सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को 2017 के उन्नाव रेप मामले में बेल दी गई थी। ये रोक CBI की अपील पर लगाई गई, जिसमें एजेंसी ने हाई कोर्ट के तर्कों को गलत बताया। CBI ने 1997 के एलके आडवाणी केस का हवाला देकर दलील दी कि चुने हुए विधायक को आपराधिक कानूनों के तहत पब्लिक सर्वेंट माना जा सकता है। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कहा, “फिलहाल हम इस ऑर्डर पर रोक लगाने के पक्ष में हैं। आम तौर पर, अगर कोई व्यक्ति बाहर आ चुका है, तो कोर्ट उसकी आजादी नहीं छीनता। लेकिन यहां मामला अलग है, क्योंकि वो दूसरे केस में पहले से जेल में है।” वैकेशन बेंच ने पूर्व बीजेपी विधायक को नोटिस भी जारी किया और CBI की याचिका पर जवाब देने के लिए चार हफ्ते का वक्त दिया।
ये पूरा मामला काफी चर्चित रहा है, क्योंकि सेंगर पर नाबालिग लड़की से रेप का आरोप है। CBI का कहना है कि हाई कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की, जिससे ऐसे मामलों में कमजोरी आ सकती है। हालांकि, अब देखना है कि सेंगर इसपर क्या जवाब देते हैं।
CBI ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला कानूनी रूप से कमजोर है। एजेंसी के मुताबिक, हाई कोर्ट ने बेल देते वक्त कानून को बहुत सीमित तरीके से देखा। खास तौर पर, CBI ने 1997 के ‘एलके आडवाणी बनाम CBI’ केस का जिक्र किया, जो इस मामले में अहम है।
उस पुराने केस में भ्रष्टाचार के आरोप थे, जहां CBI ने प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के तहत केस दर्ज किए। वहां सवाल ये था कि क्या सांसद और विधायक जैसे चुने हुए प्रतिनिधि एंटी-करप्शन लॉ के तहत पब्लिक सर्वेंट माने जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि हां, वे पब्लिक सर्वेंट की परिभाषा में आते हैं। कोर्ट ने कहा कि विधायकों को भ्रष्टाचार के मामलों में इसी तरह देखा जाना चाहिए।
CBI ने सेंगर केस में यही तर्क दोहराया। एजेंसी का कहना है कि अगर भ्रष्टाचार जैसे मामलों में विधायकों को पब्लिक सर्वेंट माना जाता है, तो बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों में तो और भी सख्ती बरतनी चाहिए। CBI ने चेतावनी दी कि अगर विधायकों को पोक्सो एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट की कैटेगरी से बाहर रखा गया, तो कानून का मकसद ही कमजोर हो जाएगा। एजेंसी ने हाई कोर्ट पर आरोप लगाया कि उसने पोक्सो एक्ट की व्याख्या बहुत संकुचित की और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले को नजरअंदाज किया।
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ये मामला 2017 का है, जब उन्नाव जिले की एक नाबालिग लड़की ने कुलदीप सेंगर पर रेप का आरोप लगाया। उस वक्त सेंगर बंगरमऊ से विधायक थे और बीजेपी में थे। केस और भी जटिल हो गया, क्योंकि पीड़िता के पिता की पुलिस कस्टडी में मौत हो गई थी। इसके लिए सेंगर को अलग से दोषी ठहराया गया।
ट्रायल कोर्ट ने रेप के लिए सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन इस हफ्ते दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी अपील पर सुनवाई करते हुए सजा को सस्पेंड कर दिया और बेल दे दी। हाई कोर्ट का तर्क था कि विधायक होना पोक्सो एक्ट के तहत ऑटोमैटिकली पब्लिक सर्वेंट नहीं बनाता। कोर्ट ने कहा कि पोक्सो एक्ट में विधायकों को स्पष्ट रूप से पब्लिक सर्वेंट की लिस्ट में शामिल नहीं किया गया है। इसलिए, सेंगर पर पब्लिक सर्वेंट या ट्रस्ट की पोजिशन वाले लोगों के लिए बने सख्त प्रावधान लागू नहीं होते।
इस फैसले से पहले सेंगर जेल में थे, लेकिन दूसरे केस की वजह से। अब सुप्रीम कोर्ट की रोक से बेल का फायदा रुक गया है। CBI का मानना है कि ऐसे गंभीर अपराधों में चुने हुए नेताओं को आम आदमी से अलग नहीं देखा जा सकता। ये केस बच्चों की सुरक्षा और नेताओं की जवाबदेही पर बड़ा सवाल उठाता है।
अब ये देखना बाकी है कि सेंगर का इस फैसले पर क्या जवाब देते हैं। CBI की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है, और चार हफ्ते में रिस्पॉन्स मांगा है। ये मामला राजनीति और न्याय के बीच के रिश्ते को भी उजागर करता है। सेंगर जैसे नेता पर लगे आरोपों से समाज में काफी गुस्सा था, और अब ये कोर्ट की कार्रवाई से फिर सुर्खियों में है। पोक्सो एक्ट जैसे कानूनों की व्याख्या पर ये फैसला असर डाल सकता है।