facebookmetapixel
Advertisement
‘उदारीकण के बाद अहसास हुआ कि हमें इनोवेशन करना होगा, न कि दिल्ली में इंतजार’, नारायण मूर्ति ने बयां की 1991 से पहले की दुश्वारियां1991 से अब तक का सफर: अविश्वास से निकलकर भरोसे पर आधारित आर्थिक नीति बनाने की जरूरत‘बंगाल को मिली तबाही और निराशा की विरासत’, बोले स्वप्न दासगुप्ता: निवेश लाने के लिए करेंगे अतिरिक्त प्रयासऑरिफ्लेम बेचेगी भारत में अपना विनिर्माण कारोबार, अकुम्स ड्रग्स की सहायक कंपनी प्योर एंड क्योर से हुआ समझौता₹9,200 करोड़ के IPO से कर्जमुक्त होगी मणिपाल हेल्थ, उत्तर भारत में विस्तार पर कंपनी का जोर: दिलीप जोसजून में लगातार दूसरे महीने क्रेडिट कार्ड खर्च ₹2 लाख करोड़ पार, HDFC Bank और SBI का दिखा दबदबाICICI Bank ने डॉलर बॉन्ड से जुटाए $1 अरब, 2017 के बाद पहला सबसे बड़ा सार्वजनिक बॉन्ड इश्यूओडिशा में बनेगा देश का पहला AI-ऑप्टिमाइज्ड डेटा सेंटर, HCLTech करेगी ₹14,257 करोड़ का निवेशबंगाल को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा, केंद्र के साथ तालमेल और निवेश पर रहेगा हमारा जोर: स्वप्न दासगुप्ताजून में सुस्त IPO के बावजूद ऋण प्रतिभूतियों ने रचा इतिहास, जुटाई ₹3.15 लाख करोड़ की रिकॉर्ड रकम

