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चीन की बुजर्ग आबादी की चुनौतियों के भारत के लिए क्या हैं मायने

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दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं महंगाई को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं चीन अपने मूल्य सूचकांक को लगभग शून्य पर लाने की कोशिश कर रहा है।

Last Updated- October 15, 2023 | 11:33 PM IST
china

China Population: चीन में बढ़ती बुजुर्ग आबादी, कम जन्म दर और महिला-पुरुष के कम अनुपात जैसे हालात देखते हुए भारत को भी सचेत रहने की जरूरत है।

कुछ दिन पहले चीन के सोशल मीडिया पर खाली अपार्टमेंट ब्लॉक को ध्वस्त करने की तस्वीरें नजर आईं। वहीं अन्य आंकड़ों से संकेत मिल रहा है कि किस तरह चीन के कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था के अनुरूप नहीं थे।

दुनिया की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं महंगाई को नियंत्रित करने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं चीन अपने मूल्य सूचकांक को लगभग शून्य पर लाने की कोशिश कर रहा है।

रियल एस्टेट क्षेत्र ने चीन के सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30 प्रतिशत का योगदान दिया है। यदि यह बरबादी के कगार की ओर बढ़ता है तब एवरग्रांडे जैसे बड़े डेवलपर के कारण वैश्विक स्तर पर अप्रत्यक्ष असर दिखाई पड़ सकता है जिस पर भारी कर्ज का बोझ है।

मौजूदा स्थिति के अनुमानित कारणों से परे भी चीन अपनी आबादी के चलते गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। इस देश में बुजुर्गों की आबादी ज्यादा है और जन्म दर कम है। इसके अलावा महिला-पुरुष का अनुपात भी संतुलित नहीं है।

अगर जापान की बात करें तो 1990 के दशक में यह देश भी इसी तरह के दौर से गुजर रहा था और इसके चलते यहां तीन दशकों तक ठहराव की ​स्थिति बनी रही। लेकिन चीन के व्यापक दायरे के चलते दुनिया पर इसका अधिक प्रभाव हो सकता है।

जापान में 1990 के दशक से लगभग 12.5 करोड़ की स्थिर आबादी है। यहां का कार्यबल भी लगभग 6.9 करोड़ के स्तर पर स्थिर है लेकिन उम्रदराज होने की वजह से समय के साथ लोगों की उत्पादकता कम हो गई है। क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के संदर्भ में देखा जाए तो जापान, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 3.7 प्रतिशत का योगदान देता है।

चीन की आबादी 1.4 अरब है और काम करने वालों की की तादाद करीब 75 करोड़ है। यह पीपीपी के लिहाज से वैश्विक जीडीपी में लगभग 19 प्रतिशत का योगदान देता है।

जापान की स्थिरता के विपरीत, चीन में अगले 10 वर्षों में उम्र बढ़ने के कारण 5 करोड़ लोगों की मृत्यु हो सकती है और 2050 से हर दशक में लगभग 10 करोड़ लोग वृद्धावस्था के चलते मौत के करीब होंगे। ऐसे में कार्यबल में तेजी से कमी आने की आशंका है।

चीन कई दशकों से उच्च मध्यम आमदनी वाला देश रहा है। लेकिन यह उच्च आमदनी के स्तर तक पहुंचने में सक्षम नहीं हो सकता है क्योंकि यहां बुजुर्गों की तादाद ज्यादा है।

इन वजहों से भारत को सबक लेने की गुंजाइश बनती हैं। भारत पीपीपी के संदर्भ में वैश्विक जीडीपी में लगभग 7.5 प्रतिशत का योगदान देता है। चीन के मुकाबले भारत में मुख्यतः महिलाओं की कम भागीदारी के कारण कार्यबल की भागीदारी भी अपेक्षाकृत कम है। भारत में जहां लगभग 30 प्रतिशत महिला श्रम भागीदारी है, वहीं चीन में यह भागीदारी दर 75 प्रतिशत है।

चीन के औसत कामगारों ने 14 साल तक पढ़ाई की है। वहीं अधिकांश भारतीय श्रमिकों ने आठ साल से भी कम अवधि तक पढ़ाई की है। इस पृष्ठभूमि के लिहाज से कामगारों का कौशल विकास करना कठिन है और कौशल के बिना भारत आमदनी की सीढ़ी पर आगे नहीं बढ़ सकता है।

भारत में महिला-पुरुष अनुपात भी अच्छा नहीं है और जन्म दर कम हो रही है। देश के जिन इलाकों में शिक्षा का स्तर सही है वहां कुल प्रजनन दर में कमी आई है। भारत को भी बुजुर्ग आबादी और घटते कार्यबल की चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

चीन में उदारीकरण की शुरुआत के करीब 12 साल बीतने के बाद भारत में इसकी शुरुआत हुई। वर्ष 1979 में, जब चीन ने अपना बाजार खोला तब वास्तव में भारत की तुलना में इसकी प्रति व्यक्ति आय कम थी। अब, चीन की अर्थव्यवस्था ढाई से पांच गुना बड़ी है और यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप इसकी गणना कैसे करते हैं।

हालांकि, चीन के साथ दो अच्छी बात जुड़ी थी। वर्ष 1979 में यहां 65 प्रतिशत लोग साक्षर थे और यहां कोई ऐसी सामाजिक बाधा भी नहीं थी जिससे महिलाओं के लिए काम करना मुश्किल होता। वहीं वर्ष 1991 में जब भारत ने उदारीकरण की शुरुआत की तब यहां केवल 48 प्रतिशत लोग ही साक्षर थे और देश में कामकाजी महिलाओं के प्रति रवैया सकारात्मक नहीं था।

एक आबादी को शिक्षित करने की प्रक्रिया पीढ़ी से ही चलती है। उन सामाजिक धारणाओं से निपटना और भी कठिन हो जाता है जिसके मुताबिक लड़कों की तरफदारी की जाती है और लड़कियों को घर पर रखने जैसी पाबंदी होती है। ऐसा लगता है कि भारत दोनों ही मोर्चे पर विफल रहा है। भारत में वर्ष 2011 में साक्षरता दर केवल 74 प्रतिशत थी और कोविड के बाद से महिला कार्यबल की भागीदारी में और कमी आई है।

इस तरह भारत को आबादी का जो फायदा मिल सकता है, उसे भी देश गंवाता हुई दिखता है। इस बात की संभावना बहुत कम है कि नीति निर्माता साक्षरता दर बढ़ाने और युवाओं को स्कूल और कॉलेज में तीन-चार साल तक और रखने के लिए कोई कदम उठाएंगे। जहां तक महिला कार्यबल की भागीदारी की बात आती है तब ऐसा लगता है कि समाजशास्त्रियों को भी इस बात का अंदाजा नहीं होता है कि वे इसकी शुरुआत कहां से करनी है।

चीन बुजुर्गों की आबादी से जुड़े मुद्दे से निपटने की कोशिश कैसे करेगा, इससे भारत को भी अपनी समस्याओं का हल निकालने का नुस्खा मिलेगा। अगर भारत समाधान नहीं ढूंढ सकता है या कम से कम मुद्दों का हल नहीं निकाल सकता है तब यह सामाजिक-आर्थिक स्थिरता या पतन की राह पर आगे बढ़ने के लिए मजबूर होगा।

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First Published - October 15, 2023 | 11:33 PM IST

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