 के बजट भाषण में कहा, ‘ऋण-जीडीपी अनुपात में गिरावट से ब्याज भुगतान पर होने वाले खर्च में कमी की मदद से प्राथमिकता वाले क्षेत्र में खर्च के लिए संसाधन उपलब्ध होंगे।
पिछले साल, सीतारमण ने राजकोषीय घाटे पर ध्यान केंद्रित करने की पुरानी प्रथा से हटकर ऋण-जीडीपी अनुपात को प्रमुख राजकोषीय लक्ष्य बनाने की घोषणा की थी। मध्यावधि का लक्ष्य वित्त वर्ष 2031 तक ऋण-जीडीपी अनुपात को 50 फीसदी तक लाना है। इसमें एक प्रतिशत अंक की घट-बढ़ हो सकती है।
केंद्र सरकार के कर्ज में मौजूदा विनिमय दर पर बाहरी सार्वजनिक ऋण के साथ-साथ लोक खाते की वे कुल बकाया देनदारियां शामिल हैं, जिनमें राष्ट्रीय लघु बचत कोष के तहत राज्यों की विशेष प्रतिभूतियों में निवेश और अतिरिक्त बजटीय देनदारियां जैसे कि केंद्र सरकार के सार्वजनिक उद्यम और सरकारी संस्थाओं द्वारा जुटाई गई वित्तीय बोझ शामिल हैं।
वित्त वर्ष 2026 में जीडीपी के 4.4 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करने के बाद सीतारमण ने अब वित्त वर्ष 2027 के लिए इसे 4.3 प्रतिशत पर रहने का अनुमान जताया है।
बजट के बाद संवाददाता सम्मेलन में आर्थिक मामलों की सचिव अनुराधा ठाकुर ने कहा कि ऋण-जीडीपी अनुपात को हासिल करने के लिए राजकोषीय घाटा एक परिचालनगत लक्ष्य होगा। उन्होंने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि हम राजकोषीय घाटे से दूर जा रहे हैं। यह निगरानी करने वाला लक्ष्य नहीं होगा। लेकिन दोनों साथ-साथ काम करते हैं।’
सीतारमण ने कहा कि बड़े बदलाव आसानी से स्वीकार नहीं किए जाते। उन्होंने कहा, ‘कोई न कोई वर्ग प्रभावित होता है। हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ना होगा। लेकिन फिर भी इसे उस दायरे में रखना होगा जो भरोसा दिलाए। हमें यह दिखाना होगा कि हम राजकोषीय समझदारी वाले प्रबंधन पर जोर देते हैं। राजकोषीय घाटे को 4 प्रतिशत तक लाने का कोई मतलब नहीं है। इसे स्थिर होना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था स्थिर गति से बढ़े। यह एक जिम्मेदार और वास्तविक आंकड़ा है। हमें इसे हासिल करना चाहिए और कहीं भी किसी तरह की उथल-पुथल नहीं लानी चाहिए।’
डीबीएस बैंक में वरिष्ठ अर्थशास्त्री राधिका राव ने कहा कि ऋण-जीडीपी अनुपात को मुख्य नॉमिनल एंकर मानने के नजरिये में बदलाव का मतलब है राकोषीय प्रबंधन में ज्यादा स्वायत्तता, खासकर वैश्विक अनिश्चितता और बाहरी झटकों के जोखिम के समय। उन्होंने कहा, ‘इसके बाद राजकोषीय नीति बदलती हुई आर्थिक स्थितियों से निपटने में ज्यादा मजबूत भूमिका निभा सकती है। इस मामले में, राजकोषीय घाटे का नतीजा एक गौण लक्ष्य बन जाता है, और कुछ साल तक मुख्य स्तर पर मामूली या कोई और समेकन देखने को नहीं मिलेगा।’