किताबें बरकरार, ई-पुस्तकों के पाठक भी तैयार

Advertisement
Last Updated- December 11, 2022 | 3:27 PM IST

पढ़ने-लिखने के डिजिटल माध्यमों की बढ़ती लोकप्रियता ने किताबों के पाठक निश्चित तौर पर कम किए हैं लेकिन अभी भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ऑफलाइन किताबें पढ़ना बेहतर समझते हैं। वहीं ऑनलाइन पढ़ने में रुचि लेने वालों का तर्क है कि उन्हें हर जगह किताब लेकर चलने की जरूरत नहीं पड़ती है और वे अपनी सुविधा के हिसाब से कहीं भी, कभी भी पढ़ाई कर सकते हैं।
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत कवि-गजलगो आलोक श्रीवास्तव इस बारे में कहते हैं, ‘हर नई चीज पुरानी को चुनौती देती ही है। मेरे ख्याल से हिंदी का पाठक कम नहीं हुआ है, मेरे जैसा विशुद्ध पाठक तो किताबों को ऑफलाइन ही पढ़ता है। जो किताबों की शक्ल है, रम्ज़ है, स्पर्श है और उसकी जो खुशबू है उन्हें किताबों को बिना हाथ में लिए महसूस ही नहीं किया जा सकता है।’
इस बीच युवाओं में किताबों के बजाय किंडल जैसी नई तकनीक का चलन और लोकप्रियता बढ़ी है। तीन वर्षों से किंडल का लगातार उपयोग कर रहे देवेश मिश्रा कहते हैं, ‘ किंडल के कारण पढ़ने की सहूलियत बढ़ गई है। उदाहरण के तौर पर यात्रा के दौरान अगर किसी को किताबें पढ़ने का मन करे तो भी वह उसे अधिक भार के कारण ले नहीं जा पाता, हम जैसे किराये के मकानों में रह रहे छात्र अगर कमरा बदलना चाहें तो बहुत सारी किताबें वाहन में लाद कर ले जाना पड़ता है। लेकिन किंडल बुक पर बस एक क्लिक पर हजारों किताबें एक फोल्डर में उपलब्ध हो जाती हैं। अगर सैकड़ों किताबों को अलमारी में रखकर ले जाने की सोचा जाए तो कितनी मुश्किल होगी।’
प्रकाशन समूह राजकमल का कहना है, ‘कोरोना काल से पाठकों की संख्या बढ़ी है। पुस्तकों की बिक्री बढ़ी है। बहुत से लोग जो पहले अंग्रेजी में किताबें पढ़ते थे, उन्होंने हिंदी किताबें पढ़नी शुरू कर दी हैं। हम कह सकते हैं कि किताबों की बिक्री में कोरोनाकाल के बाद करीब 20 फीसदी वृद्धि हुई है।’ राजकमल प्रकाशन के संपादक सत्यानंद निरुपम कहते हैं, ‘पाठकों की रुचि में भी बदलाव हुआ है, वे सामाजिक विषयों पर किताबें पढ़ना पसंद करते हैं। उन्हें ऐसी किताबें भी चाहिए जो उन्हें मानसिक शांति दे, तनाव से मुक्त करे, उन्हें अच्छे स्वास्थ्य की ओर ले जाए क्योंकि इधर पुस्तकें लाइब्रेरी के लिए नहीं बल्कि स्वयं पढ़ने के लिए खरीदी जा रही हैं। लोगों के चुनाव की प्रक्रिया भी बेहतर हुई है। वेअच्छी प्रस्तुति वाली, अच्छे लेखकों की, अच्छे पाठ वाली पुस्तकें पसंद कर रहे हैं।’
हालांकि रुझानों के मुताबिक भारत में डिजिटल रीडिंग का चलन बढ़ रहा है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय पढ़ने वालों में तकरीबन 7 फीसदी लोग ई-बुक के माध्यम से पढ़ रहे हैं। एमेजॉन किंडल की बात करें तो उसने पांच क्षेत्रीय भाषाओं – हिंदी, तमिल, मराठी, गुजराती और मलयालम में ई-बुक की शुरुआत की है जिसके बाद से ही इसकी बिक्री में लगभग 80 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है।
वाणी प्रकाशन की कार्यकारी निदेशक अदिति माहेश्वरी कहती हैं, ‘प्रतिदिन ऑनलाइन और ऑफलाइन लगभग 300 से 400 किताबें पाठकों के बीच में पहुंच रही हैं। युवा पाठक ज्यादा पढ़ रहे हैं। महामारी के बाद बाजार बेहतर हो रहा है। महामारी के दौरान ऑनलाइन पाठकों की संख्या ज्यादा थी जिसमें अब अब कमी आ रही है।’
पायरेसी से बढ़ रही मुश्किल
आलोक श्रीवास्तव कहते हैं कि पाठकों को भी समझना चाहिए कि लेखक बहुत मुश्किल से किताब लिखता है। ऐसे में उन्हें चोरी से छापी गई पायरेटेड किताबों को नहीं पढ़ना चाहिए।
वहीं राजकमल प्रकाशन ने बड़े स्तर पर पायरेसी होने की संभावना जताई और कहा, ‘अंग्रेजी की किताबों की पायरेसी तो पहले से ही बहुत ज्यादा रही है। अब यह प्रवृत्ति हिंदी किताबों के साथ भी बढ़ रही है। हमारे प्रकाशन की बहुत सी किताबों के जाली संस्करण बाज़ार में हैं। इसका नवीनतम उदहारण ‘रेत समाधि’ है। ‘मामूली चीजों का देवता’, ‘एक दुनिया समानांतर’, ‘महाभोज’ जैसी किताबों के भी जाली संस्करण बाज़ार में समय-समय पर मिलते रहे हैं।
इससे प्रकाशक से ज्यादा लेखक की अवमानना होती है क्योंकि पुस्तकें खराब ढंग से प्रस्तुत करना और खराब ढंग से बेचा जाना पुस्तक का अपमान है।’
पाठकों तक पहुंच के बारे में राजकमल प्रकाशन ने कहा कि वर्तमान समय में सोशल मीडिया ही पाठकों तक अपनी बात पहुंचाने का अकेला माध्यम है जिसका अलग-अलग तरह से उपयोग करते हुए हम अपनी किताबों की जानकारी पाठकों को दी जाती है। सोशल मीडिया को वैकल्पिक मीडिया की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

Advertisement
First Published - September 18, 2022 | 8:09 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement